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साबुन के सौ गुन

साबुन आधुनिक जीवन-शैली का अहम हिस्सा बन चुका है। जैसे साबुन नहीं तो सफाई और सौंदर्य नहीं। तमाम देशी-विदेशी कंपनियां मैल हटाने और सौंदर्य निखारने के दावों के साथ कारोबारी होड़ में हैं। तरह-तरह के साबुन बाजार में उपलब्ध हैं। पर इसके साथ आज भी बहुत सारे लोग नहाने-धोने के मामले में पारंपरिक तौर-तरीके अपनाते हैं, तो नहाने-धोने की देसी विधियां कारोबार का रूप भी ले रही हैं। यों दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में भारत में साबुन का सफर बहुत लंबा नहीं है। भारत में साबुन के विकास और इसके कारोबारी विस्तार पर नजर डाल रहे हैं -- सूर्यनाथ सिंह।

Author August 5, 2018 6:13 AM
लोग मुल्तानी मिट्टी, काली मिट्टी, नीम, शिकाकाई, आंवला के गुण वाले साबुनों और औषधीय शैंपुओं की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, तो इसीलिए कि कहीं न कहीं सौंदर्य निखार साबुनों के दावों पर से उनका भरोसा कमजोर हुआ है।

कबीरदास का दोहा है- ‘निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय/ बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय’। इस दोहे का उल्लेख आमतौर पर निंदक का महत्त्व रेखांकित करने या फिर उस पर तंज कसते हुए किया जाता है। पर इसके दूसरे हिस्से में आए ‘साबुन’ शब्द पर ध्यान कम ही लोगों का अटकता होगा। क्योंकि साबुन अब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। जैसे साबुन नहीं, तो सफाई नहीं। नहाने, हाथ धोने, दाढ़ी बनाने, चेहरा धोने, कपड़े साफ करने, फर्श आदि की सफाई करने, यहां तक कि मकानों में जल रिसाव रोकने के लिए भी साबुन का इस्तेमाल होता है। साबुन अब हमारी जिंदगी में हर तरफ है। कहीं सनसनाती ताजगी का उद्घोष करता, कहीं फूलों-सा खिलता, महकता, गमकता, तो कहीं फलों का रस पी मचलता, कहीं मलाई की कोमलता लिए कमनीय तारिकाओं की त्वचा में खिलखिलाता, कहीं खिलाड़ियों की बाजुओं से बल अर्जित कर बलशाली होता और हमारे आसपास फैलती बीमारियों को तलवार से मारता-काटता, कहीं दूध-सी सफेदी और चमकार बिखेरता। साबुन अब हमारे आसपास हर तरफ बजता है, हर समय मचलता, इठलाता, लुभाता, उम्मीद और भरोसा जगाता मौजूद है।

पर जिन लोगों ने चालीस-पचास साल पहले का समय देखा है, उन्हें हैरानी हो सकती है कि पंद्रहवीं सदी के कवि ने जब साबुन शब्द का प्रयोग किया, तो क्या उस समय भारत में साबुन का चलन था? आजादी के बहुत बाद तक आम लोगों को काली मिट्टी, मुल्तानी मिट्टी, खली, उबटन, चंदन आदि का लेप लगाते और फिर नहाते देखा जाता था। बालों को धोने के लिए रीठा, शिकाकाई, तिल के पत्ते आदि का उपयोग होता था। कपड़े रेह यानी ऊसर जमीन की खारी धूल-मिट्टी से ही धोए जाते थे। हर समाज में रेह इकट्ठा करने वाले लोग हुआ करते थे। नहाने-धोने का साबुन संभ्रांत लोग ही इस्तेमाल करते थे। ‘मैला आंचल’ की कमली जैसी कुछ संपन्न घरों की लड़कियां और महिलाएं ही ‘गमकौआ’ साबुन से नहाती थीं और जब वे नहाती थीं तो पूरा गांव महकने लगता था। अगर कोई सामान्य व्यक्ति साबुन से नहाते देखा जाता, तो लोग उसका मजाक ही उड़ाते। यहां तक कि उसे बिगड़ा हुआ मान लिया जाता।

थोड़ा और पीछे जाएं तो ग्रामीण महिलाओं को तो छोड़ें, रानियों-महारानियों तक के सौंदर्य प्रसाधन में साबुन का जिक्र नहीं मिलता। तरह-तरह के उबटन, चंदन आदि के लेप, फूलों की गंध भीने जल, दूध, मलाई, शहद, बालों के लिए सुगंधित धूम आदि का उल्लेख तो मिलता है, पर साबुन का नहीं। संस्कृत काल में साबुन का उल्लेख नहीं है। तो फिर पंद्रहवीं सदी में कबीर दास को यह शब्द मिला कहां से!

साबुन दरअसल, अरबी का शब्द है। यानी मुगल काल में यह शब्द बोल-चाल में शामिल हुआ होगा और फिर उपयोग में आया होगा। पर साबुन के इतिहास में जाएं, तो यह भारत में आम चलन में कोई एक सौ दस साल पहले आया, जब ब्रिटिश शासन के दौरान ब्रिटेन के लीवर बंधुओं ने बाहर से मंगा कर साबुन का विपणन शुरू किया। साबुन का पहला भारतीय कारखाना सौ साल पहले लगा। तो फिर यह शब्द पंद्रहवीं सदी में कैसे कबीर दास को हाथ लगा?

दरअसल, साबुन का चलन बेशक भारत में आजादी के बाद बढ़ा, पर उसके बारे में जानकारी यहां पहले पहुंच गई थी। शब्दों की गति कई बार वस्तुओं की गति से तेज होती है। साबुन के इतिहास पर नजर डालें तो ईसा पूर्व अट्ठाईस सौ में बेबीलोनिया के लोगों ने साबुन बनाने की विधि खोज निकाली थी। मध्यपूर्व और अरब देशों में बारहवीं सदी तक साबुन आम चलन में आ चुका था। यानी मुसलिम शासकों की मार्फत यह भारत पहुंचा था।

पर चूंकि हमारे यहां साफ-सफाई पवित्रता का पर्याय मानी जाती रही है। इसलिए यहां शरीर प्रक्षालन के लिए पानी और प्राकृतिक चीजें ही उपयुक्त मानी जाती रही हैं। हमारे यहां आयुर्वेद के नुस्खों पर लोगों को ज्यादा भरोसा रहा है, इसलिए भी रासायनिक वस्तुओं के प्रति नकार का भाव ही अधिक रहा है। उनके बजाय स्थानीय स्तर पर सहज उपलब्ध वनस्पतियां इस्तेमाल होती रही हैं। इसलिए भी लोगों में रासायनिक तत्त्वों से बने साबुन की तरफ आकर्षण पैदा नहीं हुआ होगा। आज भी बहुत सारे ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो साबुन से नहीं नहाते। नीम, बबूल, मिस्वाक, अखरोट की टहनी या नदी की रेत से दांत मांजते हैं। दाढ़ी बनवाते समय साबुन नहीं लगाते, सिर्फ पानी का उपयोग करते हैं। आज भी गंगा-यमुना जैसी पवित्र मानी जाने वाली नदियों में नहाते वक्त अगर कोई साबुन लगाता दिख जाए, तो लोग फटकार लगा देते हैं। अपने यहां तो मंत्र-स्नान से भी शरीर शुद्धि हो जाती है! और फिर जहां आभ्यंतर की शुचिता पर बल हो, वहां शरीर की सफाई के लिए विदेशी नुस्खे से बने साबुन पर भरोसा भला कोई क्यों करेगा!

खासकर जो लोग जीव हत्या के विरुद्ध हैं, उनका मानना है कि शरीर पर जमी मैल में पलने वाले बैक्टीरिया भी एक तरह के जीव हैं और साबुन से नहाने पर वे मर जाते हैं, इस तरह उन पर जीव हत्या का पाप लग सकता है। फिर यह भी कि पवित्रता में विश्वास करने वाले लोगों को आक्रांता और विधर्मी माने जाने वाले शासकों की जीवन-शैली के प्रति नकार भाव ही रहा होगा। इस तरह वे शरीर की शुद्धता वगैरह के मामले में अपनी पारंपरिक जीवन-शैली से बंधे रहे।

मगर जीवन-शैली किसी बंधी-बंधाई लीक पर नहीं चलती। पीढ़ियां बदलती हैं, तो जीवन-शैली भी प्राय: बदलती है और उसमें आयातित या पराई जीवन-शैली भी जगह बनाना शुरू कर देती है। सो, जब भारतीय नागरिक अंग्रेजी हुकूमत का हिस्सा बनना शुरू हुए, तो सबसे अधिक उन्होंने अंग्रेजी रंग-ढंग अपनाए। अंग्रेज हाकिमों की तरह बोलना, उठना-बैठना, खाना-पीना, नहाना-धोना शुरू कर दिया। जाहिर है, जब लोग अंग्रेजी शैली में नहाने लगे, तब साबुन का उपयोग भी करना शुरू किया। इस तरह साबुन की खपत बढ़ी, तो उसका आयात भी शुरू हुआ। इंग्लैंड के लीवर ब्रदर्स ने आधुनिक साबुन का आयात और विपणन शुरू किया। उसके कुछ सालों बाद यानी 1918 में टाटा ने केरल के कोच्चि में साबुन बनाने का कारखाना खोला, जो पहला भारतीय साबुन कारखाना था। 1930 तक इस कंपनी के ब्रांडेड साबुन बाजार में दिखने लगे और 1937 तक ये साबुन संभ्रांत वर्ग की जरूरत बन गए।

अब सुंदर दिखने की हर तरफ होड़ है। सुंदर हर कोई दिखना चाहता है, पर इस दौर में त्वचा की सुंदरता पर जोर कुछ अधिक है। सिर्फ लड़कियां नहीं, लड़के भी सुंदर दिखने को बेताब हैं। इसलिए व्यक्तित्व का पैमाना भी बदला है। ऐसे में चमड़ी निखारने का सामान कुछ अधिक उपलब्ध होने लगा है। उसमें तरह-तरह के सौंदर्य निखार साबुन, बालों को स्वस्थ-मजबूत-चमकदार और ‘स्टाइलिश’ बनाने वाले शैंपू, चेहरे की चमक बढ़ाने वाले तरल साबुन, त्वचा को पोषण देने वाले विटामिन युक्त क्रीमों की भरमार लग गई है। दांतों को मजबूत-चमकदार बनाने वाले मंजन-पेस्ट, कपड़ों के रंग-रेशे को सुरक्षित रखते हुए उन्हें लंबी जिंदगी देने वाले साबुन-पाउडर वगैरह भी उसके पीछे-पीछे धक्का-मुक्की करते देखे जाते हैं। हाल यह है कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में सौंदर्य प्रसाधन का बाजार निरंतर ऊपर चढ़ता गया है।

कारोबारी होड़

जब किसी वस्तु की मांग बढ़ती है, तो स्वाभाविक रूप से उसके उत्पादन और विपणन में होड़ भी बढ़ती है। कारोबारी होड़ बढ़ती है, तो गुणवत्ता को लेकर शोध और दावे भी बढ़ने लगते हैं। साबुन ऐसा उत्पाद है, जो पहले संभ्रांत वर्ग की जरूरत बना और फिर धीरे-धीरे आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गया। इसके उत्पादन के क्षेत्र में कई देशी-विदेशी कंपनियां उतर आर्इं। तरह-तरह के साबुन बनने लगे। ठोस साबुन के अलावा नहाने, हाथ धोने, दाढ़ी बनाने का तरल साबुन भी बनने लगा। रंगीन, पारदर्शी, तरह-तरह के फलों के रस, शहद, मलाई, औषधीय गुणों वाली वनस्पतियों के इस्तेमाल से साबुन बनने लगे। साबुन बनाने का नुस्खा पता चला, तो इसने कुटीर उद्योग का भी रूप ले लिया। इस तरह अब अपने देश में सैकड़ों तरह के साबुन बनते और इस्तेमाल होते हैं, उनमें ब्रांडेड खुशबूदार, औषधीय से लेकर गली-मुहल्ले में तैयार होने वाले किलो के भाव बिकने वाले साबुन तक मौजूद हैं। नहाने, कपड़े धोने के अनेक ब्रांडेड साबुन बाजार में पटे पड़े हैं, तो बहुत सारे लोग आज भी ऐसे हैं, जिन्हें स्थानीय तौर पर बनने वाले साबुनों पर भरोसा अधिक है।

ब्रांडेड साबुन बनाने वाली कंपनियां अपने माल की खपत बढ़ाने के लिए विज्ञापनों की मदद से तरह-तरह के दावे करती और लोगों को आकर्षित करती हैं। साबुन की तरफ लोगों को आकर्षित करने का सबसे बड़ा मंत्र है- सौंदर्य निखारना और मैल हटाना। इन्हीं दो सूत्रों पर सारे साबुन उत्पादकों का जोर रहता है। वे बदल-बदल कर शोध और दावे पेश करते और अपने उत्पाद को बेहतर साबित करने का प्रयास करते हैं। इन्हीं दो सूत्रों पर उनके सारे विज्ञापन टिके हैं।

विज्ञापन का बाजार

जबसे साबुन उद्योग शुरू हुआ है, विज्ञापनों के जरिए लोगों को आकर्षित करने का प्रयास चल रहा है। अगर विज्ञापन के इतिहास पर नजर डालें तो साबुन के विज्ञापन सबसे पुराने विज्ञापनों में नजर आएंगे। भारत ही नहीं, दुनिया भर में साबुन को विलासिता की वस्तु के रूप में विज्ञापित किया जाता रहा है। भारत में सबसे पुराना साबुन का विज्ञापन लक्स का है, जिसमें फिल्म अभिनेत्री लीला चिटनिस का उपयोग किया गया था, उसके बाद मधुबाला, माला सिन्हा, हेमा मालिनी से लेकर जूही चावला आदि अभिनेत्रियों को चेहरा बनाया गया। साठ का दशक आते-आते आलम यह था कि लक्स के विज्ञापन के लिए दुनिया की करीब चार सौ प्रसिद्ध मॉडल और अभिनेत्रियां कतार में थीं। विज्ञापन के बल पर लक्स ने घर-घर तक अपनी पहुंच बनाई। यह विलासिता और सौंदर्य का प्रतीक बन गया।

मगर जब नहाने के साबुन का चलन बढ़ा और यह हर व्यक्ति की जरूरत बन गया, यानी साबुन नहीं तो नहाना नहीं जैसी धारणा दृढ़ हो गई, तो सौंदर्य निखारने के दावों के साथ तरह-तरह के साबुन बाजार में उतरने लगे। उनके विज्ञापनों में- त्वचा को निखारने के साथ-साथ उसके गुनगुना उठने, दिन को ताजगी और महक से भर देने, जिधर से गुजरो चमक बिखेरते चलो, बीमारियों से लड़ने की शक्ति जैसे दावे होने लगे। साबुन प्रमुख रूप से विलासिता की चीज ही बना रहा, इसलिए इसके विज्ञापन भी ग्राहकों में विलासिता की चाह जगाते रहे। कभी नीबुओं की खुशबू और ताजगी के साथ, कभी फूलों की मादक गंध के साथ, कभी कस्तूरी की महक से महिलाओं कोे खिंचे चले आने का भ्रम रचते हुए, कभी दूध-मलाई, फलों का पोषण त्वचा में भर देने के दावे के साथ।

देसी का आकर्षण

मगर इन तमाम दावों के बावजूद देसी का आकर्षण भी बना रहा। विलासिता का अहसास जगाने वाले तमाम साबुनों के बीच आज भी देसी तरीके में विश्वास करने वाले बहुत सारे लोगों को देसी तरीके से बने साबुनों पर ही यकीन ज्यादा है। वे किलो के भाव बिकने वाले पीले साबुन को ही असली साबुन मानते हैं।

हालांकि देसी का यह मानस किसी राष्ट्रीय अभिमान या विदेशी से ऊब की वजह से बना नहीं माना जाना चाहिए। यह एक परंपरागत मानस है। देसी साबुन बनाने और इस्तेमाल करने की जिद पहली बार मैसूर के महाराज कृष्णराजा वाडियार चतुर्थ ने पकड़ी। 1916 में जब उन्होंने चंदन की लकड़ी से तेल निकालने का कारखाना लगाया, तो फिर इस तेल से साबुन बनाने का विचार भी उनके मन में आया और इसका नुस्खा जानने के लिए एक युवा रसायनशास्त्री को इंग्लैंड भेजा गया। वह वहां से साबुन बनाने का तरीका सीख कर लौटा तो चंदन के तेल से मैसूर सैंडल सोप बनाने का काम शुरू हुआ। बहुत से लोगों का मानना है कि यह पहला भारतीय साबुन था। वह बहुत लोकप्रिय हुआ।

इस तरह साबुन के मामले में शुरू से देशी-विदेशी का रुझान लोगों में बना रहा। बाद में देसी रुझान को कारोबारी होड़ में इस्तेमाल भी किया गया। देसी उत्पाद के इस्तेमाल पर जोर देने वाली कई आयुर्वेदिक कंपनियों ने औषधीय गुण वाले साबुन बनाने शुरू कर दिए।

देसी का आकर्षण भी विदेशी उत्पाद के समांतर लगभग बराबर बना हुआ है, नहीं तो यह अकारण नहीं है कि आज भी बिल्कुल आधुनिक जीवन-शैली अपना चुके लोग रिसॉर्ट और होटलों में मड बाथ लेने यानी कीचड़ में नहाने जाते हैं। आयुर्वेदिक औषधियों से मालिश और स्नान के लिए विदेशी सैलानी लालायित रहते हैं। सौना बाथ यानी भाप-स्नान जैसी पश्चिमी विधियों को टक्कर देता औषधीय स्नान का भारतीय कारोबार खूब फल-फूल रहा है। मुल्तानी मिट्टी और वनस्पतियों से बने साबुन और शैंपू लोगों को आकर्षित कर रहे हैं।

हकीकत और फसाना

पर साबुन कारोबार के विस्तार और सौंदर्य में उसके क्रांतिकारी परिवर्तन के नारों के बीच यह सवाल भी कहीं न कहीं से उठ ही जाता है कि साबुन से सफाई और त्वचा के निखार, बालों की सुरक्षा आदि के दावे क्या सचमुच सही साबित हो रहे हैं? आज भी लोगों में त्वचा रोग की शिकायतें अधिक देखी जा रही हैं। कम उम्र में ही लोगों के बाल सफेद होने लगे हैं, लोग गंजे हो रहे हैं। अगर साबुन-शैंपू-तेलों से त्वचा निखरती, बालों को पोषण मिलता, तो ये समस्याएं अब तक खत्म हो जानी चाहिए थीं। पर वे बढ़ ही रही हैं, तो इसका अर्थ है कि इनके समाधान की शक्ति साबुन में नहीं, कहीं और है। उन समस्याओं को रोकने की जरूरत है, जिसके चलते बालों में सफेदी और गंजापन हो रहा है। रोज अस्पतालों के त्वचा रोग विभागों के बाहर मरीजों की कतारें लगती हैं। लोग मुल्तानी मिट्टी, काली मिट्टी, नीम, शिकाकाई, आंवला के गुण वाले साबुनों और औषधीय शैंपुओं की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, तो इसीलिए कि कहीं न कहीं सौंदर्य निखार साबुनों के दावों पर से उनका भरोसा कमजोर हुआ है।

साबुन का सफर

  1. ’साबुन उच्च अणु भार वाले कार्बनिक वसीय अम्लों का सोडियम या पोटैशियम लवण है। कपड़े वगैरह धोने के लिए इस्तेमाल होने वाले कठोर साबुन में सोडियम लवण होते हैं, जबकि नहाने के लिए उपयोग होने वाले नरम-मुलायम साबुन में पोटैशियम के।
  2. ’ईसा पूर्व 2800 में बेबीलोनिया में साबुन बनाने की विधि खोज ली गई थी।
  3. ’मिस्र के लोगों ने ईसा पूर्व 1550 में साबुन बनाना सीख लिया था।
  4. ’इस्लामिक देशों में हालांकि ग्लिसरीन बनाने की तरकीब ईसा पूर्व 850 में पता चल गई थी, जो कि एक तरह से साबुन बनाने की भी विधि थी, पर वहां सही तरीके से साबुन बनाने का काम बारहवीं सदी में शुरू हुआ।
  5. ’यूरोप में भी साबुन बनाने का काम बारहवीं सदी में शुरू हुआ।
  6. ’फ्रांस में यह 1525 में बनना शुरू हुआ।
  7. ’साबुन बनाने के क्षेत्र में कारोबारी होड़ शुरू हुई बीसवीं सदी में।
  8. ’तरल साबुन यानी लिक्विड सोप सन 1900 के बाद बनना शुरू हुआ। बीजे जॉनसन कंपनी ने पाम यानी नारियल और आॅलिव यानी जैतून के तेल से पामोलिव नाम से तरल साबुन बनाना शुरू किया था।
  9. ’भारत में हालांकि लीवर ब्रदर्स ने इंग्लैंड से लाकर भारत में साबुन बेचने का काम शुरू किया था, पर यहां ठीक से साबुन बनाने का काम शुरू किया टाटा कंपनी ने। टाटा ने 1918 में केरल के कोच्चि में ओके कोकोनट आयल मिल्स खरीदी और विधिवत साबुन बनाना शुरू किया। इस तरह भारत में साबुन का सफर एक सौ दस साल से अधिक नहीं हुआ।
  10. ’हालांकि कुछ लोग मैसूर सैंडल सोप को भारत का पहला देसी साबुन मानते हैं।

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