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नन्ही दुनिया- कहानी: स्केको

स्केको क्या है? नन्हे लकी के अलावा यह बात और कोई नहीं जानता था। सुबह से ही वह अपनी टूटी-फूटी जुबान में रट लगाए हुए है, ‘स्केको चाहिए, स्केको चाहिए।’ उसकी बात किसी की भी समझ में नहीं आ रही थी।

Author November 25, 2018 4:47 AM
प्रतीकात्मक फोटो

 

सिराज अहमद

स्केको क्या है? नन्हे लकी के अलावा यह बात और कोई नहीं जानता था। सुबह से ही वह अपनी टूटी-फूटी जुबान में रट लगाए हुए है, ‘स्केको चाहिए, स्केको चाहिए।’ उसकी बात किसी की भी समझ में नहीं आ रही थी। जब कुछ देर हो गई, तब तो उसने रोना भी शुरू कर दिया। मम्मी हजारों बार उससे पूछ-पूछ कर थक चुकी हैं, लेकिन उन्हें भी इसका अंदाजा तक नहीं लग पा रहा कि आखिर उसे चाहिए क्या। घर के सारे छोटे-बड़े लकी को समझाने में लगे हैं। उसकी दीदी शन्नो, जो उसके इशारों तक को पढ़ लिया करती थी, वह भी आज बेबस दिख रही है। वह भी बस उसे चुप कराने में लगी है। लकी को कई तरह से बहलाने-फुसलाने की कोशिश की गई। पापा ने चॉकलेट का लालच दिया, मम्मी ने लॉलीपॉप का। दादा तो दौड़ कर पास की दुकान से क्रीमवाला बिस्किट भी ले आए। उसे चुप कराने के लिए चाचा ने अपने स्मार्ट फोन में उसका मनपसंद कार्टून मोटू-पतलू लगा दिया।
थोड़ी देर तो वह बहला, लेकिन फिर से उसने वही जिद पकड़ ली। घर के हर सदस्य ने जितनी कोशिश हो सकी, की, पर लकी को कोई मना नहीं पाया।

पापा के धैर्य का बांध तो टूट ही गया। उन्होंने गुस्सा कर लकी को जोर से डांट दिया। पापा की डांट तो उसे वैसे ही बहुत लगती है। इस बार भी सीधे दिल पर जा लगी और वह सिसकियां भर-भर कर रोने लगा। दादा ने दौड़ कर उसे गले से लगाया और पापा को कस के फटकारा। तब जाकर कहीं लकी का रोना बंद हो पाया, लेकिन जिद तब भी नहीं छूटी।
अब क्या किया जाए? सब इसी सोच में पड़ गए। लकी को बहलाने की अब तक की सारी तरकीबें नाकाम हो चुकी थीं।
अब दादा उसे गोद में लेकर बाहर घुमाने निकल पड़े। एक दुकान पर पहुंच कर उसे कैंडी दिलाई। फिर कुछ नन्हे खिलौने। खैर, इस बार लकी ने कोई नखरा नहीं किया। तभी लकी को पास में ही एक गुब्बारेवाला खड़ा दिखा। उसका चेहरा खुशी से चमक उठा।
वह गुब्बारेवाले की तरफ इशारा करते हुए जोर से बोला, ‘वो रहा स्केको! मुझे स्केको चाहिए।’
दादा समझे कि वह गुब्बारे को ही स्केको कह रहा है। वह तुरंत उसकी ओर लपके। लकी ने अपनी पसंद का जो गुब्बारा लिया, उसमें एक लंबी डंडी लगी हुई थी और उस पर एक बड़ी-बड़ी मूछोंवाला डरावना चेहरा बना था।
गुब्बारा हाथ में आते ही लकी खुश हो गया। बहुत खुश हो गया। जैसे उसे उसकी खोई दुनिया मिल गई हो। दादा भी उसकी खुशी देख कर खुश हो गए। उन्होंने राहत की सांस ली और घर की ओर चल पड़े।
लकी के हाथों में गुब्बारा देख कर मम्मी बोलीं, ‘अच्छा, तो साहब को यह चाहिए था।’
तभी पापा के साथ शन्नो भी आंगन से कमरे में दाखिल हुई। शन्नो ने जैसे ही लकी के हाथों में गुब्बारा देखा, तो कुछ याद करके वह हंस पड़ी।
चाचा आए तो लकी खुशी से बोला, ‘देखो चाचू, मेरा स्केको!’
अब चाचा लगे उसे प्यार से समझाने, ‘यह स्केको नहीं, बैलून है!’
‘नहीं, स्केको है।’ लकी गुस्सा होते हुए गुर्रा कर बोला, तो चाचा का चेहरा देखने लायक हो गया।
शन्नो तो इस बार और जोर से हंस दी। चाचा फिर से कुछ कहते, उससे पहले ही शन्नो ने सबको बताना शुरू कर दिया, ‘पिछले हफ्ते जब हम नाना के गांव घूमने गए थे, तो खेत में लकी ने ‘स्केयर क्रो’ देखा था। नाना ने बताया था कि फसल को जानवरों और पक्षियों से बचाने के लिए इसे खेत के बीचोंबीच खड़ा कर देते हैं। उसने काफी समय ‘स्केयर क्रो’ के साथ बिताया था। वह इसे बहुत अच्छा लगा था। उसे ही यह अपनी जुबान में ‘स्केको’ कह रहा है।
शन्नो की बात सुन कर सबने गुब्बारे को गौर से देखा और सबके सब ठहाका मार कर हंसने लगे। लकी भी अपने स्केको को इधर-उधर लहरा कर, खुद भी झूमते हुए हंसने लगा। ०

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