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कविताएं: उचल्या

जनसत्ता रविवारी में पढ़ें देवेंद्र चौबे की कविताएं।

Author January 27, 2019 12:07 AM
प्रतीकात्मक फोटो

देवेंद्र चौबे

(एक)
सुबह से शाम तक
जब हवाओं में ठंड हो
और पानी की छोटी-छोटी बूंदें
पूरी दुनिया को तबाह करना चाहती हों
तब एक छोटी-सी छतरी लिए
आती है उचल्या!
और तान देती है आसमान की ओर

हवाएं ठहर जाती हैं
कांप उठती है धरती
आसमान हतप्रभ हो जाता है
और आंखें मिचमिचाते हुए ठहर जाते हैं बादल
जब देखते हैं उचल्या की छतरी
जिसने रोक रखा है
आसमान से टपकी पानी की बूंदों को

बूंदें! पानी की बूंदें!! चमकती हुई बूंदें!!!
बहने लगती है धीरे-धीरे हवाओं के साथ
उस ओर जिधर समुंदर की लहरें
सुनाती हैं गीत धरती और आसमान…
और दुनिया के बनने की
शीत बसंत के आने की

हवा, आग और पानी के होने की
कि दुनिया यही है! यही है तुम्हारी दुनिया!!

(दो)
वे नदी बनना चाहते हैं
ताकि तैरती रहें मछलियां उनमें

वे जंगल बनना चाहते हैं
ताकि उड़ती रहें चिड़ियां उनमें

वे आसमान बनना चाहते हैं
ताकि उगते रहें सूरज, चांद, अनगिनत तारें उनमें

वे धरती बनना चाहते हैं
ताकि पूरी दुनिया समा जाए उनमें

मैं क्या बनूं उचल्या?
ताकि यह धरती बची रहे और बची रहे हवा
चिड़ियां चहचहाती रहें और चमकते रहें सूरज-चांद
नदी बहती रहे और हरा-भरा रहे जंगल
आग बची रहे और बचा रहे आसमान
(तीन)
कहती है उचल्या-
कि कुछ तितलियां हैं धरती पर
जो आती हैं फूलों की पंखुड़ियों के साथ
और शाम होते ही उड़ जाती हैं
बन कर रंग

कहती है उचल्या-
आसमान में कुछ पूर्वज हैं जो
रात में चमकते हैं सप्तर्षि बन कर
और सुबह होते ही लुप्त हो जाते हैं
बन कर धूप!

कहती है उचल्या-
धूप में थोड़ी-सी गर्मी है जो
सूरज की किरणों के साथ आती है धरती पर
और घास बन कर फैल जाती है
चारों ओर

कहती है उचल्या-
बादलों में रवानगी है जो
यक्ष की प्रेमिका का संदेश लेकर
चले जाते हैं हिमालय की तरफ
बन कर दूत

मैं क्या करूं उचल्या?
न धरती को जान पाया, न आसमान को
न हवा को, न पानी को
न आग को
क्या यह आग ही है, जो धूप बन कर चमक रही है
इस दुनिया में और इस दुनिया के बाहर
समुंदर के अंतिम छोर तक?

मैं असहाय! कुछ न कर सका उचल्या!!
समझते-समझते न समझ पाया उस कुम्हार का खेल
जो गढ़ रहा है आज भी मूर्तियां
तुम्हारे आंदीजान से लेकर मेरे सिंधु के कछार तक
इस दुनिया से उस दुनिया के होने का
कुछ तो जरूर है जो है हमारे अंदर,
हमारे बाहर… शायद यह सब कुछ होने का

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