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रविवारी शख्सियत: ज्योतिराव फुले

गरीबों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने 24 सितंबर 1873 में ‘सत्य शोधक समाज’ का निर्माण किया। वे स्वयं इसके अध्यक्ष थे और सावित्री बाई फुले महिला विभाग की प्रमुख। इस समाज का मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अति शूद्रों को उच्च जातियों के शोषण से मुक्तकराना था।

जनसत्ता शख्सियत- ज्योतिराव फूले।

ज्योतिराव गोविंदराव फुले समाज सुधारक, विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक और क्रांतिकारी कार्यकर्ता थे। इन्हें महात्मा फुले एवं ज्योतिबा फुले के नाम से भी जाना जाता है। ज्योतिबा ने जीवन भर दलितों, महिलाओं और समाज के उत्थान के लिए कार्य किया।

आरंभिक जीवन
आधुनिक भारत में बड़ी सामाजिक क्रांति लाने वाले ज्योतिबा फुले का जन्म पुणे में हुआ था। उनकी माता का नाम चिमणाबाई तथा पिता का नाम गोविंदराव था। उनका परिवार कई पीढ़ी पहले सतारा से पुणे आकर फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करने लगा था। इसलिए उनकी पीढ़ी ‘फुले’ के नाम से जानी गई। ज्योतिबा फुले का बचपन कई कठिनाइयों में बीता। वे महज नौ माह के थे जब उनकी मां का देहांत हो गया। उनका लालन-पालन एक बायी ने किया। ज्योतिबा ने कुछ समय पहले तक मराठी में अध्ययन किया, बीच में पढाई छूट गई और बाद में 21 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी से सातवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की।

सावित्री बाई फुले
1840 में ज्योतिराव फुले का विवाह सावित्री बाई से हुआ, तब वे मात्र 12 वर्ष के थे। ज्योतिराव के कार्यों में सावित्री बाई फुले ने बराबर का योगदान दिया। उस समय समाज में महिलाओं को कोई स्थान प्राप्त नहीं था, न ही उन्हें पढ़ने लिखने की अनुमति थी। इस रीति को तोड़ने के लिए ज्योतिराव फुले ने पत्नी के साथ मिल कर 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। यह भारत में लड़कियों के लिए खुलने वाला पहला विद्यालय था। सावित्रीबाई फुले स्वयं इस स्कूल में लड़कियों को पढ़ाने के लिए जाती थीं। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था। उन्हें लोगों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। उन्होंने हार नहीं मानी, आगे चलकर सावित्री बाई फुले एक महान समाज सेविका के तौर पर जानी गईं। ज्योतिबा फुले ने बाद में लड़कियों के लिए तीन और स्कूल खोले।

‘प्रार्थना समाज’ की स्थापना
ज्योतिराव के जीवन में महत्त्वपूर्ण मोड़ वर्ष 1848 में आया जब वे अपने एक ब्राह्मण मित्र की शादी में हिस्सा लेने के लिए गए, जहां उनका अपमान हुआ। इसके बाद उन्होंने तय किया कि वे सामाजिक असमानता को उखाड़ फेंकने की दिशा में कार्य करेंगे। जाति-प्रथा का विरोध करने और एकेश्वरवाद को अमल में लाने के लिए उन्होंने ‘प्रार्थना समाज’ की स्थापना की।
दलितों को बराबरी का दर्जा दिलाने, शूद्रों और महिलाओं में अंधविश्वास के कारण उत्पन्न हुई आर्थिक और सामाजिक विकलांगता को दूर करने के लिए भी आंदोलन चलाया। वे बाल-विवाह के मुखर विरोधी और विधवा-विवाह के पुरजोर समर्थक थे। 1854 में विधवाओं के लिए उन्होंने आश्रम भी बनवाया था।

‘सत्य शोधक समाज’ का निर्माण
गरीबो और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने 24 सितंबर 1873 में ‘सत्य शोधक समाज’ का निर्माण किया। वे स्वयं इसके अध्यक्ष थे और सावित्री बाई फुले महिला विभाग की प्रमुख। इस समाज का मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अति शूद्रों को उच्च जातियों के शोषण से मुक्तकराना था।

उनकी समाजसेवा देखकर 1888 में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें ‘महात्मा की उपाधि दी गई। ‘सत्य शोधक समाज’ के माध्यम से उन्होंने वेदों को ईश्वर रचित और पवित्र मानने से इनकार कर दिया। उस समय ऐसा करने की हिम्मत करने वाले वे पहले समाजशास्त्री और मानवतावादी थे। इसके बावजूद वे आस्तिक बने रहे। उन्होंने मूर्ति पूजा का भी विरोध किया और चतुर्वर्णीय जाति व्यवस्था को ठुकराया।

महात्मा फुले ने समाज कार्य करते हुए अनेक पुस्तकें भी लिखीं। इनमें ‘तृतीय रत्नत, ‘ब्रह्माणंचे कसाब’, ‘इशारा’, ‘पोवाडा-छत्रपति शिवाजी भोंसले यांचा’, ‘अस्पृश्यांची कैफियत’ इत्यादि प्रमुख हैं।

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