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रविवारी कहानी: गुरु

नसीम साकेती उसके वास्तविक नाम का गला घोंट कर ‘गुरु’ का पुछल्ला लगाने का मुजरिम मैं ही हूं, क्योंकि मेरे मैलानी जाने से पहले वह बेचारा अपनी गृहस्थी के बोझ को अपने कंधों पर लादे अपने वास्तविक नाम से गुमनामी की जिंदगी को सुरसा की जीभ, द्रौपदी की चीर और शैतान की आंत की तरह […]

Author November 25, 2018 2:42 AM
प्रतीकात्मक फोटो

नसीम साकेती

उसके वास्तविक नाम का गला घोंट कर ‘गुरु’ का पुछल्ला लगाने का मुजरिम मैं ही हूं, क्योंकि मेरे मैलानी जाने से पहले वह बेचारा अपनी गृहस्थी के बोझ को अपने कंधों पर लादे अपने वास्तविक नाम से गुमनामी की जिंदगी को सुरसा की जीभ, द्रौपदी की चीर और शैतान की आंत की तरह बढ़ती इस कमरतोड़ डायन महंगाई में बैसाखी के सहारे घसीट रहा था। पर मेरे ‘गुरु’ नामकरण ने कुछ ऐसा रंग दिखाया कि उसके वास्तविक नाम का लोप उसी तरह हो गया जैसे गंगा-यमुना के संदर्भ में सरस्वती का… धीरे-धीरे ‘गुरु’ का जादू हर छोटे-बड़े के सिर पर चढ़ कर बोलने लगा, जिधर देखो, उधर ‘गुरु’ का ही जिक्र हो रहा है। पानवाला, खोमचे वाला, रिक्शे वाला, तांगे वाला, चाय वाला, मिठाई वाला, परचून वाला यानी हर एक की जबान पर ‘गुरु’ का नाम करवटें बदलने लगा। लोग उसके ऐसे भक्त हो गए कि कबीर दास के ‘गुरु-गोबिंद’ और जायसी के ‘गुरु सुआ’ के दर्शन को भूल से गए।

बताशे पर कदम रख कर बड़ी अदा और नाज-नखरे के साथ इठलाती-बलखाती हर महीने की पहली तारीख (‘गुरु’ की वेतन-तिथि) का ‘गुरु’ को तो शायद कम, लेकिन उसके तथाकथित शिष्यों को विशेष ध्यान और इंतजार रहता था। एक-एक दिन अंगुलियों के पोरों पर गिना करते थे, जैसे अभी कुछ देर पहले किसी मरे हुए जानवर के पास एक भी गिद्ध नहीं था, लेकिन देखते ही देखते वहां अनगिनत गिद्धों की भीड़ दिखाई देने लगी। वैसे ही पहली तारीख को इधर से, उधर से, उत्तर से दक्षिण से, पूरब से, पश्चिम से लोग खरामा-खरामा चले आ रहे हैं गुरु के दफ्तर में- गुरु प्रमाण… गुरु राम-राम…गुरु चरण-स्पर्श… गुरु आदाब… सलाम… गुरु गुडमार्निंग… गुरु सत श्रीअकाल… की भिन्न-भिन्न आवाजें आतीं और ‘गुरु’ बड़ी खुशी से सबका अभिवादन स्वीकार करते रहते। लोग कुर्सियों पर जमने लगते। अगर कुर्सियां कम पड़ जातीं, तो सिगनल निरीक्षक श्री दीक्षित (जो अब इंजीनियर के पद पर आसीन हैं) के यहां से चली आतीं और अगर अड़ोस-पड़ोस के दफ्तरों की कुर्सियों से काम नहीं चलता तो कार्य-निरीक्षक रामचंद्र को थोक भाव से भेजने का संदेश दे दिया जाता। मंडली जम जाती, गुरु का हाथ बड़े गर्व के साथ जीते हुए जुआरी की भांति जेब में जाता और बेतहाशा आर्डर शिष्यों की ओर से होने लगता… रसगुल्ला आएगा… नहीं यार कॉफी कार्नर वाले के यहां से लस्सी… चाय के साथ समोसा, टिक्की और खस्ता जरूरी है।… ‘गुरु’ भी जल्दी से हनुमंत के हाथों में रुपए देकर शिष्यों की मनोकामना पूरी करने का आशीर्वाद दे देते।

गुरु का यह ‘हफ्त-ए-इफरात’ होता- क्या गम है।… जेब में नोटों का वजन अभी काफी है…. गोजर की एक टांग न सही, क्या फर्क पड़ता है, शिष्यों ने डट कर, छक कर खाया-पिया और ‘गंजेड़ी यार किसके दम लगाया खिसके’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए, मुंह पोंछते, एक के बाद एक कुर्सियों को खिसका कर फूटने लगे। गुरु को अब प्रणाम करने की आवश्यकता ताक पर रख दी गई। उल्लेखनीय है कि (तत्कालीन स्टेशन अधीक्षक एमडी सिंह और टीआई एनके सिंह को भी अपने व्यस्ततम कार्यक्रम को छोड़ कर गुरु का शिष्य बनते प्राय: देखा गया।
‘गुरु’ ने भी बाजार का रुख किया, पिछले महीने के उधार का बोझ सिर से उतारने के लिए। बोझ आज बड़ी आसानी से उतर गया। ‘गुरु’ दशरथ की दुकान से घोड़ा छाप तंबाकू और बंगाली की दुकान से खिजाब लेकर घर का रास्ता नापने लगे, जहां गुरुवाइन उनका इंतजार बड़ी बेसब्री से कर रही थीं। गुरुवाइन की निगाहें जेब की ओर उठतीं और टकरा कर लौट आतीं… चिकनी-चुपड़ी बातों का सिलसिला शुरू होता… रीना, पापा के लिए चाय पापड़ तला नहीं?… बहू तू क्या टुकुर-टुकुर देख रही है? बिजली निगोड़ी फिर रोज की तरह गायब हो गई है, हाथ वाला पंखा उठा ला, देख नहीं रही है तेरे बाबू जी पसीने में डूबे हैं… आदि। गरज कि ठकुरसुहाती अपने शबाब पर होती आज के दिन, यह दिन गुरु के लिए जिंदगी का बेहतरीन दिन होता।

धीरे-धीरे एक हफ्ता गुजरा और दूसरे हफ्ते ने दहलीज पर कदम रखा… शिष्य मंडली ‘गुरु’ के दफ्तर के इर्द-गिर्द मंडराने लगी और देखते-देखते सभी दफ्तर के अंदर… शिष्यों ने आर्डर देना शुरू कर दिया। गुरु ने जेब में हाथ डाल कर नोटों को अंगुलियों से स्पर्श किया, नोटों की परतें आसानी से गिनी जा सकती थीं और बोले- इतना सब नहीं… छांगुर, सिर्फ चाय और नमकीन लाओ, क्योंकि यह हफ्ता गुरु का ‘हफ्त-ए-एहतियात’ था। फूंक-फंूक कर कदम रखना है, लेकिन उधर शिष्यों के मुंह बनने लगे, गिरगिट की तरह रंग बदलने लगे, लेकिन कर ही क्या सकते थे। वे जानते थे कि गुरु ‘हफ्त-ए-एहतियात’ में इससे अधिक करने के लिए तैयार नहीं होंगे। चाय नमकीन पर ही हाथ साफ करके मुंह पर रूमाल फेरते हुए शिष्य मंडली खिसकने लगी।
गुरु ने भी अपने एकमात्र बाबू एंड्रूज को कुछेक निर्देश देकर मैलानी की बहुचर्चित जल-व्यवस्था से जूझने चल पड़े, क्योंकि यूनियन वालों ने प्रदर्शन करने, मशाल-जुलूस निकालने की धमकी दे रखी है। काम करने वालों की कमी, अधिकारियों से कहना व्यर्थ इकोनॉमी ड्राइव के कारण, अधिकारी भी क्या करें। रेल-मंत्रालय से दबाव जो है उन पर स्टाफ कम करने का, देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए। जल-व्यवस्था सुधार अभियान के साथ माथा-पच्ची करने के बाद गुरु लंच के लिए घर पहुंचे। बिजली रोज की तरह आज भी गायब थी। ‘गुरु’ का आज घर में पहली तारीख जैसा स्वागत नहीं हुआ, जितना हुआ उसे उस दिन के आधे भाग का नाम दिया जा सकता है।

आज महीने के तीसरे हफ्ते की शुरुआत थी, ‘गुरु’ के लिए इसे ‘हफ्त-ए-रुक्कात’ कहा जाता है, यानी दुकानों से रुक्कात (पर्चियों) के सहारे उधार चीजों का प्रबंध करना, क्योंकि तीसरा सफ्ताह आते-आते वेतन में मिले रुपए जेब की कैद से आजाद होकर धन्ना सेठों की तिजोरियों में सदा के लिए कैद हो गए थे। शिष्य मंडली गुरु के दफ्तर के चारों ओर मंडराने लगी और धीरे-धीरे सिमट कर गुरु-स्थान पर केंद्रित हो गई। फिर वही पुरानी घिसी-पिटी खाने वाली बातें- ‘गुरु’ ने बाहर से ही जेब पर हाथ रखा… कोई दबाव नहीं। गुरु के मस्तिष्क ने तुरंत जवाब दिया- यह तो ‘हफ्त-ए-रुक्कात’ है और छेदी मिस्त्री की दुकान पर रामसागर के नाम पर्ची लिख दी। लेने गए इस बार जमील मिस्त्री। वे बड़ी देर के बाद लौटै, क्योंकि रामसागर पहले नकद वालों को देखे या उधार अर्ची-पर्ची को… सबको निपटा कर पर्ची ली, सामने टंगे तार में खोंस दी और रामू को रात का बचा सामान देने का फरमान जारी कर दिया। पर्ची के माध्यम से उधार आया बासी सामान शिष्यों ने गले से उतारा तो, लेकिन जितनी देर गले से उतार रहे थे, सबको अपनी नानी याद आ रही थी। पर कर ही क्या सकते थे ठहरा जो ‘हफ्त-ए-रुक्कात’… भरे-भरे कदमों से मुंह लटकाए मन मार कर चले गए।

‘गुरु’ लेखा-निरीक्षक जेएन अग्रवाल से विमर्श करने बैठ गए। शायद भंडार के किसी आइटम पर अग्रवाल महोदय सहमत नहीं हो रहे थे, जबकि वह भी अपने आप को ‘गुरु’ का शिष्य मानते थे। खैर, किसी तरह मामला रास्ते पर आया। ‘गुरु’ उठने ही वाले थे कि पीछे से अनिल की आवाज आ गिरी- ‘मम्मी ने बुलाया है।’ घर पर गुरु के कदम रखते ही पता चला कि मेहमान आए हैं। कुछ सामान की किचन में कमी है, ‘गुरु’ ने आव देखा न ताव झट से कागज उठाया, जेब से कलम निकाली और सिंधी सेठ के नाम पर्ची लिख दी।

यह महीने का अंतिम सप्ताह है। ‘गुरु’ आज बड़ी जल्दी दफ्तर आ गए, बिना नाश्ता किए हुए कि आज शिष्यों से कुछ मंगाया जाएगा। रह-रह कर कभी अपने चैंबर में जाते, कभी बाहर आकर इधर-उधर देखने लगते, लेकिन आज शिष्यों का दूर-दूर तक पता नहीं था। वे उसी तरह गायब थे, जैसे गदहे के सिर से सींग, क्योंकि उन्हें तो मालूम था कि यह महीने का अंतिम सप्ताह है, जो ‘गुरु’ के लिए ‘हफ्ते-फाकात’ यानी फाके का हफ्ता हुआ करता है, कौन जाए वहां आज, रोजा-बख्शवाने जाएं नमाज गले पड़े… यानी आज वहां कुछ मिलने के बजाए उल्टे गुरु को ही खिलाना-पिलाना पड़ेगा। ‘गुरु’ को बार-बार गुस्सा आ रहा था कि कोई भी शिष्य दीख जाए, क्योंकि उनका मन बार-बार चाय पीने को कर रहा था। बड़ी देर तक जब कोई नहीं आया, तब झुंझला कर घर का रास्ता नापने लगे। चाय की तलब मिटाने के लिए घर पहुंचे तो गुरुवाइन ने शिकायती लहजे में बताया- आज आटा, चावल, दाल घर में कुछ नहीं है। ‘गुरु’ अपने अंदर एक ज्वालामुखी समेटे सोचता रहे- ‘क्या केवल यह मेरी कहानी है?’ यकायक उनकी आंखों के सामने उनहीं की तरह ईमानदार नौकरी-पेशा लोगों के अनगिनत चेहरे कौंध गए।

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