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शख्सियत: जानें पहले भारतीय गर्वनर राजाजी के जीवन से जुड़ी ये बातें

भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, वकील, लेखक, राजनीतिज्ञ और दार्शनिक चक्रवर्ती राजगोपालाचारी स्वतंत्र भारत के द्वितीय गर्वनर और पहले भारतीय गर्वनर जनरल थे। उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। राजगोपालाचारी को लोग राजाजी कहते थे। 

Author December 9, 2018 12:41 AM
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी( जन्म : 10 दिसंबर, 1878 – निधन : 25 दिसंबर, 1972)।

व्यक्तिगत जीवन और शिक्षा

मद्रास में जन्मे राजगोपालाचारी ने प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव थोरपल्ली से ली। जब वे पांच साल के थे तब उनका परिवार होसूर चला आया। होसूर के आरवी गवर्मेंट बॉयज हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ाई की। फिर 1894 में बंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज से स्नातक और 1897 में विधि की शिक्षा मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से प्राप्त की। राजगोपालाचारी ने अलामेलू मंगलम्मा से 1897 में विवाह किया। उनके पांच बच्चे हुए। 1916 में पत्नी का देहांत हो जाने के बाद पांचों बच्चों की जिम्मेदारी उन्होंने अकेले संभाली।

राजनीतिक जीवन
राजगोपालाचारी का राजनीतिक जीवन उनकी वकालत के साथ शुरू हुआ। उन्होंने 1900 में सालेम में वकालत शुरू की। अठाईस साल की उम्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वे बाल गंगाधर तिलक से अधिक प्रभावित हुए और 1911 में सालेम नगरपालिका के सदस्य और फिर अध्यक्ष चुने गए। राजगोपालाचारी हमेशा अन्याय के खिलाफ लड़ते रहे। ’राजगोपालाचारी शांतिप्रिय व्यक्ति थे। वे गांधी से अधिक प्रभावित थे। गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय होने पर राजगोपालाचारी भी उनके अनुयायी बन गए। वे पूरी तरह स्वाधीनता आंदोलन में लग गए और वकालत छोड़ दी। वे कांग्रेस के महामंत्री भी रहे। राजाजी ने ‘गवर्नमेंट आॅफ इंडिया एक्ट 1919’ के तहत ब्रिटिश सरकार का विरोध किया और उसके साथ असहयोग की किया। वे ‘इंपीरियल लेजिसलेटिव कौंसिल’ के साथ-साथ राज्यों के ‘विधान परिषद’ में प्रवेश का विरोध कर ‘नो चेंजर्स’ समूह के नेता बने।

’राजगोपालाचारी ने कांग्रेस समिति के अध्यक्ष बनने के बाद तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। 1930 में गांधी के नमक सत्याग्रह से प्रेरित होकर उन्होंने नागपट्टनम के पास वेदरनयम में नमक कानून तोड़ा। इस जुर्म में उन्हें जेल की सजा भी हुई। ’मद्रास में 1937 के चुनाव के बाद राजगोपालाचारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। उन्होंने द्वितीय विश्व में भारत को शामिल करने के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इस कारण उन्हें दिसंबर, 1940 में गिरफ्तार कर एक साल के लिए जेल भेज दिया गया। राजगोपालाचारी विभाजन के पक्ष में नहीं थे। वे चाहते थे कि ‘मुसलिम लीग’ के साथ संवाद किया जाए, मगर अंतत: देश को विभाजन की त्रासदी झेलनी पड़ी। ’राजगोपालाचारी भारत के अंतिम और पहले भारतीय गर्वनर बने। जब भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल माउंटबेटन अनुपस्थित थे तब 10 से 24 नवंबर 1947 तक राजगोपालाचारी कार्यकारी गवर्नर जनरल नियुक्त हुए। दूसरी बार माउंटबेटन के जाने के बाद जून 1948 से 26 जनवरी 1950 तक गवर्नर जनरल रहे।

नेहरू सरकार में मंत्री
1950 में जब जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में सरकार बनी तब राजगोपालाचारी को उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया। सरदार पटेल के निधन के बाद उन्हें गृहमंत्री बनाया गया, जहां उन्होंने दस महीने काम किया। प्रधानमंत्री नेहरू के साथ विभिन्न मुद्दों पर मतभेद होने के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया और मद्रास चले गए। मद्रास में मुख्यमंत्री रहने के बाद राजगोपालाचारी ने राजनीति से संन्यास ले लिया और 1959 में उन्होंने ‘स्वतंत्रता पार्टी’ का गठन किया।
निधन: बीमारी के चलते 25 दिसंबर, 1972 को उनका निधन हो गया।

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