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कहानी: कृपया ध्यान दीजिए

रविवारी कहानी

Author November 11, 2018 2:04 AM
प्रतीकात्मक फोटो

अर्पण कुमार
कमलेश माथुर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर कई घंटे से बैठा हुआ था, अपनी गाड़ी का इंतजार करता हुआ। स्टेशन पर गहमा-गहमी थी। शाम से ही कमलेश इधर-उधर टहलता हुआ अब थक गया था। दुनिया भर की आवाजें और भागमभाग से वह आजिज आ चुका था। उसे उद्घोषणा सुनना बड़ा अच्छा लगता था, मगर कई घंटे की इस प्रतीक्षा में अब कुछ भी सुहा नहीं रहा था। ‘अनाउंसमेंट केबिन’ से लगातार उद्घोषनाएं जारी थीं… कृपया ध्यान दीजिए। इलाहाबाद के रास्ते पुरी को जाने वाली 12815 पुरी एक्सप्रेस कुछ ही देरी में प्लेटफॉर्म नंबर दस पर आ रही है। ऐसी ही कुछ और ट्रेनों के नाम और उनके नंबर उद्घोषित हो रहे थे। अलग-अलग ट्रेनों के आगमन-प्रस्थान की अनवरत उद्घोषणा में सिर्फ उसी ट्रेन को लेकर चुप्पी बनी हुई थी, जिस ट्रेन से उसे जाना था। कमलेश माथुर के कानों में चाहे-अनचाहे ये मिश्रित ध्वनियां लगातार आ रही थीं। बस नहीं आ रही थी तो उसकी ट्रेन। धीरे-धीरे उसका गुस्सा बढ़ने लगा था। अंगीठी पर देर से रखी केतली में मानो पानी अब उबलने लगा हो।

रात गहराने लगी थी। नई दिल्ली के प्लेटफॉर्म नंबर सोलह पर बैठा कमलेश अब तेज सर्दी के झोंकों से जूझ रहा था। एक अंग्रेजी पत्रिका के गट्ठर पर बैठा और अपने शरीर को सिकोड़े वह ठंड से बचने की कोशिश कर रहा था। उसकी बार्इं तरफ दूर तक नई दिल्ली स्टेशन के प्लेटफॉर्म पसरे हुए थे। अनाउंसर महिला की आवाज हिंदी-अंग्रेजी में बारी-बारी से जारी थी… कृपया ध्यान दें… जब कोई इंजन अपने तेज हॉर्न के साथ किसी ट्रेन में लगने को जा रहा होता, तो उसके हॉर्न के शोर में उद्घोषिका की आवाज कुछ देर के लिए मानो थम-सी जाती। मगर उस आवाज की खनक कुछ देर में वापस अपने पुराने अंदाज में वापस आ जाती। कमलेश माथुर को भी पूर्वा एक्सप्रेस के प्लेटफॉर्म छोड़ कर चले जाने का इंतजार था, ताकि वहां उसकी ट्रेन आकर लगे। वह शायद भूल गया था, उसकी इच्छा से रेलवे का परिचालन नहीं हो रहा है।

कुछ देर में पूर्वा एक्सप्रेस चली गई, मगर उसकी जगह कुछ देर में कोई दूसरी ट्रेन आकर रुक गई। उसके तन-मन की थकान गहराती जा रही थी। उसे अपनी ट्रेन का बेसब्री से इंतजार था, ताकि अपनी लोअर बर्थ पर लेटकर वह आराम से अपने पैर सीधा कर सके। वह सुबह से घर का निकला हुआ था। पहले ऑफिस और फिर वहीं से सीधा स्टेशन। उसे रेलवे की नपी-तुली उद्घोषणाएं जहर उगलती लग रही थीं। भन्नाए हुए कमलेश ने सिगरेट जला लिया और अपने भीतर के गुस्से को ठंडा करने का विफल प्रयास करने लगा। दूर सामने से धुंधला दिखते रेलवे ओवरब्रीज के नीचे कुछ कुत्तों के आपस में लड़ने और भौंकने की आवाज आ रही थी। ओह… ये कुत्ते भी कितना भौंकते हैं। जब देखो, एक-दूसरे को काट खाने पर तत्पर रहते हैं। कुछ देर में उनका शोर कुछ स्पष्ट सुनाई देने लगा। वे अब इस तरफ ही आ रहे थे। उसे तेज भौंकते एक कुत्ते में अपनी कंपनी के मालिक का चेहरा नजर आया। मुरारी सेठ। वह बात-बात में इसी तरह भौंकता है! घर जाने में छुट्टी देने के लिए भी कितना आनाकानी कर रहा था! बड़ी हील-हुज्जत के बाद किसी तरह वह मान पाया था। इस समय भी उसे अपने सेठ की थुलथुल काया उसकी आंखों के सामने उभर आई और उसकी कर्कश आवाज उसके कानों में पिघले शीशे की तरह उबलने लगी।

बीच-बीच में महिला स्वर को रोक कर कर्कश, अनौपचारिक पुरुष स्वर जल्दी काम निपटाने के अंदाज में माइक पर प्रकट हो जाता और ट्रेन के आगमन-प्रस्थान संबंधी सूचना को एक झटके में सुना कर फारिग हो जाता। मजे की बात यह कि यात्रियों को उस लय-विहीन आवाज की सूचना साफ-साफ समझ में आ रही होती। वह कानों के पास ठक्क से लगती। बिना किसी आरोह-अवरोह के उद्घोषक एक सांस में घोषणा कर रहा था… 12502 पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति, कानपुर सेंट्रल के रास्ते गुवाहाटी से आने वाली, आज देर से आएगी। कमलेश बैठे-ठाले प्लेटफॉर्म का मुआयना करने लगा। उसने देखा, हाथ की एक ठेलागाड़ी पर कागज में लिपटे सामान करीने से एक-दूसरे के ऊपर सजे हुए थे। किसी-किसी ठेले पर ये सामान तीन-चार मंजिल तक रखे हुए थे। कुछ ऐसे ही जैसे मुंबई और अन्य शहरों में जन्माष्टमी के मौके पर बाल-गोपालों का झुंड अपने-अपने मुहल्लों के हिसाब से मानव-मंजिल बना कर हवा में लटक रहे मक्खन के मटके को फोड़ा करता है। कमलेश की निगाह एक कोने में खड़े एक ठेले तक जाकर रुक गई। पैरों में चमरौंधे जूते पहने और शरीर पर चादर ताने कोई श्रमिक उस ठेले पर लेटा हुआ था।

अपने हुलिए से अधेड़ दिखता वह श्रमिक इस वक्त किसी भी तरह अपनी नींद पूरी कर लेना चाहता था। कमलेश ने सोचा, श्रम-क्लांत शरीर को ठंड में वह मामूली झीनी ऊनी चादर कुछ तो राहत दे ही रही होगी। कमलेश को यह दृश्य कारुणिक और राहतभरा लगा। कारुणिक इसलिए कि वह तसल्ली से और विधिवत सो नहीं सकता। वह कार्य के बीच में कार्य के साथ और अपने कार्य-स्थल पर ही सोया हुआ है। राहतकारी इसलिए कि चलो किसी भी हाल में, उसकी नींद पूरी तो हो रही है। रात के एक बज रहे थे और एक पॉलीथीन बीनने वाले ने पंद्रह और सोलह नंबर प्लेटफॉर्म के बीच से अपनी कुबड़ी आकृति को तेजी से घिसटते हुए पूरी निगाह अपने मतलब की प्लास्टिक सामग्री छांटने पर लगा रखी थी। वह जिस तेजी से यहां तक आया था, उसी तेजी से आगे निकल गया। जाड़े की रात में गिरती ओस और कंपकंपाती ठंड, दिल्ली के इस ‘ब्रह्मराक्षस’ के पैर को थामने में हर तरह से विफल हो कहीं दूर पीछे घिसटती चली जा रही थी।
इधर, लाल टोपी, जैकेट और जींस पहने, हाथ में एक वायरलेस सेट लिए एक रेलवेकर्मी ठेले पर सोते उस मजदूर को धौंसभरी आवाज में बेवजह डांटता हुआ आगे बढ़ गया। शुक्र था कि उसने उस मजदूर को जगाया नहीं। एक जगह से दूसरी जगह को जाते-आते और जूट और नायलॉन की चद्दरों में लिपटे कुछ स्कूटरों और बाइकों पर भी कुछ सवारियां कमलेश की ही तरह बैठ कर अपनी ट्रेन के आने का इंतजार कर रही थीं। तभी हाथ में कागज का एक पन्ना और कलम लिए, सिर पर मंकी कैप लगाए एक अधेड़ रेलवे-कर्मी आया और कमलेश के ठीक सामने ठेले पर लदे नौ-मंजिले सामान में से एक सामान को बाहर निकाल कर देखा और चलता बना। उसके साथ उसका एक सहायक भी घिसटता चला जा रहा था। दोनों रहस्यमय तरीके से किसी कानाफूसी में व्यस्त थे और उसे इस वक्त किसी जासूसी फिल्म के किरदार नजर आ रहे थे।

कमलेश जिस जगह बैठा हुआ था, वहां पर अमूमन ट्रेन का आखिरी हिस्सा ‘वैगेज ब्रेक’ आकर लगता था, इसीलिए प्लेटफॉर्म पर ये सामान उसके आसपास बिखरे हुए थे। प्लेटफॉर्म पर और पटरियों के आसपास लोहे के खंभों पर लगी ट्यूबलाईट और इक्के-दुक्के मगर शान से खड़े मास्ट-लाईट पर भी धुंध की छाया गहराती चली जा रही थी। नई-दिल्ली-डिब्रूगढ़ राजधानी एक्सप्रेस अपने लाल डिब्बे की भव्यता के साथ सरकती हुई एक दिशा से दूसरी दिशा की तरफ जा रही थी। वह ट्रेन खाली थी और किसी प्लेटफॉर्म के किनारे न लग कर बीच में रुकी हुई थी। कुछ देर में वह पीछे होने लगी। पटरियों के ऊपर प्लेटफॉर्मों को एक-दूसरे से जोड़ने वाले ओवरहेड पुल पर लोगों का आगमन अब काफी थम चुका था। प्लेटफॉर्म नंबर सोलह पर ठीक-ठाक भीड़ थी, जिसे ‘संपूर्ण क्रांति’ के आने का इंतजार था, मगर ‘संपूर्ण क्रांति’ थी कि आए नहीं आ रही थी। कमलेश को भी उसी ट्रेन से एक सेमिनार में भाग लेने पटना जाना था। घोषणा हुई, …पटना को जानेवाली संपूर्ण क्रांति अभी तकनीकी देखरेख में यार्ड में है।

कमलेश माथुर की आंखें उनींदी हो रही थीं। मगर घोषणाओं की आवृत्ति और ठंडी हवा की चोट रह-रह कर उसकी आंखें खोल दे रही थीं। वह अपने आसपास देखने लगा। यही कोई दस मिनट की झपकी के बाद, इस बार फिर उसकी आंखें खुलीं। दो ठेलों के बीच में रह कर एक श्रमिक पहले ठेले के बाएं हैंडल और दूसरे ठेले के दाएं हैंडल को पकड़े बखूबी दोनों ठेलों को साथ ठेलता हुआ आगे बढ़ता चला जा रहा था। कमलेश ने बेमन से घड़ी की ओर नजर डाली। डेढ़ बज रहे थे। मन में आक्रोश उपजा। क्या मजाक है! उसकी ट्रेन जाने कब आएगी! तभी एक पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी को किसी तरह निपटा लेने की भूमिका में अपने डंडे सहित चहलकदमी करता हुआ इस तरफ आया और प्लेटफॉर्म पर लगे सफेद बोरों में मोटे-मोटे गट्ठरों की तीन-मंजिला सेट को एक निगाह मारता हुआ आगे बढ़ गया। तभी सामान के गट्ठर की छत पर एक भूरे रंग का कुत्ता आकर बैठ गया और अपने मुंह को अपनी पूंछ से लगा कर सो गया। कमलेश मन हुआ कि वह उसे भगा दे, मगर जाने क्या सोच कर वह चुप बैठा रहा। कमलेश की पीठ के पीछे बैठे दो लोग चाय की तलाश में पीछे की ओर प्लेटफॉर्म के मुख्य हिस्से पर चले गए और कमलेश अपनी अकड़ी हुई पीठ के साथ वहीं खड़ा रहा। कुछ देर तक बंद रही उद्घोषणा फिर शुरू हो गई थी।

कमलेश को जाने क्या सूझा, वह प्लेटफॉर्म से बाहर निकला, अजमेरी गेट की तरफ जाने लगा। रात के पौने दो बज रहे थे। वह आसपास का मुआयना ले रहा था। तभी अपने होठों से बीड़ी लगाते हुए और अपने शरीर पर मैला कुचैला शॉल ओढ़े हुए एक अधेड़ ने उसकी ओर इत्मीनान भरी निगाहों से देर तक देखा। वह देखना कम घूरना अधिक था। या यों कहें कि वह घूरना कम, निरखना ज्यादा था। या फिर यह कि वह निरखना कम और किसी व्यक्ति को टटोलना अधिक था। कमलेश ने उसे निराश नहीं किया और आंखों ही आंखों में उससे सवाल किए। कमलेश द्वारा दिखाई गई रुचि से उसकी बाछें खिल गर्इं। उसने नशा कर रखा था। इसलिए कुछ लड़खड़ाया, मगर कमीशन के लोभ ने उसमें एक त्वरित ऊर्जा का संचार कर दिया। वह इस जाड़े में कमलेश के भीतर वासना की आग को जगाना चाह रहा था।

कुछ ही देर में कमलेश, जीबी रोड के चिर-परिचित बदनाम माने जाने वाले मुहल्ले में था। छोटे-छोटे कमरे, सीलन से भरे हुए। अस्थायी रूप से सस्ते और पतले प्लाईवुड से किए गए पार्टीशन। यहां रात जवान थी। कुछ लोग अपने दैहिक तनाव में घूमते और कुछ उसे फ्लश करके बाहर आते दिख रहे थे। उसे भी एक खोखे के पर्दे के आगे खड़ा कर उसका दलाल यह कहता चला गया, ‘अभी एक आदमी अंदर है। जैसे ही वह बाहर आएगा, तुम भीतर चले जाना।’ कुछ सशंकित सा वह इधर उधर देखने लगा। वह एक संकरी सी गैलरी में खड़ा था। उसके दाएं-बाएं तरफ ऐसे कई खोखे थे। डिब्बेनुमा हर कमरे के दरवाजे पर कोई न कोई आदमी खड़ा था। उसे ऐसे कोठों के दृश्यों से जुड़ी कई फिल्में याद आ गर्इं। कमलेश डर गया। इस खोखे तक आते हुए उसे कई ऐसे खोखे पार करने पड़े। उस सीलन भरी गैलरी में एक मटमैला और धूल चढ़ा आदमकद शीशा था। उसके ऊपर पीले रंग का एक बल्ब जल रहा था। कमलेश को यह हिम्मत नहीं हुई कि वह उस शीशे में अपना चेहरा देख सके। वह अंदर तक कांप गया। वह दरवाजे से ही लौट गया। शरीर की उत्तेजना कुछ ऐसे गायब हुई जैसे फूले हुए गुब्बारे में कोई पिन चुभोने से उसकी हवा गायब होती है। वह झटपट तेज कदमों से दौड़ता हुआ किसी तरह यहां से निकल भागना चाहता था। रास्ते में कुछ कुत्ते दिखे। उनपर बुरी तरह चिल्लाता हुआ वह आगे बढ़ा।

स्टेशन के कुछ बाहर से ही ‘संपूर्ण क्रांति’ के प्लेटफॉर्म पर लगे होने की उद्घोषणा सुनाई दे रही थी। गाड़ी संख्या 12394 संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस, कानपुर सेंट्रल, मुगलसराय के रास्ते पटना को जाने वाली, प्लेटफॉर्म नंबर सोलह पर खड़ी है। हम आपकी सफल, सुखद और मंगलमय यात्रा की कामना करते हैं। उसे यह उद्घोषणा प्रिय लगी। उसने सहसा आकाश की ओर देखा। धुंधले आकाश में जयप्रकाश नारायण की शक्ल का तारा अब कुछ इत्मीनान से चमक रहा था। वह प्लेटफॉर्म नंबर सोलह पर आया और वहां खड़ी ट्रेन के कोच नंबर एस-12 में चढ़ गया और अपनी निर्धारित सीट पर आकर बैठ गया। ट्रेन अभी रुकी हुई थी, मगर उसकी सांस काफी तेज चल रही थी।

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