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मुद्दा: रचनात्मकता में बाधक गृहकार्य

जनसत्ता रविवारी मुद्दा स्पेशल

Author November 11, 2018 2:39 AM
प्रतीकात्मक फोटो

प्रमोद कुमार दीक्षित

गृहकार्य यानी होमवर्क स्कूली बच्चों की दिनचर्या का एक अनिवार्य अंग बन गया है। शायद ही कोई ऐसा स्कूल हो जो बच्चों को विषयगत होमवर्क न देता हो। पर सवाल है कि बच्चों कों होमवर्क क्यों दिया जाए? बच्चों के लिए इसके क्या फायदे हो सकते हैं। अगर होमवर्क न दिया जाए तो क्या बच्चे बिगड़ेंगे, जैसा कि अधिकतर अभिभावकों का मानना है कि होमवर्क के अभाव में बच्चे स्वतंत्र रहेंगे और बेलगाम हो जाएंगे। आखिर बच्चों पर यह नियंत्रण क्यों जरूरी लगता है? देखने में आता है कि होमवर्क बच्चों को बांधे रखने का जरिया बन चुका है। आज शहरी क्षेत्रों में अभिभावकों का एक बड़ा हिस्सा कामकाजी हो गया है। उसके पास घर-परिवार और बच्चों के लिए समय नहीं बचा है। बच्चों के पास बैठने और उसके मन में उठने वाले प्रश्नों के समाधान खोजने में मदद करने की फुरसत ही नहीं है। वह थका-हारा घर लौट कर आराम करना चाहता है और बच्चों के प्रश्न आराम में बाधक हैं। तो होमवर्क में फंसे बच्चे के पास न तो प्रश्न हैं न ही जिज्ञासा। अगर कुछ है तो दबाव। होमवर्क पूरा करने का दबाव और इस दबाव ने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है। मोटे चश्मों के पीछे से छांकती आंखें दिए गए होमवर्क को कॉपी में पूरा करती रहती हैं। उसके पास-पड़ोस और परिवेश में घट रही घटनाओं, प्राकृतिक बदलावों, सामाजिक तानाबाना, तीज त्योहारों को सहेजने, खोजबीन करने का न तो समय है न ही स्वतंत्रता। आखिर कैसी पीढ़ी तैयार की जा रही है, जिसकी सांसों में अपनी माटी की न तो महक बसी है और न ही आंखों में सौंदर्यबोध।

होमवर्क में विद्यालय में पढ़ाए गए विषय के प्रकरण और पाठों पर आधारित वही प्रश्न पुन: लिखने को दिए जाते हैं, जबकि एनसीएफ की अनुशंशा, बच्चों को मौलिक चिंतन-मनन के अवसर दिए जाएं, के विपरीत रटने पर जोर दिया जाता है। होमवर्क में उसके परिवार और परिवेश की बातें नहीं होतीं, जिन्हें बच्चे खोजें, अवलोकन करें और अपनी एक राय बना सकें। होमवर्क बच्चों में कुछ नया सीखने को प्रेरित नहीं कर रहा, बल्कि लकीर का फकीर बनने को विवश कर रहा है। इतना ही नहीं, होमवर्क उसे दब्बू, डरपोक और कायर बना रहा है न कि आत्मसंयमी, सत्साहसी, और चुनौतियों से जूझने वाला। विफलताएं उसे डराती हैं, वह उनसे जूझता नहीं, बल्कि पलायन करता है। यही कारण है कि वे प्रशासनिक अधिकारी, चिकित्सक, अधिवक्ता, सैनिक, व्यवसाई जैसे बड़े पद-प्रतिष्ठा अर्जित करने के बाद भी आत्महत्या कर रहे हैं और दूसरों की भी जान ले रहे हैं; क्योंकि सहनशीलता का उनमें अभाव है। सामूहिकता, सहिष्णुता और लोकतांत्रिकता के भावों का अंकुरण न होने के कारण उनकी सोच और कार्य व्यवहार में एक प्रकार की सामंती ठसक दिखाई पड़ती है, क्योंकि बचपन से ही उसे उसकी जिद और इच्छाओं को पूरा करने वाले अंिभभावकों ने उसे अभावों की न हवा लगने दी और न ही अपनी चीजों को दोस्तों से साझा करना सिखाया।

होमवर्क बच्चों की रचनात्मकता को उद्धाटित करने के बजाय मार्ग को अवरुद्ध करता है। होमवर्क पूरा करने के दबाव में बच्चे अन्य रचनात्मक गतिविधियों जैसे नृत्य, संगीत, कला, खेलकूद, पेपर क्राफ्ट, मिट्टी का कार्य, बुनाई, कशीदाकारी, लेखन, भाषण आदि के लिए समय नहीं दे पाते। होमवर्क पठन संस्कृति की हत्या कर रहा है। क्योंकि बच्चों के पास इतना समय नहीं बच रहा कि वे पाठ्एतर पुस्तकें या पत्रिकाएं पढ़ सकें। इस कारण पढ़ने से उत्पन्न नया सीख पाने का भाव तिरोहित हो रहा है। बच्चों को विद्यालयों से विषय और पाठ आधारित प्रश्न न देकर बच्चों की रुचि अनुसार ऐसे काम दिए जाएं, जिनसे वह अपने सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश को समझ सकें और किताबों और बड़ों से इतर अपनी एक राय बना सकें और उसे लगातार बेहतर करते रहें। यह उसे न केवल एक सुयोग्य संवेदनशील नागरिक के रूप में निर्मित करेगा, बल्कि उसमें मानवीय मूल्यों का निर्माण भी करेगा। आज की शिक्षा बच्चों को एक उत्पाद के रूप में तैयार कर रही है और प्रक्रिया में अभिभावक की भी स्वीकृति और भागीदारी है।

होमवर्क ने बच्चों से उनका बचपन छीनने का घोर अपराध किया है। फलत: बच्चे व्यक्तिवादी सोच के साथ बढ़ रहे हंै। सामाजिक समरसता, वैश्विक बंधुत्वभाव और पर्यावरणीय चेतना के अभाव के कारण बच्चों का दृष्टिकोण और सोच एक शोषक के रूप में उभर रही है। उसके मन में एक प्रकार की जड़ता ने घर बना लिया है, जिससे उसे सामाजिक सरोकारों से कोई मतलब नहीं रह गया है। उसे तो बस येनकेन प्रकारेण अपना स्वार्थ सिद्ध करना है और वही उसने सीखा हुआ है। आज दुनिया के अंदर हो रह नवीन शोध और अन्वेषण में भारत का कितना योगदान है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी ढोने वाला देश का नवीन शोधों के क्षेत्र में कहीं कोई स्थान ही नहीं है। चाहे वह तकनीकी ज्ञान-विज्ञान का क्षेत्र हो या रसायन और भौतिकी का। चाहे वह फिल्म निर्माण का फलक हो या खेती-किसानी की जमीन। शिक्षण-प्रशिक्षण में कोई नवाचार हो या साहित्य सर्जन का। मौलिकता का पुट कहीं दिखाई नहीं देता। हम बस नकल करने में माहिर हैं, क्योंकि बचपन में ही इसका बीजारोपण होमवर्क के माध्यम से कर दिया गया था।

होमवर्क ने अपनी परंपरागत लोक ज्ञान-विज्ञान की अथाह थाती को समझने-बूझने का अवसर बालमन ने नहीं दिया। श्रम के प्रति निष्ठा, गर्व और गौरव का भाव कहीं दिखाई नहीं देता। हम अपने निजी काम भी दूसरों से करवाना चाहते हैं।
जीवन में सकारात्मकता का संचार हुआ ही नहीं। बच्चे एक प्रकार के तनाव में जी रहे हैं। उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं, नकारात्मकता, कुंठा और क्रोध के भाव पसरे दिखाई देते हैं। क्या यह शिक्षक के रूप में हमारी विफलता नहीं है कि जिस बचपन को हंसता खिलखिलाता तेजवान और अनंत ऊर्जावान होकर उल्लास, उमंग से नवीन सर्जना में लगना चाहिए था, वह मुरझाया, बुझा हुआ, दीनहीन, म्लानमुख एक अज्ञात भय के साए में बड़ा हो रहा है। कौन है इसका जिम्मेदार! किसी एक को दोष देकर कोई बच नहीं सकता। शिक्षक, अभिभावक और यह शिक्षा व्यवस्था सभी दोषी हैं, जिसने बचपन की हत्या की है। आज दुनिया के खुशहाल देशों में हम पड़ोसी देशों से पीछे हैं। देश के नीति-नियंताओं को सोचना होगा कि भारत के भावी जीवन से खेलना बंद करें, क्योंकि देश के बनने में शताब्दियां लग जाया करती हंै। भारत के विश्वगुरु होने के थोथे गौरव गान से मुक्ति देकर यथार्थ की चित्र देखने का साहस करें कि आज ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हम कहां हैं, उत्तर अपने आप मिल जाएगा।

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