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जानकारीः मोर के बारे में

मोर के मारने पर प्रतिबंध है, लेकिन इन कारणों से लोग इनका शिकार करते हैं।

Author April 2, 2017 07:00 am
मोर के पंख के चंदोले को जलाकर पीसकर शहद में चाट लेने से जहां दिल की धड़कनें नियंत्रित होती हैं वहीं उल्टी को भी रोक देती हैं। मनुष्य का रक्तचाप सम बनाए रखती हैं।

चंद्रकांत शर्मा

मोर का नाचना इतना भव्य, मोहक और लुभावना होता है कि उसे अपलक देखते रहने पर भी मन नहीं थकता। कहते हैं कि मोर के पैर सुंदर नहीं होते। मगर वह इन्हीं बदसूरत पैरों ही तो इतना मनमोहक नृत्य करता है। मोर की गर्दन भी कम आकर्षक नहीं है। हरी-नीली आभा से एक नया रंग बनकर उसमें सुंदरता को समाविष्ट किया गया है। सिर पर भव्य कंगूरेवाली कलंगी जैसे राजमुकुट हो। चोंच से आंख तक की सफेद लीक ऐसी कि जैसे किसी कुशल चित्रकार ने रंग भर दिया हो। उस पर पीठ पर मोर पांखों का गुच्छा, पता नहीं कैसे बनती हैं और कैसे छूटकर फिर उसी प्रक्रिया में गुंथने लगती है।मोर सांप तक खा जाता है तथा उसे पचा जाता है। जिस लाल मिर्च को खाने से पहले मनुष्य सोचता है और डरता है, उसे वह बड़े चाव से खाता है। फिर पेट भरने को तो छोटे-बड़े सभी आकार के कीड़े-मकोड़े भी चट कर जाता है। यों मोर अनाज खाता है तो ऐसा लगता है कि यह बड़ा अहिंसक पक्षी है।
मोर का कंठ इतना सुरीला है कि उसका कलंगी हिलाकर बोलना भाता है। सावन में जब मोर बोलता है तो उसे वर्षा का आमंत्रण माना जाता है। यह पेड़ों की डालियों पर बैठता है और सभी मौसम इनमें गुजार देता है। भारी होने से यह ज्यादा दूरी तक उड़ नहीं पाता, इसीलिए यह शिकारियों के हाथ आसानी से हाथ आ जाता है।

जबकि इसे मारने पर प्रतिबंध है। लेकिन मोर पंख के बेचने की दृष्टि से शिकारी इसे मार डालते हैं। इसकी पंख का दवाओं में प्रयोग होता है। अनेक असाध्य रोगों में यह जीवन-दान देने जैसा कार्य करती हैं। पंख के चंदोले को जलाकर पीसकर शहद में चाट लेने से जहां दिल की धड़कनें नियंत्रित होती हैं वहीं उल्टी को भी रोक देती हैं। मनुष्य का रक्तचाप सम बनाए रखती हैं। लेकिन यह प्रयोग जाने-बूझे लोगों की सलाह से किया जाना चाहिए। अनेक आदिवासी क्षेत्रों में मोर के मांस को खाया भी जाता है। मोर को लेकर हिंदी साहित्य में अनेक किंवंदंतियां हैं। वर्षा ऋतु में मोर का महात्म्य घनघोर रूप से स्वीकार किया गया है। हिंदी के कवियों-साहित्यकारों ने मोर की वाणी, उसकी चाल तथा सुंदरता पर बहुत कुछ लिखा है। इसका वर्णन वेद, पुराण, महाभारत और रामायण में भी मिलता है। साहित्य में वनों की शोभा और तपोवन में मयूरों की पंक्ति का सामूहिक नृत्य-वर्णन प्राचीन काल में ही मिलता है। कालिदास का साहित्य मयूर-वर्णन से भरा पड़ा है। इस तरह से मोर संस्कृत कवियों-लेखकों की कलम से अछूता नहीं रहा है। मोर इतना घरेलू पक्षी भी है कि वह घरों के आसपास और छतों पर विचरण करता है। अनेक पुराने खंडहरों में भी मोर अपने आवास बना लेते हैं।
भारतीय मोर की प्रजाति सबसे भव्य और अनुपम है। सफेद और मटमैले रंगों वाले मोर भी हैं, लेकिन उनकी भव्यता भारतीय मोरों की तुलना में काफी कम है। जब मोर आत्मरक्षा में विफल होने लगता है तो वह आक्रामक हो जाता है और शत्रु से अपनी रक्षा करता है। मोर शांत प्रकृति का धैर्यशील पक्षी है। वह कूड़े-करकट में से भी अपना भोजन खोजकर पेट भर लेता है और अनजाने में भी किसी को दुखी नहीं करता। मोर की सुंदरता में चार चांद तब और भी लग जाते हैं जब वह मुंडेरे पर बैठकर बोलता है। मोर की जीवन-शैली अत्यंत सादा है और वह दूसरे पक्षियों के साथ हिल-मिलकर रहना पसंद करता है। १

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