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समाज : कानून से पहले

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो से मिले आंकड़ों के मुताबिक भारत में 2013 में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध के 3.09 लाख मामले दर्ज हुए। इनमें बलात्कार के 33,707, अपहरण और शोषण के 51,881, दहेज हत्या के 8,083, घरेलू हिंसा के 1,18,886 मुकदमों के अलावा अन्य कई मामले भी शामिल हैं।
Author नई दिल्ली | January 17, 2016 01:59 am
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो से मिले आंकड़ों के मुताबिक भारत में 2013 में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध के 3.09 लाख मामले दर्ज हुए।

कानून बदल गया। अब सोलह साल की आयु में जघन्य अपराध करने वाले किशोरों को भी बालिग की तरह सजा का प्रावधान होगा। निर्भया मामले में नाबालिग अपराधी की रिहाई का विरोध करने वाले काफी लोग संतुष्ट नजर आ रहे हैं और कानून में संशोधन करने वाले नेता इसे अपनी उपलब्धि मान कर इतरा रहे हैं। ऐसे में एक सवाल यह भी है कि कानून तो बदल गया, लेकिन क्या समाज बदला? क्या अब एक बलात्कार पीड़िता को लोग संभ्रांत लोग अपने घर की बहू बनाएंगे, क्या अब सड़क से गुजरती पीड़िता को देख लोग कानाफूसी करना बंद कर देंगे, क्या उस पीड़िता के चरित्र पर लोग सवाल उठाना बंद कर देंगे? जवाब होगा, शायद नहीं, क्योंकि कानून बदला है, समाज नहीं।

गौर करने वाली बात यह भी है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध सिर्फ किशोर ही नहीं करते। इसलिए सजा के लिए उम्र घटाने या बढ़ाने के अलावा न्याय दिलाने की प्रक्रिया में तेजी और समाज की मानसिकता में बदलाव के लिए भी कोशिश की जाए तो ज्यादा बेहतर होगा।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो से मिले आंकड़ों के मुताबिक भारत में 2013 में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध के 3.09 लाख मामले दर्ज हुए। इनमें बलात्कार के 33,707, अपहरण और शोषण के 51,881, दहेज हत्या के 8,083, घरेलू हिंसा के 1,18,886 मुकदमों के अलावा अन्य कई मामले भी शामिल हैं। आंकड़ों के अनुसार हर अपराध में बीते साल की तुलना में वृद्धि हुई है, जबकि अपराधी को सजा इसलिए दी जाती है ताकि अपराधों को कम किया जा सके। ऐसे में, अगर हमारे देश में अपराध कम होने के बजाय दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं तो आखिर इसका क्या मतलब निकाला जाए? मतलब साफ है कि या तो हमारे देश की कानून व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही या फिर न्याय की धीमी रफ्तार ने अपराधियों को इतना बेखौफ कर दिया है कि उन्हें पूरा विश्वास है कि वे बच जाएंगे।

ब्यूरो उन अपराधों के आंकड़े जारी करता है जो दर्ज हुए हैं। लेकिन, उन अपराधों का क्या जो घर की चहरदीवारी के भीतर होते हैं और उनमें दबकर रह जाते हैं। कई बार रिश्तेदारों से लेकर पिता से जुड़े अपराध तक सामने आते हैं। लेकिन, घर की झूठी इज्जत और शान का हवाला देकर उन चीखों को दबा दिया जाता है। कई बार माता-पिता इसलिए मामला दर्ज नहीं कराते कि बलात्कार की बात सामने आने पर उनकी बेटी का हाथ कौन थामेगा। ऐसे में अगर हम महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को किसी आंकड़ों में कैद करना चाहें, फिर भी कई छूट जाएंगे। अगर बात महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध की है तो फिर सिर्फ बलात्कार के मामले ही क्यों, दहेज हत्या, शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न, मान-हत्या, घरेलू हिंसा, मानव तस्करी आदि में हर साल वृद्धि दर्ज की जा रही है।

अगर कई मामलों में अपराध दर्ज नहीं होते तो कई दर्ज मामलों में भी इंसाफ नहीं मिलता। बात सिर्फ निर्भया की ही क्यों, हर पीड़िता की क्यों नहीं? कहते हुए अच्छा तो नहीं लगता, लेकिन यह सच्चाई है कि आज निर्भया को न्याय दिलाने के लिए आवाज उठाता समाज कल किसी और के चरित्र पर अंगुली उठा सकता है?

बलात्कार की यातना यही है कि अपने साथ हुए जबर्दस्ती से, ज्यादा दर्द उस दाग को लेकर जीने में है। यह समाज, जो घरेलू हिंसा की शिकार औरत को आवाज उठाता देख उसके चरित्र पर ही सवाल उठा देता है, जो अपने बलात्कारी और हत्यारे बेटे तक को सजा मिलने से तो बचाना चाहता है, लेकिन अगर बेटी अपनी मर्जी से हमसफर चुने तो उसे मौत के घाट उतारने में गुरेज नहीं करता। जो अपने बेटे की पढ़ाई तक का खर्चा बहू के मां-बाप से वसूलना चाहता है और चाहत पूरी न होने पर उसे दहेज के नाम पर जला डालता है, जो सोशल मीडिया पर महिला सशक्तीकरण की बात करता है और अपने घर में अपनी बीवी से ढंग से पेश नहीं आता, जो अपनी बेटी और बहन के खिलाफ हुए छेड़छाड़ का विरोध करता है, लेकिन दूसरी महिला को छेड़ने का मौका नहीं छोड़ता। ऐसे समाज को विरुद्ध भी आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है।

सामाजिक असमानता की यह कहानी घर से ही शुरू होती है। बचपन से किशोरावस्था तक लड़की को उसके लड़की होने का अहसास कराया जाता है। तौर-तरीकों से लेकर चलने का लहजा, बोलने का ढंग, जोर से न हंसना, सीने पर दुपट्टा रखने आदि की की नसीहतें दिनरात पिलाई जाती हैं। दूसरी ओर लड़के के लिए ऐसी कोई बंदिश नहीं होती। ऐसे में वे बालक जो बचपन से अपनी बहनों और दूसरी लड़कियों को सामाजिक दायरों में कैद देखता है, वह खुद को शक्तिशाली समझने लगता है। माता-पिता भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाते हैं। लड़के रोते नहीं हैं, कमजोर नहीं होने से लेकर हर बात पर उसे उसकी मर्दानगी का अहसास कराया जाता है। ऐसे में जब इस सामाजिक असमानता और शक्तिशाली होने का जहर बचपन से ही फैलना शुरू हो जाता है तो बड़ा होकर वह अपना रंग दिखाएगा ही। अधिकतर लोग अपराधों को इंटरनेट और सूचना तकनीकी से जोड़ रहे हैं, लेकिन समाज में व्याप्त मानसिकता का को नहीं देखना चाहते, जो कि हर अपराध की जड़ में मौजूद है।

हालांकि, पहले के मुकाबले महिलाएं जागरूक हुई हैं और अपने लिए जीना सीख रही हैं। वो न्याय के लिए अदालतों के दरवाजे भी खटखटा रही हैं, लेकिन यह वाकई शर्मनाक है कि न तो महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की घटनाएं कम हो रही हैं और न ही न्याय प्रक्रिया में तेजी लाई जा रही है। कई बार तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने से भी इन्कार कर देती है। औरत को विभिन्न रूपों में जाना जाता है।

एक बेटी, एक पत्नी, एक मां, जो दूसरों के दर्द को भी अपना लेती है। ऐसे में अगर वो कभी अपने खिलाफ हुए जुर्म के खिलाफ आवाज उठाती है तो सोचिए कि उसके जख्म कितने गहरे होंगे। यहां महिला सुरक्षा की बात इसलिए नहीं हुई क्योंकि जिस दिन लोगों की मानसिकता बदल जाएगी, उस दिन किसी महिला को सुरक्षा की जरूरत नहीं होगी, न अपराध होंगे, न संसद को कानूनों में संशोधन करने पड़ेंगे। इसलिए उम्र चाहे जितनी भी घटा या बढ़ा ली जाए, अपराधों को नहीं रोका जा सकता और अगर अपराधों को जड़ से खत्म करना है तो पहले समाज को बदलना होगा।

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