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कहानी: ‘किनारे पर खड़ी लड़की’

उत्तर में ठंडे अंदाज में पतली-दुबली लड़की के शब्द थे- ‘आई विल एप्रीशिएट दिस।’

Author June 3, 2018 6:33 AM
‘किनारे पर खड़ी लड़की’

मीरा सीकरी

विभाजन के समय पाकिस्तान से लुट-पिट कर आए शरणार्थियों को यहां बसाया गया था। उस समय इसे रिफ्यूजी कॉलोनी के नाम से जाना जाता था। कर्मठ शरणार्थियों ने छोटी-मोटी दुकानदारी से लेकर अपनी-अपनी योग्यता अनुसार ट्यूशन करने से लेकर ऑटोरिक्शा, फोरसीटर तक चलाने में हिचक नहीं दिखाई। आज उन्हीं धंधों को वे बड़े व्यवसाय का सम्मानित रूप देने में कामयाब हुए हैं। छठे दशक में इसी कॉलोनी के पास खुले सरकारी कॉलेज में वह लेक्चरर नियुक्त हुई थी। भाई नौकरी कर ही रहा था। इस कॉलोनी में सस्ते किराए पर घर मिल जाने से मां के साथ वे दोनों पुरानी दिल्ली के नाना के घर से यहां आ गए थे। आसपास अभी कुछ प्लॉट खाली पड़े थे। छोटे-छोटे प्लॉट होने के कारण मां को लगा था कि वे अगर अपना मोटा जेवर बेच दें और अपने पास रखे डेढ़-दो हजार रुपए मिला लें तो यहां एक प्लॉट खरीद सकती हैं।

उसके कॉलेज की सहेली के पिता एलआईसी में बड़े अधिकारी थे, उन्होंने उसके नाम से कर्ज मंजूर करवा दिया था। एक साल के अंदर उनका अपना घर तैयार हो गया था। मां बहुत खुश हुई थीं कि बच्चों की हिम्मत से छोटी उम्र में ही उनका घर बन गया।
भाई का ब्याह हुआ। मां ने सबके सुख के लिए, भाई के हाथ में पहली मंजिल की चाभियां पकड़ार्इं और आशीर्वाद दिया कि अपने मन मुताबिक स्वतंत्र जिंदगी जियो। ग्रांउड फ्लोर पर वह मां के साथ थी। भाई और वह मिल कर किश्तों में कर्ज उतार रहे थे। वह अपनी पढ़ाई-लिखाई में मस्त थी। न भाई ने और न मां ने ही उस पर ब्याह का जोर दिया, न उसने ही कोई रुचि दिखाई। कॉलोनी में जिस तरह का माहौल था, उसमें वह अपने आप को सबसे अलग और विशिष्ट महसूस करती।

कॉलेज के सदाबहार परिवेश में, किताबों की दुनिया में जीती वह सचमुच सुखी थी। अपनी विवाहित सहेलियों की भागदौड़ वाली, तनाव भरी जिंदगी से मुक्त। ‘कितनी जल्दी बीत गई जिंदगी’ वह सोच रही थी। रिटायरमेंट नजदीक आया तो वह उदास हो गई थी- ‘अब क्या होगा?’ शायद उसके जीवन के अंंधेरे पक्ष की शुरुआत हो गई, वरना भाई का देहांत अभी क्यों होता- भाभी विदेश बसे बेटे के साथ क्यों चली जाती? नहीं नहीं, उसे उदास नहीं होना। नहीं, न वह फलां की बहन मात्र है, न फलां की बुआ- वह रिफ्यूजी कॉलोनी के अन्य वरिष्ठजनों की तरह अपनी मेहनत से जो है सो है। वह न ओल्ड हाऊस में जाएगी, न भतीजे के पास विदेश।

अंतमुर्खी होने की वजह से आसपास, पड़ोस में उसके मुखर संबंध लगभग न के बराबर हैं, पर सब उसे जानते-पहचानते हैं और उसे विश्वास है कि सब उसके हितचिंतक हैं। वह जैसे अब तक सहज ढंग से जीती रही है, वैसे ही रहेगी और यत्नपूर्वक सामाजिक और व्यावहारिक होने की कोशिश करेगी। इसके लिए उसने नियमित रूप से सुबह सैर को जाना शुरू कर दिया। एक समय था जब उसे लगता था कि अगर सूरज चमक आया तो वह सैर के लिए निकल नहीं पाएगी। उसे सुबह की सैर के समय अपने और निकलती सुबह के बीच में किसी की दखलंदाजी पसंद नहीं। अब वह जानबूझ कर सुबह के साढ़े सात और आठ के बीच घर से पार्क जाने के लिए निकलती है। इस सैर से दिन भर के लिए अपनी बैटरी चार्ज तो हो ही जाती है, इसी चक्कर में जरूरत का सामान भी ले लिया जाता है। किसी से बात हो न हो, चेहरों की पहचान यह आश्वस्ति दे जाती है कि ‘तुम अकेली नहीं हो’।

अचानक अपने नाम से बुलाए जाने पर वह चौंक गई थी। यों उसे अच्छा लगा था कि वे उसके चेहरे से ही नहीं पहचानतीं, उसका नाम भी जानती हैं। लगभग उसी की उम्र की, वे उससे कह रही थीं- ‘जानती हैं आप, उस पेड़ में ‘अंबी’ लगी है- मेरे घर की बालकनी तक तो बांहें फैलाए रहता है- बरसों से पत्ते ही पत्ते हिलाता…’उनकी खुशी में साथ देते हुए उसने भी ऊपर देखते हुए उनकी अंबी को ढूढ़ने की कोशिश की, पर दिखाई न देने पर ‘कहां है… कहां है?’ कहने पर वे उसका हाथ पकड़ कर ठीक उस बिंदु पर ले आई थीं, जहां से मुंह ऊपर करने पर पत्तों में दुबकी, नन्ही-मुन्नी अमिया झांकती हुई दिख रही थी। मूक हरीतिमा के साथ उनके इस आत्मीय संबंध से वह प्रभावित हुए बिना नहीं रही थी। उनका कहना था- मित्र-सहेली के नाम पर उनका आसपास किसी पर भरोसा नहीं- अपना सुख दुख तो मैं इन्हीं से बांटती हूं। उसे लगा था अपनी इस दुनिया में उन्होंने उसे भी शामिल कर लिया। किस कुंज में ताजा फूल निकला है- खुशबू देती कलियां किस कुंज में हैं, वे उसे बता जाती थीं।

उनसे रोज मुलाकात न होने पर भी फूलों-फलों और पत्तों तक की छवि में उसका उन्हीं से मिलना होता था। रविवार और गरमी की छुट्टियों में सुबह आठ बजने से पहले ही बच्चे क्रिकेट-फुटबॉल या बैडमिंटन खेलने के लिए इकट्ठा हो जाते हैं। पगपथ पर चलते हुए वह चिंतित हो जाती है कि बच्चों की उड़ाई हुई गेंद उसे लग न जाए- अक्सर वह प्यार से उनको कहती है- ‘देखो, लोग अभी सैर कर रहे हैं, ध्यान रखना तुम्हारी बॉल किसी को हिट न करे।’ उसे लगता है यह उसकी असुरक्षित मानसिकता की प्रतिक्रिया है।

पार्क के पूर्वी कोने में जहां चार बेंचें आमने-सामने गड़ी हुई हैं- वहां रिटायर्ड पुरुषों की एक टोली रोजाना इकट्ठा होती है। उसके पहुंचने के समय तक वे लौटने की तैयारी कर रहे होते हैं। उसे अच्छा लगता है, अगर वह उनके ओम जाप की सामूहिक लय-तान को पकड़ पाए। बैठक समाप्ति की इस ध्वन्यात्मक घोषणा से वह अपने आप को संकरे पगपथ पर एक तरफ हाशिए में कर लेती है। वैसे मोटे गिट्ठे भाई, जो नीम के पत्ते और निबौलियां सबको बांटते हैं, उनसे मांग कर लेने में भी वह हिचकती नहीं, असुविधा उसे तब होती है जब वे सब जोर-जोर से तालियां बजाते, अट्टहास करते, एक जुलूस की तरह सामने आ पड़ते हैं। ऐसे में उसकी समझ में नहीं आता कि वह किधर को होए, कहां जाए? अचानक चुप हुए उस समूह मे से एक साथ कई आवाजें उसके कानों में पड़ती हैं- मैडम को पहले जाने दो!… बहन जी आप इधर से आइए!… घबराई हुई-सी वह किनारे की टहनियों-पत्तों और कांटों को छूती हुई-सी निकल जाती है। बिना हंसी की आवाज के उसे लगता है, वे हंस तो नहीं रहे?

दिसंबर या जनवरी की बहुत ठंडी सुबह रही होगी, वह मुंह-सिर लपेटे पार्क में पहुंची ही थी कि जवान, छरहरी-सी दिखती युवती अंग्रेजी में उससे पूछ रही थी- ‘आप उन्हें जानती हैं?’

उसने इधर-उधर देखा, वहां उन दोनों के अलावा और कोई था ही नहीं। ‘तुम किसके बारे में कह रही हो?’

– आपके यहां एंटर करते ही, जो आपको विश कर रही थीं।

– ओह! अच्छा, हां, जानती हूं।

– आप उनसे कह देंगी कि वे ऐसा क्यों करती हैं?

– ऐसा माने?

– हमारे छोटे-छोटे बच्चे यहां खेलते हैं, वे टहनियों पर कुछ लटका जाती हैं। मिट्टी में कुछ गाड़ जाती हैं।

– तुम्हारा मतलब किसी जादू-टोने से है?

– आई मीन, अगर वे ऐसा करती रहीं, तो हम पुलिस में शिकायत कर देंगे।

– तुमने खुद ही उनसे क्यों नहीं कह दिया?

– वे मेरी पहुंच में नहीं थीं। उनको पकड़ने से पहले ही वे बाहर निकल चुकी थीं।

– दरअसल, मैं जानती ही कितना हूं उन्हें… हां , मेरे घर से दो-चार मकान परे वे रहती हैं… सामने पड़ने पर हलो, नमस्कार जरूर हो जाता है। मुझे दिख गर्इं या उनका फोन नंबर मेरे पास हुआ, तो तुम्हारा संदेश जरूर पहुंचा दूंगी। वैसे मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि इस इक्कीसवीं सदी में कोई टोना-टोटका क्यों करने लगा? फिर भी पूरी कोशिश करूंगी कि तुम्हारा मैसेज उन्हें मिल जाए।

– थैंक यू मैम।

अगली ही सुबह वे उसे मिल गई थीं। बिना कोई भूमिका बांधे उसने, उनसे पूछा था- एक पतली-सी लड़की, आपने भी उसे जरूर यहां देखा होगा, कल मुझसे कह रही थी कि आप वहां पेड़ों के पास कुछ न कुछ रख कर जाती हैं। – क्या! उसकी पूरी बात सुने बिना ही वे उबल पड़ी थीं- मैं समझ गई, वह लड़की बुड़-बुड़ करती, गुस्सैल आंखों से मुझे देखा करती है… मैं भी देख लूंगी उसे।

– देखिए, तैश में मत आइए… उसका कहना है कि वे लोग यहां ज्यादा पैसे देकर इस हिस्से की साफ-सफाई कराते हैं और आप यहां अपने घर का कूड़ा-कचरा भी डाल जाती हैं।

– कूड़ा-कचरा कहां, मैं तो यहां कबूतरों के लिए बाजरा-वाजरा डालती हूं, बचे हुए दानों की थैली-पन्नी माली या चौकीदार को बता कर यहां अटका जाती हूं। आपको शायद मैंने बताया नहीं कि एमसीडी सभासद के साथ मैं बात कर रही हूं कि यहां पार्क में कूड़े-कचरे की पेटियां लगवा दें। इस हिस्से में रहने वाले समझते हैं कि इस बाग पर उनका मालिकाना हक हो गया- चाहे हों हममें से किसी के किराएदार। बाग हम सबके लिए है। आप तो जानती हैं कि मैं आपकी कितनी इज्जत करती हूं। आपने तो देखा है कि हमारे बाप-भाइयों ने इस कॉलोनी को यह रूप देने के लिए कितनी मेहनत की, पर किस्मत की मार कहिए कि सब कुछ होते हुए भी हम लोगों के बच्चे-भाई, मां-बाप को अकेला छोड़ कर कोई अमरीका चला गया, कोई लंदन, तो कोई दुबई। कल के आए हुए ये नए लोग क्या जानें? आप मेरी बात समझ रही हैं न- आजकल तो समाजसेवा करना भी गुनाह हो गया है- आप देखिएगा, हो सकता है, कचरा पेटियां आज-कल में ही लग जाएं।

– आप जरूर समाजसेवा के इरादे से बहुत कुछ कर रही होंगी, पर देखिए आजकल किसी का किसी पर भरोसा नहीं रहा। वह लड़की अगर आवेश में पुलिस को शिकायत कर देगी, तो फालतू में आपकी फजीहत हो जाएगी। अच्छा तो यह होगा कि अगर वह लड़की आपको मिले, तो बिना गुस्सा किए, यह सब उसे समझा दें।

उसी समय वह पतली लड़की भी उनके पास आकर खड़ी हो गई थी। उन दोनों को आमने-सामने खड़ा पाकर उसको ठीक यही लगा कि वह पार्क का एक चक्कर लगा ले। पगपथ पर चलती हुई वह मन ही मन कामना कर रही थी कि वे दोनों आपसी बातचीत से ही किसी समाधान पर पहुंच जाएं। उसकी संभावना के विरुद्ध, चक्कर पूरा कर उनके पास पहुंचने से पहले ही उसके कदम रुक गए थे। गुस्से से भरी तेज खरखराती आवाज उसके कान सुन रहे थे- ‘तुम समझती क्या हो अपने आप को? देखना, मैं आज ही यहां कचरा पेटियां लगवा कर रहूंगी।’

उत्तर में ठंडे अंदाज में पतली-दुबली लड़की के शब्द थे- ‘आई विल एप्रीशिएट दिस।’

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