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शख्सियत: समाजवादी सपने का चितेरा ख्वाजा अहमद अब्बास

गरीब की भूख और अमीर की थाली के बीच की दूरी को वे नैतिक और व्यावहारिक दोनों ही स्तरों पर शिद्दत से खारिज करते रहे। रचनात्मकता के साथ लोकप्रियता और कामयाबी का साझा रचने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास ने सिनेमा से लेकर पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र को जिस तरह समृद्ध किया, वो बेमिसाल है।

ख्वाजा अहमद अब्बास एक पत्रकार, रचनाकार, कहानीकार और लेखक।

भारत में उस पीढ़ी का इतिहास अगर अलग से लिखा जाए, जिसकी तरुणाई ने गुलामी से आजादी का सफर पार किया, तो कई दिलचस्प नाम सामने आएंगे। ये वे नाम हैं जिन्होंने अपनी रचनात्मकता व उद्यम के साथ अपने ख्वाबों के हिंदुस्तान में इतने रंग भरे कि देखते ही देखते लंबी सियाह रात से निकला मुल्क सूरज की तरह हर क्षेत्र में चमकने लगा। ऐसा ही एक बड़ा नाम है- ख्वाजा अहमद अब्बास।

सात जून 1914 को ख्वाजा अहमद अब्बास का जन्म पानीपत में हुआ। उनका जन्म एक ऐसे खानदान में हुआ जिसका नाम और पगड़ी पहले से काफी ऊंची थी। उनके पिता गुलाम-उस-सिबतैन थे और मसरूर खातून उनकी मां थीं। उनके दादा ख्वाजा गुलाम अब्बास थे, जो 1857 के विद्रोह के शहीदों में से एक थे। उनके परदादा ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली बड़े शायर तो थे ही, मिर्जा गालिब के शार्गिद भी थे। दिलचस्प है कि अब्बास ने अपनी स्कूली पढ़ाई उसी हाली मुसलिम हाई स्कूल से पूरी की, जिसे उनके परदादा ने ही स्थापित किया था। बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी से बी.ए. (1933) और एल.एल.बी (1935) की पढ़ाई पूरी की।

अब्बास पत्रकारिता से आजीवन जुड़े रहे। वे सबसे पहले दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘नेशनल सेल’ से जुड़े। अगले ही साल उन्होंने ‘अलीगढ़ ओपिनियन’ नाम से एक साप्ताहिक पत्रिका शुरू की। यह विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए निकलने वाली देश की पहली पत्रिका थी। इसके बाद वे प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ से जुड़ गए। यहीं उन्होंने ‘लास्ट पेज’ नाम से अपना साप्ताहिक स्तंभ लिखना शुरू किया। यह स्तंभ लगातार 52 सालों तक विभिन्न अखबारों में छपा। 1987 में उनकी मौत तक प्रकाशित यह स्तंभ भारत के प्रिंट मीडिया के इतिहास में सबसे लंबे समय तक जारी रहने वाला स्तंभ है।

पत्रकारिता के बीच ही अब्बास ने फिल्मों की ओर भी रुख किया। उन्होंने पहली कहानी फिल्म ‘नया संसार’ के लिए लिखी। पर कुछ ही दिनों में वे फिल्म निर्माण के दौरान मूल कहानी में तब्दीली से खासे आहत हुए। इसके बाद वे फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कूद पड़े। उन्होंने 1945 में अपनी ही कहानी पर फिल्म बनाई- धरती के लाल। बंगाल के अकाल की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म से ही देश में रूमानी की जगह सख्त सच्चाइयों से टकराते सिनेमा का दौर शुरू हुआ। अमिताभ बच्चन जब हर जगह ठुकराए जा रहे थे तो अब्बास ने ही उन्हें अपनी फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ में मौका दिया। उन्होंने अपने अलावा अगर किसी के लिए सबसे ज्यादा फिल्में लिखीं, तो वे थे राज कपूर। आवारा, श्री 420, जागते रहो, मेरा नाम जोकर से लेकर बॉबी तक हिंदी सिनेमा के ‘ग्रेट शोमैन’ के साथ उनका रचनात्मक साथ बना रहा।

अब्बास ने 70 से ज्यादा किताबें भी लिखीं। दो खंडों में लिखे गए उनके उपन्यास ‘इंकलाब’ को आज भी मजहबी हिंसा पर लिखे गए बेहतरीन उपन्यासों में से एक माना जाता है। वे इप्टा के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। किताबों से लेकर फिल्मों तक उनके लेखन और चिंता में कहीं न कहीं समाजवाद का सपना झांकता है।

गरीब की भूख और अमीर की थाली के बीच की दूरी को वे नैतिक और व्यावहारिक दोनों ही स्तरों पर शिद्दत से खारिज करते रहे। रचनात्मकता के साथ लोकप्रियता और कामयाबी का साझा रचने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास ने सिनेमा से लेकर पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र को जिस तरह समृद्ध किया, वो बेमिसाल है।

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