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शख्सियत: जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद का शुरुआती जीवन दुख और पीड़ा में बीता। मात्र सत्रह वर्ष की उम्र में घर की जिम्मेदारी उनके नन्हे कंधों पर आ गई। प्रसाद ने जीवन के संघर्षों से कभी हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी गृहस्थी और साहित्य को पूरी श्रद्धा से संभाला। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था। आज देश प्रसाद को एक महान कवि, उपन्यासकार, नाटककार और कहानीकार के रूप में जानता है।

Author January 27, 2019 1:13 AM
जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद का शुरुआती जीवन दुख और पीड़ा में बीता। मात्र सत्रह वर्ष की उम्र में घर की जिम्मेदारी उनके नन्हे कंधों पर आ गई। प्रसाद ने जीवन के संघर्षों से कभी हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी गृहस्थी और साहित्य को पूरी श्रद्धा से संभाला। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था। आज देश प्रसाद को एक महान कवि, उपन्यासकार, नाटककार और कहानीकार के रूप में जानता है।

प्रारंभिक शिक्षा
छायावाद के प्रमुख कवि निराला की तरह जयशंकर प्रसाद का भी शुरुआती जीवन संघर्षमयी रहा। जयशंकर प्रसाद के पिता देवीप्रसाद का तंबाकू का व्यापार था। व्यापार अच्छा चल रहा था, लेकिन जब पिता की मृत्यु हो गई तो व्यापार प्रसाद के बड़े भाई शंभू रत्न ने संभाला, लेकिन कुछ समय बाद उनका भी निधन हो गया। ऐसे में जयशंकर प्रसाद की शिक्षा विद्यालय में नहीं हो पाई। वे केवल आठवीं तक विद्यालय में पढ़े। आगे की पढ़ाई उन्होंने घर पर ही की। प्रसाद की रुचि विभिन्न भाषाओं, इतिहास और साहित्य में थी। ये सभी शौक उन्होंने घर पर ही पूरे किए।

लेखन की शुरुआत
जयशंकर प्रसाद की रुचि बचपन से ही हिंदी साहित्य में थी। उन्होंने नौ बरस की उम्र में अपने गुरु को ब्रजभाषा में कलाधर नाम से सवैया लिख कर दिखाया था। वे वेदों से अधिक प्रभावित थे। इस वजह से भी उन्होंने लिखना शुरू किया। उनका पहला कविता संग्रह ‘चित्रधार’ नाम से आया। उनकी कविताएं भावुक, साधारण, सौम्य और दिल को छू जाने वाली हैं। इन्हीं विशेताओं के कारण लोग उन्हें आज भी पढ़ना पसंद करते हैं। प्रसाद की कविताओं में विभिन्नता है। वे रूमानी और देशभक्ति दोनों तरह की कविताएं लिखते थे। उनकी ‘हिमाद्रि तुंग शृंग से’ कविता सबसे चर्चित रही। यह कविता उन्होंने आजादी से पहले लिखी थी। चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त और ध्रुवस्वामिनी उनके प्रमुख नाटक थे।

कामायनी महाकाव्य
कामायनी महाकाव्य से प्रसाद को काफी प्रसिद्धि मिली। यह उनका अक्षय कीर्ति स्तंभ कहा जाता है। भाषा, शैली और विषय-तीनों की दृष्टि से यह विश्व-साहित्य का अद्वितीय ग्रंथ है। ‘कामायनी’ में प्रसाद ने प्रतीकात्मक पात्रों द्वारा मानव के मनोवैज्ञानिक विकास को प्रस्तुत किया है और मानव जीवन में श्रद्धा और बुद्धि के समन्वित जीवन-दर्शन को प्रतिष्ठा प्रदान की है। इसके अलावा ‘आंसू’ उनके मर्मस्पर्शी वियोगपरक उद्गारों की काव्य-कृति है। ‘लहर’ मुक्तकों का संग्रह है। ‘झरना’ उनकी छायावादी कविताओं की कृति है। ‘कानन कुसुम’ में उन्होंने अनुभूति और अभिव्यक्ति की नई दिशाएं खोजने के प्रयत्न किए हैं। 1909 में ‘प्रेम पथिक’ का ब्रजभाषा स्वरूप सबसे पहले ‘इंदु’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ।

छायावाद की शुरुआत
हिंदी साहित्य में छायावाद का स्थापक जयशंकर प्रसाद को माना जाता है। उन्होंने जो साहित्य रचा, वह खड़ी बोली में है। वे छायावाद के प्रतिष्ठापक ही नहीं, बल्कि छायावादी पद्धति पर सरस संगीतमय गीतों के लिखने वाले श्रेष्ठ कवि भी बने। उनकी रचनाएं प्रेमपरक हैं। जयशंकर प्रसाद ने केवल उपन्यास या कविता नहीं लिखे बल्कि कहानियां भी खूब लिखीं। हिंदी साहित्य को कहानी की आधुनिक विधा प्रसाद ने ही दी। जैनेंद्र और अज्ञेय की कहानियों के मूल में प्रसाद के इस आयाम को देखा जा सकता है।

निधन
प्रसाद का निधन सैंतालीस वर्ष की उम्र में 15 नवंबर, 1937 को हो गया।

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