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चिंता- संकट में कठपुतली कला

एक जमाना था जब प्रदेश स्तर पर लोककलाओं को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम होते थे तो यही कलाकार प्रमुखता से हिस्सा लेते थे लेकिन अब वे सभी बदहाली की जिंदगी के जी रहे हैं।

Author March 19, 2017 5:33 AM
प्रतीकात्मक फोटो

कठपुतली कला में भारत का कभी बड़ा नाम था, लेकिन आज यह कला खात्मे की ओर अग्रसर है। इस कला ने कभी विदेशों में भी देश का परचम लहराया था। भारत को अलग पहचान दिलाई थी। जब हुनर ही हाशिए पर आ जाए तो यकीनन हसरतें बेमानी सी हो जाती हैं। उंगलियों का हुनर दिखाने वाले कलाकारों को अब उंगलियों पर ही गिना जा सकता है। कभी कठपुतली की कला से देश विदेश में चर्चा बटोरने वाले कलाकार आज दो वक्त की रोटी के लिए भी मोहताज हैं। कहने को तो दिल्ली में एक कठपुतली कालोनी ही है, लेकिन वहां बदहाली का साम्राज्य है। राजस्थान से आए करीब ढाई सौ कलाकार ऐसे हैं, जिन्होंने कठपुतली की कला को देश-विदेश में पहुंचाया। यही नहीं जब रोटी का जुगाड़ नहीं हो पाता तो बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तो मानो सपना ही है। सरकार की तरफ से भी उन्हें मदद नहीं दी जा रही। कलाकार बताते हैं कि जब चुनाव नजदीक आते हैं तो जरूर कुछ नेता कठपुतली कॉलोनी में दिखाई पड़ते हैं। बाद में कोई दिखाई नहीं देता। कलाकारों ने बताया कि अब उनको बदहाली में रहने की आदत पड़ गई है। उनको अब कोई कुछ भी दिलासा दिलाए, फर्क नहीं पड़ता। दिल्ली निवासी एक कठपुतली कलाकार ने बताया कि उसके पिता ने उसे यह कला सिखाई थी। लेकिन, अब इससे इतनी भी कमाई नहीं हो पाती कि वह अपना पेट भर सके।

अ सल में, कठपुतली कला सबसे राजस्थान में फली-फूली। राजस्थान में इस कला को लोकनृत्य का दर्जा हासिल है। पहले इस कला के कद्रदान हुआ करते थे। राजा-महाराजाओं के द्वारा इसका संरक्षण किया जाता था। लेकिन वक्त ने इस कला को खात्मे की ओर धकेल दिया है। कहने को तो केंद्र से लेकर राज्यों में भी लोककलाओं को जीवित रखने और उनके कलाकारों को पालने-पोसने के लिए तमाम संस्थाएं हैं। मगर सबसे ज्यादा किसी कला की उपेक्षा हुई है तो वह है कठपुतली कला। अगर सरकारों ने जल्द ही इस ओर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले वक्त में यह कला इतिहास बन कर रह जाएगी। समय की मार के चलते अधिकांश कठपुतली कलाकारों ने इस कला से किनारा कर लिया है। उनमें से कई तो ऐसे हैं जो ढोल आदि बजाने की तरफ चल गए हैं। एक ढोल बजाने से उनकी थोड़ी-बहुत आमदनी हो जाती है। शादी-ब्याह के मौकों पर या भजन-कीर्तन मंडलियों में उन्हें ढोल बचाने का अवसर मिल जाता है। कठपुतली के कार्यक्रम भी किसी सरकारी प्रचार-प्रसार के मौके पर साल में इक्का-दुक्का ही मिल पाते हैं।

एक जमाना था जब प्रदेश स्तर पर लोककलाओं को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम होते थे तो यही कलाकार प्रमुखता से हिस्सा लेते थे लेकिन अब वे सभी बदहाली की जिंदगी के जी रहे हैं। ऐसे कलाकार भी हैं जो महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और राजस्थान के लोकनृत्यों में पारंगत हैं, लेकिन उन्हें कद्रदान न मिलने से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ ही सबसे बड़ी पहेली बन गई है। इन कलाकारों के बच्चे भी ढोल बजाना सीख रहे हैं। कुछ इंवेट कंपनियों ने कठपुतली कलाकारों को कार्यक्रम दिलाने का बीड़ा उठाया था, लेकिन वे भी सिर्फ इन कलाकारों का शोषण ही करती रहीं। कार्यक्रमों से मिलने वाली बड़ी राशि कंपनियां खुद हजम कर जातीं और कलाकारों को सौ-दो सो रुपए दे कर विदा कर देतीं। लिहाजा, यह रिश्ता भी ज्यादा दिन नहीं पल पाया। १

 

 

 

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