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मीरां और महात्मा

मीरांबाई भक्त कवयित्री थीं। कृष्ण की अनन्य भक्त। पति का घर छोड़ उन्होंने कृष्ण में अपना मन रमा दिया था। उनके गीतों में प्रेम की गहरी अनुभूति है। गांधी मीरां की इस प्रेमानुभूति से बहुत गहरे प्रभावित थे। उन्होंने मीरां के गीतों की न केवल भक्ति-गीत के रूप में व्याख्या की, बल्कि उनमें व्यावहारिक जीवन दर्शन पाया। गांधी ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में मीरां की चेतना को बहुत मूल्यवान माना और उन्हें विश्वास था कि अगर देश की हर स्त्री में मीरां जैसा भाव आ जाए, तो समाज का कायाकल्प हो जाए। महात्मा गांधी किस कदर मीरांबाई से प्रभावित थे, बता रहे हैं कमल किशोर गोयनका।

Author January 27, 2019 12:04 AM
गांधी के शब्दों में मीरांबाई ‘महान सत्याग्रही’ थीं। वे दक्षिण अफ्रीका के अपने आंदोलन से ही मीरां की इस सत्याग्रही शक्ति से शक्ति प्राप्त कर रहे थे और मीरां के अपने सत्य के लिए निर्द्वंद्व भाव से विषपान का बार-बार स्मरण करते हैं। गांधी मीरां के पति से अपने सत्य के लिए असहयोग करने का समर्थन करते हुए कहते हैं कि हमारे धार्मिक ग्रंथ ऐसे असहयोग का समर्थन करते हैं। हमारी परंपरा में प्रह्लाद ने अपने पिता से, विभीषण ने अपने क्रूर भाई से तथा मीरां ने अपने पति से असहयोग करके कुछ भी अनुचित नहीं किया।

कमल किशोर गोयनका

मीरांबाई भक्तिकाल की सर्वोत्कृष्ट भक्त कवयित्री थीं। भक्तिकाल में गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, कबीर और जायसी जैसे महाना कवि उत्पन्न हुए। इन महाना कवियों में मीरांबाई भी अपने वैशिष्ट्य के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं, बल्कि अगर यह कहा जाए कि वे अपने प्रकार की अकेली कवयित्री हैं तो अतिशयोक्ति न होगी। वे केवल कवयित्री नहीं थीं, बल्कि ऐसी भक्त कवयित्री थीं, जिनका उदाहरण मिलना दुर्लभ है। वे ऐसे समय में जन्मी थीं, जब देश में भक्ति-आंदोलन चल रहा था और अगर ग्रियर्सन के शब्दों में कहें तो वह धार्मिक आंदोलन अब तक का सबसे विशालतम आंदोलन था, जो बौद्ध आंदोलन से भी विशाल था, क्योंकि उसका प्रभाव आज तक विद्यमान है। ग्रियर्सन कहते हैं कि अब धर्म ज्ञान का नहीं, बल्कि भावावेश का विषय था और हम यहां ऐसे रहस्यवाद और प्रेमोल्लास के देश में आते हैं और ऐसी आत्माओं का साक्षात्कार करते हैं, जो काशी के दिग्गज पंडितों की जाति के नहीं थे। मीरां क्षत्रिय कुल में जन्मी थीं और राजरानी थीं। वे आरंभ से ही भगवान कृष्ण की उपासिका थीं।

मीरां ने विवाह तो किया, पर लौकिक पति को पति नहीं माना। उन्होंने ईश्वर-रूप कृष्ण को अपना वास्तविक पति मान कर अपना जीवन कृष्णमय बना लिया, लेकिन उन्होंने इस ईश्वरीय आलंबन को पति-पत्नी के मानवीय संबंधों में बांध कर उसे लोक-मानस के लिए सुलभ बन दिया। इस मानवीय संबंध ने भक्ति को नया आयाम और नया रूप दिया तथा धर्म की रहस्यवादिता और घोर आध्यात्मिकता के स्थान पर भक्ति साधारण मनुष्य के जीवन का अंग बन गई। मीरां की काव्य-साधना ने कृष्ण के अलौकिक और पारलौकिक अस्तित्व को जैसे समाप्त कर उन्हें मानवीय प्रेम की पूर्णता तथा रस-निष्ठा का प्रतीक बन दिया और प्रेम में आत्मोत्सर्ग, तन्मयता, तीव्रता, मिलन-वियोग की गहरी संवेदना का ऐसा रागात्मक संबंध उत्पन्न किया, जिसने वेदना में आत्म-परिष्कार और आत्मा-परमात्मा के एकत्व का मार्ग प्रशस्त किया।

मीरां का वैशिष्ट्य इतना ही नहीं है। उन्होंने पति की परंपरागत सत्ता एवं अधिकार को स्वीकार नहीं किया और न पति के देहांत के बाद सती होकर परंपरा को आगे बढ़ाया। उस युग के सामंती परिवेश तथा पुरुष-प्रधान समाज में ‘पति को परमेश्वर’ मानने वाली हिंदू स्त्री का ‘परमेश्वर को पति’ मानने का अधिकार प्राप्त करना आसान नहीं था। यह एक प्रकार से राजनीतिक सामंतवाद तथा धार्मिक परंपराओं के विरुद्ध मीरां के रूप में युग की नारी का मूक विद्रोह था। मीरां इस मूक विद्रोह के कारण ‘कुलनाशी’ कहलाई और उसे विष का प्याला भी पीना पड़ा, पर मीरां ने नारीत्व को जीवित रखा और सिद्ध कर दिया कि पति की सत्ता के बिना भी नारीत्व का अस्तित्व है। इस प्रकार मीरां ने नारी की स्वतंत्र सत्ता का उद्घोष करके भी उसे स्वकीया प्रेम से जोड़ा तथा परमेश्वर पति के प्रति एकनिष्ठ प्रेम की साधना करके भारतीय नारी को परंपरागत मर्यादा और संयम में रखा। वास्तव में मीरां इष्टदेव के प्रति अनन्य भाव, स्वकीया प्रेम की तन्मयता, घनीभूतता, वियोग में मिलने की कामना, संयम और मर्यादा आदि के कारण भारतीय नारी का जीवंत प्रतीक बन गर्इं।

गांधी पर प्रभाव
मीरां के ऐसे ही रूप तथा भारतीय नारी की ऐसी ही विशेषताओं ने महात्मा गांधी की चेतना, संघर्ष तथा जीवन-मूल्यों को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपने स्वाधीनता-संग्राम में मीरां के व्यक्तित्व तथा काव्य-साधना का भरपूर उपयोग किया। उन्होंने अपने जीवन-काल में लगभग पचास बार अपने भाषणों, पत्रों, लेखों आदि में मीरांबाई का स्मरण किया और उनकी किसी-न-किसी विशेषता का उल्लेख करके सिद्ध किया कि भारत की स्वतंत्रता तथा उसके विकास में उनका किस प्रकार उपयोग हो सकता है।
महात्मा गांधी अपने समय के सबसे अधिक आधुनिक भारतीय थे और उन्होंने दक्षिण अफ्रीका से ही अंग्रेजों की दासता तथा उनके अत्याचारों के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष शुरू कर दिया था। उन्होंने भारत आकर असहयोग, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा तथा अहिंसा से स्वराज्य के लिए संघर्ष आरंभ किया और इसके लिए उन्हें मध्ययुग की भक्त कवयित्री मीरांबाई अत्यंत उपयोगी लगी तथा वे उनके जीवन और साहित्य का उपयोग इस राष्ट्रीय जागरण में बराबर करते रहे।

महात्मा गांधी ने सबसे पहले 22 जून, 1907 को मीरांबाई का उल्लेख करते हुए लिखा कि हमें मीरांबाई जैसी हजारों स्त्रियों की आवश्यकता है, जो भारत के आधे स्त्री-समाज को शिक्षित और जाग्रत कर सकें। ऐसी मीरांबाई का परिचय अपनी एक ईसाई मित्र को देते हुए गांधी ने अपने 11 जून, 1917 के एक पत्र में लिखा, ‘दो-तीन शताब्दी पूर्व मीरांबाई नामक एक महाना रानी हुई हैं। उन्होंने अपने प्रिय व्यक्तियों और समस्त वैभव का त्याग करके परम प्रेम का जीवन बिताया। अंत में उनके पति उनके भक्त बन गए। हम अक्सर उनके रचे हुए कुछ सुंदर भजन आश्रम में गाते हैं। जब तुम आश्रम आओगी, तब उन गीतों को सुनोगी और किसी दिन गाओगी भी।’

मीरां के इन सुंदर गीतों का कारण गांधी यह मानते थे कि वे मीरां के हृदय से निकले हैं तथा उनकी रचना गीत रचने की इच्छा या लोगों को खुश करने की इच्छा से नहीं लिखे गए हैं। गांधी मीरां के जीवन से जुड़े चमत्कारों को उपेक्षणीय मानते हैं, क्योंकि उन्हें इस प्रकार के ईश्वरीय चमत्कारों में विश्वास नहीं है। उन्होंने इसी कारण ईसा मसीह से जुड़े चमत्कारों को भी अस्वीकार किया, लेकिन मीरां के जीवन की प्रमुख चीज की ओर ध्यान दिलाना वे नहीं भूलते और वे कहते हैं कि हमें जिस चीज को ध्यान में रखना है, वह तो मीरांबाई की पवित्रता है।

प्रेम का कच्चा धागा
महात्मा गांधी मीरां के प्रेम की अद्भुत शक्ति से पूर्णरूप से परिचित ही नहीं थे, बल्कि वैसी प्रेमानुभूति तथा प्रेम की शक्ति अपने प्रेम में उत्पन्न करना चाहते थे। गांधी समझ चुके थे कि मीरां जैसी गहन और घनीभूत प्रेमानुभूति ही विश्व को बदल सकती है। गांधी 14 नवंबर, 1917 को लिखे एक पत्र में कहते हैं कि मीरां को प्रेम की कटारी गहरी लगी थी। प्रेम की वैसी कटारी हमारे भी हाथ लगे और हममें उसे भोंकने का बल आ जाए तो हम दुनिया को दिखा दें। प्रेम के अपने अंतर में होते हुए भी मैं हर क्षण उसके अभाव का अनुभव करता रहा हूं। गांधी मीरां के उस पद का कई बार उल्लेख करते हैं, जिसमें मीरां कहती हैं कि कच्चे धागे से मुझे हरिजी ने बांध लिया है। वे जिधर खींचते हैं, मैं उधर ही मुड़ जाती हूं। मुझे तो प्रेम की कटारी लगी है। गांधी इसी प्रेम के कच्चे धागे से मुसलमानों को बांधने तथा गाय की रक्षा करना चाहते हैं एवं भारत माता के साथ अटूट संबंध में बंधने के लिए भी इसी प्रेम के कच्चे धागे का इस्तेमाल करते हैं। वे 30 जनवरी, 1921 को ‘नवजीवन’ में लिखते हैं कि मीरां ने जो कहा, सो करके दिखा दिया। प्रेम का यही धागा प्रत्येक मुसलमान को बांधने और गाय की रक्षा के लिए काफी है।

इसी प्रकार गांधी जब शिवप्रसाद गुप्त के आग्रह पर ‘भारत माता मंदिर’ का काशी में उद्घाटन करते हैं तो कहते हैं कि प्रेम की पुकार टाली नहीं जा सकती। मीरां के प्रेम का धागा कच्चा और कोमल था, लेकिन वह मजबूत था। ऐसा प्रेम लोगों को हजारों मील दूर से खींच लाता है। गांधी मीरां के इस प्रेम-पद का अनुसरण युवावस्था से ही कर रहे थे और यही कारण है कि उन्होंने मीरां के प्रेम-दर्शन को अपने जीवन का आधार बना लिया। वे मीरां और भारतमाता को एक साथ स्मरण करते हुए कहते हैं कि मीरांबाई कुशल कातने वाली न होतीं तो हरिजी के प्रेमपाश की धागे से सुंदर उपमा कैसे देतीं? भारतमाता भी हमें वैसे ही धागे से बांध कर गुलामी के बंधनों से मुक्त करना चाहती है। इस प्रकार महात्मा गांधी भारतमाता में मीरां का रूप देख रहे हैं और उसे दासता से मुक्त करने के लिए मीरां की प्रेम-शक्ति का उपयोग कर रहे हैं।

सत्याग्रह की शक्ति
महात्मा गांधी मीरांबाई का, अपने स्वराज्य आंदोलन को तर्कशील तथा शक्तिशाली बनाने के लिए अनेक प्रकार से उपयोग करते हैं। गांधी भिन्न-भिन्न समय पर सत्याग्रह, असहयोग, सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ करते हैं और उनके औचित्य एवं विश्वसनीयता के लिए मीरांबाई का वैसे ही उल्लेख करते हैं, जैसे तुलसीदास अपनी बात का प्रमाण देने के लिए वेद का उल्लेख करते हैं। गांधी के शब्दों में मीरांबाई ‘महान सत्याग्रही’ थीं। वे दक्षिण अफ्रीका के अपने आंदोलन से ही मीरां की इस सत्याग्रही शक्ति से शक्ति प्राप्त कर रहे थे और मीरां के अपने सत्य के लिए निर्द्वंद्व भाव से विषपान का बार-बार स्मरण करते हैं। गांधी मीरां के पति से अपने सत्य के लिए असहयोग करने का समर्थन करते हुए कहते हैं कि हमारे धार्मिक ग्रंथ ऐसे असहयोग का समर्थन करते हैं। हमारी परंपरा में प्रह्लाद ने अपने पिता से, विभीषण ने अपने क्रूर भाई से तथा मीरां ने अपने पति से असहयोग करके कुछ भी अनुचित नहीं किया। यह सच है कि अन्याय और असत्य से असहकार, असहयोग तथा न्याय और सत्य से सहकार तथा सहयोग की परंपरा हमारे यहां रही है। इस कारण हम प्रह्लाद, विभीषण और मीरां तीनों की ही पूजा करते हैं।

गांधी मीरां के जीवन के इस सत्य का भी उद्घाटन करते हैं कि मीरां ने राणा के सभी कठोर दंड तथा विषपान भी निर्विकार भाव से स्वीकार किए और क्रोध एवं प्रतिकार जैसे जैसा कोई भाव उनके मन में उत्पन्न नहीं हुआ। गांधी इसका उपयोग अपने असहयोग आंदोलन के लिए करते हुए कहते हैं, ‘मीरांबाई ने राणा कुंभा के साथ जो असहयोग किया, उसमें द्वेष नहीं था। राणा कुंभा द्वारा दिए गए कठोर दंड उन्होंने प्रेमपूर्वक स्वीकार किए। हमारे असहयोग का मूलमंत्र भी प्रेम ही है। उसके बिना सब फीका, सब खाली है।’ महादेव देसाई की गिरफ्तारी पर वे पुन: मीरां को याद करते और लिखते हैं कि मेरा पूरा विश्वास है कि मीरांबाई पर उनके पति द्वारा दी गई यातनाओं का कोई असर नहीं हुआ था। ईश्वर के प्रति प्रेम और उसके अमूल्य नाम का निरंतर स्मरण उन्हें नित्य प्रसन्न बनाए रखता था। गांधी मीरां के इसी एकनिष्ठ ईश्वर-प्रेम की बार-बार सराहना करते हैं और वैसा ही प्रेम अपने सत्यग्राहियों के मन में उत्पन्न करना चाहते हैं।

गांधी मीरां की एक पद की व्याख्या में कहते हैं कि मीरां जैसी भक्त नारी कह गई है कि प्रभु-भक्ति में जिसका मन लीन हो गया, उसे दूसरी चीजें नीम के रस की तरह कड़वी और जुगनू के प्रकाश की तरह निस्तेज लगती हैं। गांधी कहते हैं कि मीरां ने यह कर दिखाया कि चाहे राणा रूठै, पर ईश्वर न रूठै। गांधी मीरां से यही शिक्षा लेते हैं और 6 दिसंबर, 1944 को अपनी डायरी में लिखते हैं कि मीरांबाई के जीवन से हम बड़ी बात यह सीखते हैं कि उन्होंने भगवान के लिए अपना सब कुछ छोड़ दिया। गांधी मीरां के राज-भोग को त्याग कर ईश्वर-प्रेम में नाचने की भूरि-भूरि प्रशंसा करते और असहयोग आंदोलन में सक्रिय छात्रों से आग्रह करते हैं कि वे सरकारी स्कूलों के बहिष्कार में मीरां जैसे त्याग और बलिदान में आनंद की अनुभूति अनुभूति करें। गांधी मीरां की आत्मा को देश की युवा पीढ़ी के हृदय में उतार देना चाहते हैं।

मीरांमय भारत की चाह
महात्मा गांधी मीरां के विवाह, पति पत्नी संबंध, स्त्री के अधिकार और उसकी अस्मिता के प्रश्न को भी उठाते हैं और इस तरह वे एक मध्ययुगीन भारतीय स्त्री को आधुनिक दृष्टि से देखने का प्रयत्न करते हैं। गांधी विवाह की परिभाषा में कहते हैं कि विवाह शरीर द्वारा दो आत्माओं का मिलन होता है और इसमें परमेश्वर के प्रति प्रेम एवं भक्ति का भाव भी निहित रहता है। गांधी कहते हैं, ‘पति-पत्नी का प्रेम स्थूल वस्तु नहीं, उसके द्वारा आत्मा-परमात्मा के प्रेम की झांकी दिखाई दे सकती है। यह प्रेम वासनागत प्रेम कभी नहीं हो सकता। विषय-सेवन तो पशु भी करता है- जहां शुद्ध प्रेम है, वहां बल-प्रयोग के लिए गुंजाइश नहीं। और वे एक-दूसरे का मन रख कर चलते हैं। इसलिए गांधी मानते हैं कि मीरां ने यह अपने आचरण से सिद्ध कर दिया कि पत्नी के रूप में उनका भी एक व्यक्तित्व है।

गांधी की दृष्टि में मीरां ‘सती स्त्री’ थीं और उसके लिए विवाह वासना को तृप्त करने का साधन नहीं था। गांधी के विचार में ‘सतीत्व’ का अर्थ है- ‘पवित्रता की पराकाष्ठा’ और मीरां इसकी प्रतिमूर्ति थी। महात्मा गांधी पुरुष की निरंकुशता एवं एकाधिकार के विरुद्ध मीरां के विद्रोह को तर्कसंगत मान कर अपनी आधुनिकता के परिचय के साथ नारी के स्वतंत्र अस्तित्व का समर्थन करते हैं। गांधी लिखते हैं, ‘मीरांबाई ने मार्ग दिखा दिया है। जब पत्नी अपने को गलती पर न समझे और जब उसका उद्देश्य अधिक ऊंचा हो, तब उसे पूरा अधिकार है कि वह अपने मन का रास्ता अख्तियार कर ले और नम्रता से परिणाम का सामना करें।’ इस प्रकार गांधी मीरांबाई के साथ हैं और उनके पति-विद्रोह तथा परंपरा-विद्रोह को औचित्यपूर्ण मानते हैं और मध्ययुगीन मीरांबाई को आधुनिक संदर्भ में भी स्वीकृत और मान्य बना देते हैं।

अंत में, महात्मा गांधी मीरांबाई को भारत की एक ‘महातेजस्वनी भक्त स्त्री’, ‘सत्यग्रहिणी’, ‘महान त्यागी एवं बलिदानी’, ‘सतीत्व’ की प्रतीक, ‘संत’, ‘भक्त नारी’ आदि मानते हैं और उन्हें अपने समय के संघर्ष के साथ संबद्ध करके और भी प्रसांगिक बना देते हैं। गांधी का कौशल यह है कि वह मीरांबाई की मध्ययुगीन भक्ति, प्रेम-दर्शन और नारी-चेतना को आधुनिक भारत के स्वतंत्रता-आंदोलन के लिए भी सर्वथा सार्थक और उपयोगी बना देते हैं और मीरांबाई को सभी स्वतंत्रता-प्रेमियों, अनाचारों का मूक विद्रोह करने वालों, ईश्वर प्रेम को सर्वोच्च मानने वालों तथा नारी के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार करने वालों के लिए सहज-सुलभ बनाकर उनमें अपना पति-रूप खोजने का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं। इस प्रकार मीरांबाई भारत के स्वतंत्रता-संग्राम का ही नहीं, आधुनिक लोक-मानस का भी अंग बन जाती हैं।

महात्मा गांधी जब भी मीरां को याद करते हैं, वे मीरांमय हो जाते हैं। वे आधुनिक भारत को भी मीरांमय बनाना चाहते हैं। दूदाभाई की बेटी लक्ष्मी को वे ‘मीरांबाई’ बनाना चाहते हैं और सरोजनी नायडू को तो वे ‘मीरांबाई’ कहते ही हैं। उनकी कामना है कि भारत में मीरांबाई जैसे हजारों स्त्रियां हों, जो स्त्री-समाज का कायाकल्प कर दें, परंतु गांधी मीरां को प्रासंगिक बनाने के अलावा कोई दूसरी मीरां की सृष्टि नहीं कर पाए। क्या यह गांधी की बड़ी विफलता थीं।

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