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रविवारीः आपदा में बढ़े मददगार हाथ

प्राकृतिक आपदा पर किसी का वश नहीं है। अभी केरल में बारिश और बाढ़ के कारण लोगों को जैसी विपत्ति का सामना करना पड़ा, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। केदारनाथ की त्रासदी, कश्मीर की बाढ़, सुनामी, भुज का भूकंप आदि देश और दुनिया में प्राकृतिक आपदा के अनेक भयावह उदाहरण मौजूद हैं। अच्छी बात है कि ऐसी विपत्ति के समय हमेशा लोगों ने एकजुटता दिखाई और जिस भी तरह की मदद हो सकती थी, उपलब्ध कराने का प्रयास किया। पर अक्सर यह अनुभव रहा है कि आपदा के समय उपलब्ध कराई गई मदद ठीक तरीके से पीड़ितों तक नहीं पहुंच पाती। आपदा राहत के विभिन्न पहलुओं पर बात कर रहे हैं अभिषेक कुमार सिंह।

Author September 9, 2018 6:10 AM
केरल इधर इस बात का मॉडल बन गया है कि किसी प्राकृतिक आपदा में कितनी तरह की मददें आ सकती हैं।

मनुष्य के जितने भी धर्म बताए गए हैं, उनमें विपदा में फंसे व्यक्ति की मदद और उपेक्षितों-वंचितों को दिए जाने वाले दान की महिमा सबसे ऊपर है। पुराने वक्त में सेठ-साहूकार धर्मार्थ प्याऊ-बावड़ियां, राहगीरों के ठहरने के लिए धर्मशालाएं बनवाते थे। किसी पर कोई आपदा आती थी, तो वह अक्सर ऐसी ही पुण्यात्मा दानियों की ओर याचना से देखता था। तब यह भी होता था कि उसके जीवन-यापन का कोई प्रबंध दान-पुण्य के खाते में आई रकम या अनाज आदि से हो जाता था। विपत्ति में दानियों से दान के रूप में आने वाली राहत का बड़ा आसरा होता है और शायद यही वजह है कि इधर जब केरल में सदी की सबसे भीषण बाढ़ आई, तो देश ही नहीं, दुनिया के कोने-कोने से अलग-अलग शक्लों में राहतें आने लगीं। किसी ने पैसे भिजवाए तो किसी ने कंबल-कपड़े, किसी ने पंद्रह दिन के राशन और दवा-पानी का प्रबंध किया, तो कोई खुद सात समंदर पार कर जो बन पड़े, वह मदद करने चला आया। ब्रिटेन तक से आए वहां के नागरिक बाढ़ का पानी उतरने के बाद केरल के घरों में झाड़ू लगाते दिखाई दिए। पर क्या यह मदद काफी थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी मानवीयता अब मुसीबतों को बौना करने में हांफने लगी है या फिर जो राहत मिलनी चाहिए, उसके बजाय मनमर्जी या अपने किसी फायदे की मदद की जा रही है। अगर ऐसा है तो यह राहत की नई आपदा है, जिस पर केरल के प्रसंग से विचार की जरूरत बनती है।

जब कोई प्राकृतिक आपदा इतनी बड़ी हो, जितनी बड़ी केरल में बाढ़-बारिश से घटित हुई या इससे पहले जम्मू-कश्मीर, चेन्नई आदि में, तो उससे हुए नुकसान को पूरा करना और जनजीवन को पटरी पर लौटा लाना अकेले सरकार-प्रशासन के बूते का नहीं रह जाता है। कई स्वयंसेवी संस्थाएं जुटती हैं, मानवीय मदद करने वाली राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आगे आती हैं और कुछ मुल्कों की सरकारें विभिन्न राजनीतिक-अराजनीतिक कारणों से भारी-भरकम मदद भी भेजती हैं। टीवी, रेडियो, अखबारों और इंटरनेट पर जगह-जगह मदद की अपीलें की जाती हैं, कंपनियां अपने कर्मचारियों से वेतन का कुछ हिस्सा इस संबंध में कटौती की सहमति देने को कहती हैं और दफ्तरों में डोनेशन बॉक्स रखे जाते हैं, जिसमें आप जैसी चाहें, वैसी मदद या दान कर सकें। इस मदद में मीडिया संस्थानों की भी भूमिका इधर ज्यादा बढ़ गई है, क्योंकि वे अपने माध्यमों से बार-बार त्रासदी की भयावहता दिखा कर लोगों के दिलों में पसीज पैदा करते हैं और एक जरिया बनाते हैं ताकि मदद सही हाथों में और सही जगह पर पहुंच सके। कॉरपोरेट संस्थान भी इधर ऐलानिया ढंग से काफी मदद आपदाग्रस्त लोगों को पहुंचाने लगे हैं, पर बेशक उस मदद का अपना एक उद्देश्य है, जिसे समझने की जरूरत है।

केरल के नजरिए से सदी की सबसे बड़ी बाढ़ (जो कथित तौर पर बांधों को अचानक खोलने और बेहद भारी वर्षा के कारणों की देन बताई गई) पांच सौ के करीब मौतों और केरल सरकार के आंकड़ों के मुताबिक अनुमानत: साढ़े उन्नीस हजार करोड़ के नुकसान के साथ थमी। इस नुकसान की भरपाई के लिए अंदाजा है कि केरल को उनतालीस हजार करोड़ रुपए के निवेश की जरूरत होगी। इस दौरान बाढ़ प्रभावित पंद्रह लाख लोगों को करीब तीन हजार राहत कैंपों में रहने को मजबूर होना पड़ा। हजारों बेघर हो गए हैं। राज्य की ज्यादातर सड़कें तकरीबन क्षतिग्रस्त हो गर्इं। खेती-बाड़ी उजड़ गई। बड़े दायरे में भूस्खलन के शिकार हुए इडुक्की जिले के बारे में कहा जा रहा है कि वह चालीस साल पीछे जा चुका है। पानी उतरने के साथ बीमारियां फैलने की आशंका अलग से पैदा हुई।
सच पूछें, तो यह केरल का ही नहीं, पूरे देश का इम्तहान है।

खुद केरल सरकार का अंदाजा है कि इस त्रासदी से उबरने में उसे साल भर तो लग जाएगा, क्योंकि राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण का काम चंद हफ्तों या दो-एक महीनों में निपटाया नहीं जा सकता। भगवान का घर (गॉड्स ओन कंट्री) कहलाने वाले केरल को इन सब कामों के लिए केंद्र सरकार ने शुरुआत में ही पांच सौ करोड़ रुपए की अग्रिम मदद का एलान कर दिया था। केंद्रीय गृहमंत्री ने सौ करोड़ अलग से दिलाए। पर इनसे अलग ज्यादा बड़ा दिल देश ने दिखाया, जिसके कारण 31 अगस्त, 2018 तक मुख्यमंत्री राहत कोष में एक हजार छब्बीस करोड़ रुपए आ चुके थे। बताया गया कि इस राहत कोष में देश के 4.76 लाख लोगों ने योगदान दिया था। उल्लेखनीय बात यह है कि केरल को इस त्रासदी के जख्मों से उबारने के लिए और फंड इकट्ठा करने के लिए मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी लगातार कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि वह दुनिया भर में रह रहे मलयाली लोगों से संपर्क करेंगे।

मदद कैसी-कैसी

केरल इधर इस बात का मॉडल बन गया है कि किसी प्राकृतिक आपदा में कितनी तरह की मददें आ सकती हैं। मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री राहत कोष में पैसे भेजना एक अलग बात है, यों ज्यादातर लोग माली इमदाद भेज कर अपने कर्तव्य की इति मान लेते हैं। पैसे से इतर धोती, साड़ी, कंबल, तिरपाल, पैंट-कमीजें, कुर्ता-पैजामा, लेडीज सूट, तौलिए, बनियानें, हवाई चप्पलें, मच्छरदानियां, किचन सेट्स, दूध, चीनी, वाशिंग पाउडर, टूथपेस्ट, टूथ ब्रुश, मोमबत्तियां, बाल्टी आदि केरल में आई विनाशकारी बाढ़ से पीड़ित लोगों में वितरित करने के लिए भेजी गर्इं। उदाहरणार्थ सामान के ये ब्योरे एक राज्य (हरियाणा) की भारतीय रेडक्रास समिति के हैं, दूसरे राज्यों ने भी ऐसी ही राहतें भेजीं। एक आध्यात्मिक संस्था ने केरल को राहत सामग्री के जो साठ ट्रक भेजे, उनमें कपड़े, दवाइयां, खाना आदि पांच सौ टन आवश्यक सामग्री शामिल थी।

इसके अलावा इस संस्था के सौ स्वयंसेवक राहत कार्यों में अपनी सेवाएं देने पहुंचे। दर्जनों अन्य संगठनों में चावल, दाल, चीनी, नमक, खाना पकाने का तेल, चाय, नूडल्स, बिस्कुट आदि के पैकेट इस हिसाब से बना कर भेजे कि वह चार लोगों के परिवार की पंद्रह दिनों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। इसके अलावा केंद्र सरकार ने केरल भेजी जा रही राहत सामग्री पर कस्टम ड्यूटी और जीएसटी में 31 दिसंबर तक छूट का एलान करके सच में राहत दी।

इसी तरह, भारतीय रेलवे ने घोषणा की कि वह विभिन्न राज्य सरकारों के माध्यम से केरल भेजी जा रही राहत सामग्री को मुफ्त परिवहन प्रदान करेगी। मदद का एक चेहरा सांप पकड़ने वाले लोगों की भागीदारी के रूप में दिखा। ऐसे लोग बाढ़ के बाद केरल के घरों और सड़कों पर निकले सांपों को पकड़ कर उन्हें वापस जंगल में छोड़ने या वन विभाग के सुपुर्द करने निकले। सांपों की दहशत से बहुत से लोग अपने घरों में जाने को तैयार नहीं थे। बाढ़ की विभीषिका के बीच केरल में सेना के जवान हमेशा की तरह मुस्तैदी से स्थानीय लोगों के साथ बचाव कार्य में जुटे नजर आए। कई ऐसे वीडियो भी इस दौरान सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें सेना के जवानों और आम लोगों ने खुद को जोखिम में डाल कर बाढ़ में फंसे लोगों की मदद की। बाढ़ के पानी में लेट कर, खुद सीढ़ी बन कर आपदा प्रभावित लोगों को नाव में चढ़ाने की मिसाल पेश करने वाला शख्स तो खासी ख्याति पा गया।

सहायता और सवाल

बेशक, केरल को बाढ़ की त्रासदी से उबारने में राहत और बचाव कार्यों में जितना बड़ा दिल इस बार देश ने दिखाया, वैसा आमतौर पर नजर नहीं आता है। बचावकार्य में लगी टीमों का मत था कि खुद उनके कार्यकर्ताओं ने इससे पहले किसी आपदा में तमाम समुदायों के लोगों को राहत और बचाव में इतनी बड़ी तादाद में संलग्न नहीं देखा था और न ही देश-दुनिया से इतनी मदद आती दिखाई दी थी। लेकिन इस बीच जिस तरह से राहत सामग्री की चोरी या हेराफेरी की कुछ घटनाएं हुर्इं और संयुक्त अरब अमीरात की तरफ से करोड़ों डॉलर की मदद के आह्वान पर भारत सरकार के इनकार की खबरें प्रसारित हुर्इं और जिनका खुद यूएई की सरकार ने खंडन किया, उनसे कई सवाल पैदा हुए।

पहला तो यह कि क्या विदेशी मदद को इनकार करना जायज है और क्या ऐसा कोई एकीकृत व्यवस्था नहीं बन सकी है, जो सारी राहतों को एक जगह इकठ्ठा करते हुए धांधली-चोरी को रोके और वास्तविक जरूरतमंदों तक उन्हें पहुंचाए। हालांकि संयुक्त अरब अमीरात ने केरल को राहत के तौर पर अरबों डॉलर की मदद वाली खबर से इनकार कर दिया, लेकिन शुरुआत में जब यह समाचार फैला और भारत सरकार ने यूएई समेत किसी भी देश से सरकारी सहायता लेने से इनकार किया तो कुछ जगहों पर इसे दुराग्रही राष्ट्रगर्व तक कहा गया। उदाहरण दिया गया कि भारत इससे पहले आपदा में विदेशी मदद लेता रहा है। विपत्ति में सहायता लेने से प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आती। यह भी बताया गया कि महाशक्ति अमेरिका तक ने वर्ष 2005 में कटरीना चक्रवात के बाद छत्तीस देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की सहायता स्वीकार की थी। लेकिन यह एक अधूरा सच है।

असल में, कटरीना तूफान के बाद अमेरिका को यूएई समेत दुनिया के नब्बे देशों से कुल 85.4 करोड़ डॉलर की मदद की पेशकश की गई थी। इनमें वह थाईलैंड भी था, जिसने 2004 में ही सूनामी से भारी विनाश झेला था और वह क्यूबा भी था, जिस पर अमेरिका ने भारी प्रतिबंध लगाए थे। मुसीबत में फंसे अमेरिका को इन देशों ने अपने डॉक्टरों की टीम की मुफ्त सेवाएं लेने का प्रस्ताव किया था। लेकिन अमेरिका ने इनमें से कुछ को छोड़कर ज्यादातर पेशकश ठुकरा दी थी। जैसे, ग्रीस (यूनान) से दो क्रूज जहाज भेजने के प्रस्ताव को अमेरिका ने नहीं माना था, क्योंकि उसकी व्यावहारिकता नहीं थी। ये जहाज अमेरिका पहुंचने में चार हफ्ते लगने थे, जबकि उनकी जरूरत तत्काल थी।

यह एक तथ्य है कि अमेरिका ने कनाडा, इजरायल और ब्रिटेन जैसे मित्र देशों के सतहत्तर प्रस्तावों में से मदद की चौवन पेशकश नामंजूर कर दी थी। हालांकि किसी आपदा के वक्त विदेशी मदद झूठे या सच्चे गर्वबोध का विषय भी बन जाती है। सच्चा गर्वबोध वह है कि संसार की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश भारत अगर केरल जैसी आपदा के समय एकजुट होकर अपने लोगों की मदद के लिए उठ खड़ा हो। लेकिन दंभ और शत्रुता में जरूरत के वक्त भी विदेशी सहायता नकार दे तो ऐसा झूठा गर्वबोध किस काम का। वर्ष 2005 में भारत-पाकिस्तान सीमा पर आए विनाशकारी भूकंप के बाद जब भारत ने पाकिस्तान को आर्थिक मदद के रूप में ढाई करोड़ डॉलर का चेक दिया था, तो पाकिस्तान ने उसे भुनाया ही नहीं था, जबकि उसे इसकी काफी जरूरत थी। जहां तक विदेशी सहायता ठुकराने के भारत सरकार की ताजा पहल की बात है, तो इस मामले में यह कहना समीचीन होगा कि विदेशी मदद से केरल को भले ही बचा लिया जाता, लेकिन इससे आर्थिक तौर पर मजबूत होते राष्ट्र की छवि खंडित होती। केरल डूबने से बच जाता पर राष्ट्र डूब जाता। साथ ही यह याद रखने की जरूरत भी बनती है कि मदद करके बड़प्पन दिखाने के अलावा जरूरत के वक्त मदद स्वीकार कर लेने से कोई छोटा नहीं हो जाता है।

एक जरूरत इधर और दिखाई दी है। केरल की आपदा ने देश के सामने एक सबक पेश किया है कि बाढ़, भूकंप जैसी त्रासदियों के बाद राहत-पुनर्वास के नाम पर दुनिया भर से आई मदद को कैसे चैनलाइज किया जाए, ताकि वे ठीक ढंग से प्रभावित स्थान तक पहुंच सकें और जितनी जरूरत है, मदद में सिर्फ उतनी चीजें आएं और पीड़ितों तक सीधे पहुंचें। केरल त्रासदी के बाद देश के कोने-कोने से दान में जुटाए गए कपड़े, कंबल और घरेलू इस्तेमाल की दर्जनों चीजें दान में जुटाई जा रही हैं, पर सवाल है कि क्या उन सब चीजों की केरल के प्रभावितों को जरूरत होगी। हो सकता है कि दान में पुराने कपड़े, खिलौने और रोजमर्रा के ऐसे तमाम सामान हों, जिन्हें कथित दानियों ने दानपात्र में महज यह सोच कर डाला होगा कि हमें तो इनकी जरूरत नहीं है, पर ये केरलवासियों के काम आ सकती हैं। यह एक गलत धारणा है। इसलिए कह सकते हैं कि दफ्तरों में रखे गए दानपात्र एक अच्छी मंशा के प्रकटीकरण के सिवा कोई और मकसद हासिल नहीं कर पाते हैं।

हो सकता है कि केरल के बाढ़ पीड़ितों को इस वक्त किसी रोजगार की सबसे ज्यादा जरूरत हो। प्रश्न है कि जो नीता अंबानी 21 करोड़ की मदद लेकर केरल गई थीं, क्या उनकी कंपनी रोजगार खो चुके केरल के बाशिंदों की इस मामले में कोई मदद करेगी। इसी तरह जरूरी है कि बाढ़ में तहस-नहस हो चुके हजारों घरों का पुनर्निर्माण किया जाए, जो सिर्फ पैसे भेजने से नहीं होगा, बल्कि इसके लिए ऐसे स्वयंसेवकों की जरूरत है, जो मकान बनाना जानते हों और महीनों इसके लिए वहां जाकर टिक सकें। संदेह नहीं कि ऐसी आपदाएं आगे भी आती रह सकती हैं, सैकड़ों-हजारों के सामने जिंदगी पटरी पर लाने और रोजी-रोजगार के मसले आगे भी उठ सकते हैं, पर अब उनका काम सिर्फ चंद डॉलर का चेक रवाना कर देने और दवाओं-खाद्य सामग्रियों आदि के पैकेट भेजने से नहीं चलने वाला। विपदा में मदद करने का अगर दिल में कोई हौसला है, तो जरूरी है कि मदद देने का परंपरागत ढर्रा भी बदले।

कैसे करें मदद

अगर आपके पास अपनी जरूरत से ज्यादा पैसे हैं, तो पैसे भेज कर और अगर अपना बहुमूल्य समय दान करने की क्षमता है, तो प्रभावित इलाकों में अपनी योग्यतानुसार पुनर्वास-पुनर्निर्माण का काम पकड़ कर सहायता की जा सकती है। पर कुछ सावधानी बरत कर हम अपनी मदद को बेजा जाने से रोक सकते हैं:

इंटरनेट ने यह काम इधर आसान कर दिया है। रेडक्रास और यूनिसेफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ही नहीं, ठीक-ठाक एनजीओ और ज्यादातर मीडिया संस्थानों (जो मदद के कार्यक्रम चलाना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं) की भी अब अधिकृत वेबसाइटें होती हैं। इन पर जाकर पता लगाया जा सकता है कि कहां-किस मदद की जरूरत है और वह किस रूप में भेजी जा सकती है। ये वेबसाइटें प्रभावित इलाकों और पीड़ितों की जरूरत के हिसाब से अपडेट भी की जाती हैं, लिहाजा जरूरत से अलावा मदद भेजने और उनके बेजा चले जाने की संभावना इनसे सीमित हो जाती है।

बाढ़-भूकंप जैसी त्रासदी में जीवित बचे लोगों को दवाओं, कपड़ों और खाने-पीने के सामानों की सबसे पहले जरूरत होती है। अगर मददगार लोग उन्हें कपड़े, जूते, जुराबें, कंबल, बिछावन की चादरें, मच्छरदानी, टेंट, साबुन के अलावा जरूरी दवाएं और स्थानीयता के मुताबिक भोजन सामग्री और पानी भेजते हैं और ये चीजें खराब होने से पहले उन तक पहुंच जाती हैं, तो यह एक बड़ी राहत होती है। सरकार सेना की मदद से ऐसी जगहों से हेलीकॉप्टर से सबसे पहले यही सामान को मुहैया कराती है। अच्छा यही होगा कि ये सभी सामान नए हों, न कि खुद के इस्तेमाल किए हुए।

हमारे देश में स्वैच्छिक रक्तदान को लेकर ज्यादा प्रेरणाएं नहीं हैं, इसलिए जब-तब अस्पतालों तक में खून की कमी पड़ जाने के मामले सामने आते हैं। बाढ़ आदि आपदा के समय बीमारों और घायलों को अक्सर खून की जरूरत पड़ जाती है। ऐसे में अगर लोग समय-समय पर अपने आसपास लगने वाले ब्लड डोनेशन कैंपों में नियमित रूप से रक्तदान करते हैं, तो विपदा के वक्त उनका यह योगदान काफी काम आता है।

दानी बनना और स्वयंसेवक बनना आसान नहीं है। अपने दफ्तरों में डोनेशन बॉक्स रख कर दान की अपील करने वाली बड़ी कंपनियां अगर अपने कर्मचारियों से यह कहें कि वे बीमारी की उन छुट्टियों का इस्तेमाल पीड़ितों की मदद में करेंगे तो उनके सालाना अप्रेजल में इसका ध्यान रखा जाएगा, तो यह एक बड़ी पहल होगी। कंपनियां ऐसे कर्मचारियों को प्रभावित इलाकों में लाने-ले जाने का प्रबंध भी कर सकती हैं।

– पेशे से डॉक्टर, इंजीनियर और अध्यापक जैसे लोग आपदा के वक्त और बाद में अपनी सेवाएं प्रभावित इलाकों में आसानी से दे सकते हैं। इसी तरह से आध्यात्मिक गुरु भी विपदा के कारण किसी अवसाद या ट्रॉमा में फंसे लोगों को नई राह दिखाने में मददगार साबित हो सकते हैं।

– अगर प्रभावित इलाकों के आसपास रहने वाले लोग कुछ वक्त के लिए पीड़ितों को अपने घर में आसरा दे सकें और उनके रहने, खाने-पीने आदि का इंतजाम अपने ऊपर ले सकें, तो यह भी एक बड़ी राहत होती है।

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