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संस्कृति- चली चली रे पतंग…

देश के अलग-अलग इलाकों में पतंगबाजी के अलग-अलग रंग हैं, पर दीवानगी एक-सी दिखती है। आसमान में कुंलाचे भर रही पतंग का मांझा काटने का कोई मौका नहीं गंवाना चाहता। बहरहाल, रंग-बिरंगी पतंगें मुक्ताकाश में अपनी अनुपम-छटा बिखेरने लगी हैं।

Author January 28, 2018 12:09 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

राजेश सेन

भारत में मकर-संक्रांति से लेकर गणतंत्र दिवस और उसके बाद तक पतंगबाजी की छटा देखते बनती है। देश के अलग-अलग इलाकों में पतंगबाजी के अलग-अलग रंग हैं, पर दीवानगी एक-सी दिखती है। आसमान में कुंलाचे भर रही पतंग का मांझा काटने का कोई मौका नहीं गंवाना चाहता। बहरहाल, रंग-बिरंगी पतंगें मुक्ताकाश में अपनी अनुपम-छटा बिखेरने लगी हैं। ‘काटा है…’ के घोष वातावरण को अजेय कर अपने परचम फहराने लगे हैं। तमाम दुनियावी व्यस्तता के बावजूद जब कभी हम आसमान निहारें, तो लगता है जैसे कोई बहुरंगी मछलियों से पटा एक्वेरियम निहार रहे हैं। जैसे कोई विलोम तासीर की रंगरेजियत हमारे सिर पर कलाबाजी के उलटे घड़े-सी रखी हुई है। पतंगों और मछलियों की कलाबाजियां अक्सर हूबहू एक समान नजर आती है।

बचपन के दिन तो छोड़िए, आज भी आसमान को निहारते हुए पतंगों की कातिल उड़ान पर मर मिटने को दिल करता है। मकर-संक्रांति के बहाने जो जवान, अधेड़ या बूढ़े अपने बचपन के दिनों को याद नहीं कर पाते, वे लोग कभी वैचारिक विविधता का रंगरेज भी नहीं समझे जा सकते। ऐसा नहीं कि बचपन में पतंगों का मजा केवल वे लोग ही उठा पाते थे, जो केवल उन्हें लूटते या उड़ाते थे। अवसर तो उन लोगों के भी ज्यादा मनोरंजक हुआ करते थे, जो तटस्थ होकर आसमान में कुंलाचे भरती पतंगों का आपस में उलझना निहारा करते थे। सच्चे अर्थों में निरपेक्ष भाव से आसमान में पतंगों की किलोल निहारना, हमें एक द्रष्टा-भावी बनाता है। बगैर किसी माया-मोह में उलझे हुए इस असार-सार संसार के मजे लेते हुए भवसागर के पार हो जाना इसी को तो कहते हैं। इस परम भाव को हासिल करने के लिए कड़ा तप करना पड़ता है। जो पतंगबाजी के बहाने हमें सौजन्यवश ही मुअय्यन हो जाता है।
कुल जमा, आसमानी नजारा यों है कि कोई किसी की ऊंची उड़ रही पतंग को हत्थे से ही काटने पर आमादा है, तो कोई अपनी डोर छोटी होने से प्रतिस्पर्धी की पतंग तक पहुंचने में तंगी महसूस कर रहा है। कहीं ‘ढील’ में लंबे-लंबे पेंचों की प्रेम-भरी पींगे भरी जा रही हैं, तो कहीं खींचतान कर ‘उचके’ की माली हैसियत के अनुसार मामला मितव्ययिता से निबटाया जा रहा है। कहीं-कहीं तो कटी हुई पतंगों को बे-मुरव्वत होकर लूटने वालों का भी अपना एक नशा दिख रहा है। यह एक सामान्य लोक-व्यवहार जैसा ही मामला है। कटी हुई पतंग यानी माले-मुफ्त अक्सर आम इंसानी फितरत को आकर्षित करता है। उसे कोई भी बख्शना नहीं चाहता। बच्चे भी इसी हसरत से कटी हुई पतंगों से भरा आसमान ताक रहे होते हैं। कोई पतंग कटे और वे दुड़की लगा कर अपने हिस्से का इंतजारी श्रम लूट सकें। कई बच्चे तो अपने कद से दौगुना ऊंचे बड़े-बड़े कंटीले ‘झांकड़े’ लेकर पतंगों को लूटने की जुगत में भिड़े हुए हैं। ये झांकड़ा पतंगों की लूट-पाट में अवसरों की विषमता पैदा करता है।

पतंगों के भी अपने-अपने सुनहरे नाम होते है। यही नाम इन अनाम पतंगों को एक पहचान भी देते हैं। जैसे, कोई पतंग कानबाज है, तो कोई चांद-सितारा। कोई चौपड़ है तो कोई परियल। कोई सिंगाड़ा है तो कोई लड्डूबाज। कोई मुंडिया है तो कोई काली-पीली-सफेद जैसी एकरंगी। कहीं कोई डग्गा उड़ान भर रहा है, तो कहीं चुग्गा पतंग हवा में सरसरा रही है। जैसे कि थोथा चना बाजे घना। ताव का ताव बेताव बजबजा रहा है। उधर, डोर का भी अपना ही एक कटीला कुनबा होता है। कहीं अकाट्य बरेली डोर है, तो कहीं सांकलबाज धागा। जो लोग धागा खरीद कर पतंग नहीं उड़ाते वे खुद अपनी मेहनत का मांझा सूत कर उसका मजा लेते हैं। सरेस, कांच और रंग की मिश्रण लुगदी बना कर मांझा सूतने का मजा ही कुछ और होता है। इन दिनों तो एक कातिल डोर और भी पतंगों के मुजाहिरे की वाहक बनी हुई है। जिसे चीनी मांझें के नाम से पुकारा जाता है। यह मांझा तार की तरह बेहद कटीला होता है। और कई दफा अपने में उलझा कर राहगीरों की जान भी ले लेता है।

पतंगों की दुनिया की अपनी ही एक निराली शब्दावली भी होती है। जैसे ‘पतंग’ और ‘डोर’ तो पतंगबाजी के शाश्वत शब्द हैं ही। इसके अलावा, मांझे के क्रेक को ‘रिग्गा’ कहते हैं। यह क्रेक किसी विभीषण मित्र की परदे के पीछे मारी गई ‘कुटकी’ का परिणाम भी हो सकता है। जो आपकी अच्छी-भली आसमान छूती पतंग को एक झटके में आपसे जुदा कर सकती है। एक ‘ठुनकी’ होती है, जो किसी पतंगबाज को हवा की कमतरी में भी अपनी पतंग को ऊंचा उड़ाने में मदद करती है। एक ‘उचका’ होता है, जिसे धारण करने वाला सहायक पतंगबाज किसी वाहन के ड्राईवर के हेल्पर जैसा होता है। उसका काम केवल उचके को लपेटना-समेटना होता है। उचका पकड़ने वाले को अपने मेहनताने के रूप में बीच-बीच में मुख्य पतंगबाज द्वारा ‘जोश’ लूटने की अंतरिम राहत भी प्रदान की जाती रहती है। एक होता है ‘लिंगड’, जिसमें विघ्नसंतोषी लोगों द्वारा एक डोर के दो छोरों या एक ही छोर पर पत्थर बांध कर किसी बेपरवाह उड़ रही पतंग के मांझे पर ईर्ष्या के वशीभूत होकर एक षड्यंत्र-सा फेंका जाता है। इस ‘लिंगड़’ के डसते ही कोई भी उड़ान भरती पतंग एक पल में जमींदोज हो जाती है। इसके अलावा पतंगों को तैयार करने की कवायद को ‘जोते बांधना’ या ‘कांप बांधना’ कहा जाता है। वहीं किसी पतंग के स्वछंदता भरे व्यवहार से तंग आकर कई दफा उसकी कांप साधी जाती है। या फिर उसके जोतों में ‘अतिरिक्त गांठें’ बांध कर उसका अराजक संतुलन साधा जाता है। कभी-कभी पतंग की अराजक गुडकन को साधने के लिए पतंग के एक छोर पर अतिरिक्त धागा भी बांधा जाता है। इसे ‘खिरनी’ बांधना कहते हैं। खिरनी बांधने से पतंग सूत-सावल में रह कर उड़ने लगती है। वैसे ही पतंग को हवा की कमी के बावजूद उड़ान देने के लिए कभी-कभी किसी सहायक द्वारा ‘उडांची’ भी दी जाती है।
इन सबसे इतर पतंगों को रिपेयर करने की भी एक अनुभवी इंजिनीयरिंग होती है। आज भले ही पतंगें ‘यूज एंड थ्रो’ पैटर्न वाली आती हैं। मगर एक जमाना था जब वृक्षों और तारों में उलझ कर आहत हुई पतंगों को मरम्मत कर भी सहेजा जाता था। फटी पतंगों को लेई से चिपकाना और टूटी हुई कांप को शल्य-क्रिया कर दुरुस्त करना किसी कारीगरी भरे इल्म से कम नहीं होता था। खैर, अब न वो नजर है, न ही वो नजारे। हम तो अपने हिस्से की पतंग कभी की उड़ा चुके। अब आप अपने हिस्से की पतंगबाजी कर मजा द्विगुणित कीजिए!

 

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