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संस्कृति- खजुराहो में सिनेमा

दुनिया भर में मंदिरों पर उत्कीर्ण अपनी कामुक प्रतिमाओं के लिए जाना जाने वाला खजुराहो अब अपने अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के लिए भी प्रसिद्ध हो रहा है।
Author January 7, 2018 05:40 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

अजित राय

दुनिया भर में मंदिरों पर उत्कीर्ण अपनी कामुक प्रतिमाओं के लिए जाना जाने वाला खजुराहो अब अपने अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के लिए भी प्रसिद्ध हो रहा है। राजा बुंदेला की कंपनी प्रयास प्रोडक्शन और मध्यप्रदेश शासन के सौजन्य से तीन सालों में ही इस समारोह ने सिनेमा के मायने बदल दिए हैं। दुनिया में यह अपनी तरह का अकेला ऐसा फिल्म समारोह है, जहां बिना रोक-टोक हजारों की संख्या में ग्रामीण किसान-मजदूरों और औरतों की भागीदारी होती है।  अगर आपको पता चल जाए कि अगले सात दिन बाद दुनिया खत्म होने वाली है, तो आप क्या करेंगे? और यह खबर विश्व प्रसिद्ध अमेरिकी अंतरिक्ष शोध केंद्र नासा के हवाले से प्रसारित हो! आप जीवन के सारे जोड़-तोड़ छोड़ कर मरने से पहले सच्चे इंसान का जीवन जीना चाहेंगे। मध्यप्रदेश के पिछड़े इलाके बैतूल के करण कश्यप की फिल्म ‘दुनिया खत्म होने वाली है’ में एक गांव में लोगों को जैसे ही पता चलता है कि दुनिया खत्म होने वाली है, तो सबका जीवन अचानक बदलने लगता है। चोर चोरी करना बंद कर देता है, तो साहूकार ईमानदार बन जाता है। पति अपनी पत्नियों के प्रति उदार हो जाते हैं, तो दूसरे पैसों के पीछे भागना बंद कर देते हैं। यह तो एक बानगी भर है। मध्यप्रदेश के दूर-दराज गांवों-कस्बों से आए पचासों नौजवान फिल्मकारों ने खजुराहो में सिनेमा को सिर के बल खड़ा कर दिया है।

मुंबई से आए शेखर कपूर, जैकी श्रॉफ, प्रेम चोपड़ा, रंजीत, रमेश सिप्पी, गोविंद निहलाणी, मनमोहन शेट्टी, मीता वशिष्ठ, सुशांत सिंह, सुष्मिता मुखर्जी, गोविंद नामदेव सहित दर्जनों फिल्मकार खजुराहो, पन्ना और छतरपुर की धूल भरी गलियों में गेंदे की माला पहने लोगों को सिनेमा समझाते घूम रहे हैं। जैकी श्रॉफ सड़क किनारे फुटपाथ पर एक बुढ़िया चाय वाली की दुकान में खुद ही चाय बनाने लगते हैं। शाम को मुख्य मंच पर हजारों ग्रामीणों की किलकारी के बीच प्रेम चोपड़ा अपनी फिल्मों के डॉयलाग सुनाते हैं, तो रंजीत देवानंद की नकल उतारते हैं। शेखर कपूर बैंडिट क्वीन की यादें साझा करते हैं और पानी पर फिल्म बनाने के पुराने सपने का जिक्र छेड़ देते हैं। लोग जानना चाहते हैं कि मुंबई वाले बुंदेलखंड में फिल्म उद्योग के विकास में क्या योगदान कर सकते हैं। रमेश सिप्पी खजुराहो में अपने फिल्म स्कूल की शाखा खोलने की घोषणा करते हैं, तो वामन केंद्रे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ओर से नाट्य प्रशिक्षण शिविर लगाने का वादा करते हैं। उद्योगपति मयंक सिंह त्यागी, रमेश सिप्पी और शेखर कपूर की परियोजनाओं में धन लगाने की बात करते हैं, तो मध्यप्रदेश के प्रमुख सचिव (संस्कृति) मनोज श्रीवास्तव पूरे प्रदेश में सिनेमा संकुल बनाने का संकल्प दुहराते हैं।

यहां के नौजवान फिल्मकारों के पास न तो सिनेमा की आधुनिक शिक्षा है, न ही तकनीकी प्रशिक्षण। उनके पास कभी न खत्म होने वाली गांव-जवार की देसज कहानियों का खजाना और अपनी फिल्म बनाने का जूनून है। छतरपुर के नौजवान नितिन पटेरिया तो अपनी बुंदेली फिल्म ‘कर्ज का चक्रव्यूह’ सिनेमा घरों में प्रदर्शित कराने में भी सफल हो गए। अब वे अपनी दूसरी फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे हैं। अजय साहू की ‘धड़कोला’ एक कॉमेडी है, जिसमें बुंदेलखंड से होने वाले पलायन को दिखाया गया है। बुंदेलखंड में पलायन की दर पैंसठ प्रतिशत है। इसी तरह इटारसी के नेहा परिहार की ‘बिरयानी’ का नायक दुबई से लौट कर अपने गांव में बसना चाहता है, जिसे हर कोई बेवकूफ समझता है। निर्णय चौधरी (इंदौर) जहां घरों में बाल यौन शोषण को विषय बनाते हैं, तो परेश मसीह (होशंगाबाद) फायरिंग रेंज में गोलगट््टू बीनने वालों को, जहां की औरतों लगातार विधवा हो रही हैं। आशीष डोडवे (बड़वानी) 1857 की क्रांति के एक आदिवासी नायक भीमा के जीवन संघर्ष को सामने लाते हैं, तो समुद्र सोनिया (शहडोल) स्त्री मुक्ति की गंवई छवियों को दिखाती हैं। मध्यप्रदेश के सुदूर अंचलों से आए पचासों नौजवान फिल्मकारों ने अपने-अपने ढंग से अपने आसपास का सिनेमाई दृश्य रचा है। पिछले दो महीने से जगह-जगह घूम कर इन फिल्मकारों को संयोजित करने वाले आरिफ शहडोली कहते हैं कि यही लोग भविष्य का नया सिनेमा रचेंगे।

भोपाल से आई युवा फिल्मकार अभिलाषा श्रीवास्तव कहती हैं कि खजुराहो अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह की असली उपलब्धि यही नौजवान कस्बाई फिल्मकार हैं, जिन्हें अपनी फिल्में दिखाने का अवसर मिला। बड़े-बड़े स्टार तो आएंगे और चले जाएंगे। वे आगे कहती हैं कि यहां होने वाली सिनेमा की कार्यशालाओं से बहुत कुछ प्रेरणा मिलती है। राजा बुंदेला कहते हैं कि हर साल हम यहां से तीन नौजवान फिल्मकारों को चुन कर स्कॉलरशिप दे रहे हैं, जो अभिनय, सिनेमैटोग्राफी और निर्देशन में अनुपम खेर, रमेश सिप्पी और सुभाष घई के फिल्म स्कूल में आगे की पढ़ाई करेंगे।खजुराहो जैसे गांव में जहां आधा दर्जन फाइवस्टार होटल और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा तो है, पर एक भी सिनेमा हॉल नहीं है, अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का सपना देखना दूर की कौड़ी जैसा है। सुप्रसिद्ध फिल्मकार राजा बुंदेला और उनकी टीम ने मध्यप्रदेश शासन के सहयोग से न सिर्फ यह सपना देखा, बल्कि पिछले तीन सालों से इसे सफलता पूर्वक अंजाम भी दे रहे हैं। सन 2015 में तीन दिन, 2016 में पांच दिन और इस साल सात दिन (17-23 दिसंबर) का यह समारोह सिनेमा को किसान-मजदूरों और समाज के आखिरी पायदान पर खड़ी औरतों के बीच ले जाने का अभियान बन चुका है। खजुराहो के अलावा पन्ना और छतरपुर तक इसका विस्तार किया गया है।

राजा बुंदेला ने पूरे इलाके में पांच टपरा टांकीज बनवा कर सिनेमा हॉल की कमी को दूर करने की कोशिश की है। इसमें किसानों, नौजवानों, स्त्रियों और प्रायोगिक सिनेमा के दर्शकों के लिए फिल्में दिखाने का बंदोबस्त किया है। आसपास के पचास किलोमीटर के गांवों-कस्बों से बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, ट्रैक्टर, टैंपो और बसों-मोटरसाइकिलों से हजारों लोग हर सुबह खजुराहो पहुंचते हैं। दिन भर फिल्में देखते हैं और शाम को स्थानीय लोक-कलाकारों और मुंबइया कलाकारों के रंगारंग रस मंजरी का आनंद उठाते हैं। इसी कड़ी में महाकवि भास के ‘मध्यमव्यायोग’ का आदिवासी संस्करण ‘मोहे पिया’ की भव्य नाट्य प्रस्तुति ने नई गरिमा प्रदान की। मुंबई की मंडली ‘रंगपीठ’ की इस प्रस्तुति का निर्देशन किया देश के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी वामन केंद्रे ने, जो इस समय राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (नई दिल्ली) के निदेशक भी हैं।

खजुराहो अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह की असली उपलब्धि उन ग्रामीण औरतों का फिल्में देखना है, जिन्हें इसका अवसर नहीं मिलता। खजुराहो के गांधी चौक पर केवल महिलाओं के लिए एक टपरा टॉकीज बनाया गया, जहां स्त्री मुक्ति पर लगातार चर्चा चलती रही। पेरिस से आई मारियान बोर्गो ने यूरोप के स्त्रीवादी एजेंडे पर बात की, जिसका बुंदेलखंडी भाषा में सुष्मिता मुखर्जी ने अनुवाद किया। यहां कोई भी वीआईपी नहीं था। आम जनता अपने धूल सने पैरों के साथ सफेद गद्दों पर शाम से फिल्में देखती रही। राजा बुंदेला कहते भी हैं कि खजुराहो अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह न तो किसी व्यक्ति का है, न किसी राजनेता का, न किसी जाति या धर्म का है, यह यहां की जनता का है।
समापन समारोह में हरियाणा के राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी ने ठीक ही कहा कि राजा बुंदेला बुंदेलखंड को मुंबई ले जाने के बजाय मुंबई को ही खजुराहो ले आए हैं। बड़ी बात यह कि पिछले चार दशक से यहां का नृत्य समारोह खजुराहो की पहचान बना हुआ था, अब केवल तीन ही सालों में यह फिल्म समारोह खजुराहो की अंतरराष्ट्रीय पहचान बन गया है। ल्ल

 

 

 

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