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भाषा विमर्श: गांधी का भारत और भाषाएं

रविवारी स्पेशल: भाषा विमर्श

Author November 11, 2018 2:03 AM
प्रतीकात्मक फोटो

अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

महात्मा गांधी आज के भारत की बुनियाद के केंद्रीय प्रस्तावक थे। पूरे स्वतंत्रता संघर्ष में वे न सिर्फ अंग्रेजों के विरुद्ध प्रतिरोध को लेकर सक्रिय थे, बल्कि इन सबके मध्य भावी भारत का एक खाका लेकर काम कर रहे थे और समय के साथ इस खाके को अद्यतित भी करते रहे। देश, समाज, कृषि, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, भाषा, रोजगार, उद्योग, स्वास्थ्य और जीवन-चर्या जैसे आज के भी ज्वलंत प्रश्न उनके सपने और इसको पूरा करने की जिद में शामिल थे। गांधी मानते भी थे कि ‘देश एक दिन में नहीं बन जाया करते, बल्कि इसके बनने में वर्षों लग जाते हैं।’ उनकी दृष्टि में देश की आजादी से बड़ी आवश्यकता उसके भविष्य के संचालन की क्षमता का विकास और तौर-तरीके थे। अपने उद्देश्य के प्रति इतना दृढ़ थे कि देश जब स्वतंत्र हुआ तो उनके केंद्रीय नेतृत्व में प्राप्त इस स्वतंत्रता के जश्न से परे स्वतंत्र भारत के सपने की अड़चनों को दूर करने में व्यस्त थे। ‘यंग इंडिया’ (1931) में वे लिखते हैं कि ‘मैं एक ऐसे भारत के लिए काम करूंगा, जहां निर्धनतम व्यक्ति भी यह महसूस कर सके कि यह उसका भारत है… उस भारत में ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं होगा और सभी समुदाय के लोग एक आदर्श सामंजस्य के साथ रहेंगे। औरतों को भी पुरुषों के समान अधिकार होंगे।… व्यक्तिगत रूप से मुझे बाहरी या स्थानीय लोगों में विभेद से घृणा है। यही मेरे सपनों का भारत है… इससे कम मुझे किसी भी रूप में संतुष्टि नहीं मिलेगी।’

गांधी के भाषाई प्रयोगों को अगर विवेचित किया जाए तो स्पष्ट होगा कि वे स्वतंत्र भारत की भाषा-नीति और भाषिक योजना को लेकर कितना सजग थे। 21 जनवरी, 1918 को रवींद्रनाथ टैगोर को लिखे पत्र में वे सवाल उठाते हैं कि ‘क्या यह आवश्यक नहीं कि हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों में अधिकतम शिक्षा स्थानीय भाषाओं के माध्यम से दिया जाए?’ हालांकि इसी पत्र में हिंदी को देश की संपर्क-भाषा की भूमिका पर भी आग्रह था, लेकिन उस समय देश में आम लोगों को एकजुट करने के लिए एक भाषा की आवश्यकता थी, जो सिर्फ हिंदी से हो सकती थी और वह आज भी है। यदि उस पर गांधी ने हिंदी को लेकर कोई पहल की थी, तो वह समय की आवश्यकता थी, लेकिन महाविद्यालयों तक की शिक्षा स्थानीय भाषा में दिए जाने की चिंता एक दूरदर्शी राजनेता की चिंता थी, जिसे शायद आज सौ वर्षों में अनेक चरणों के बीत जाने के बावजूद वर्तमान पीढ़ी के राजनेता और नौकरशाही समझने तक को तैयार नहीं है।

बाद में 1937 में जब महात्मा गांधी की अध्यक्षता में ‘अखिल भारतीय शैक्षिक सम्मेलन’ हुआ, तो उन्होंने शिक्षा विषयक अपने चिंतन ‘वर्धा योजना’ का प्रस्ताव रखा था, तो उसमें बच्चों के निश्शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो, इस पर पूरा जोर दिया था। इसके साथ यह महत्त्वपूर्ण था कि ‘शिक्षा हस्तशिल्प और उत्पादक कार्य केंद्रित हो।’ अब यहां गांधी के गांव आधारित अर्थव्यवस्था के विचारों के वृहत्तर दायरे में स्थानीय भाषा, संस्कृति और रहन-सहन को विवेचित किया जाए, तो आज अल्पसंख्यक भाषा-संस्कृति पर आसन्न खतरे को दूर किया जा सकता था। इससे शहरी विस्थापन कम होता, जनसंख्या के शहरी और ग्रामीण अंसतुलन को रोका जा सकता था। ऐसे में एक तरफ आज की न सिर्फ भाषाई चिंता, बल्कि शहरों की चरमराती ढांचागत व्यवस्थाएं और प्राणघातक प्रदूषण, तो दूसरी तरह गांवों में विकास के अभाव जैसी अनेक समस्याएं अपना सिर ही न उठातीं।

बहरहाल, भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक बड़ा पक्ष भाषाई संघर्ष भी था और गांधी जो इस संघर्ष के केंद्र में थे, भली-भांति इस तथ्य से परिचित थे। ध्यान रहे कि इस संघर्ष में एक तरफ ब्रिटिश इतिहासकार थामस बी. मैकाले की वह दृष्टि थी, जिसके अनुसार उसने 1835 में अपने शिक्षा-विषयक मसौदे में कहा है कि ‘ब्रिटिश सरकार तब तक भारत पर शासन नहीं कर पाएगी, जब तक कि वह भारत में एक ऐसे वर्ग का विकास नहीं कर पाएगी, जो अंग्रेजों और भारतीयों के मध्य दुभाषिया का काम कर सकें, इस वर्ग का शरीर और खून तो भारतीय हो, लेकिन उसके स्वाद, विचार, नैतिकता और वैचारिकी में अंग्रेजी रची-बसी हो।’ यह साम्राज्यवादी अधीनता का भाषाई दरवाजा था, जो आज तक बदस्तूर जारी है। हालांकि जोसेफ लेलीवेल्ड (2011) के अनुसार आगे मैकाले ने इस नए अंग्रेजीमय वर्ग से यह भी अपेक्षा की थी कि ‘यह नवसमाज स्थानीय भाषाओं को परिष्कृत करे… और समाज के व्यापक तबकों तक ज्ञान के प्रसार का इसे पहिया बनाए।’

स्पष्ट है कि यह भाषा और ज्ञान के उच्चताबोध का परिणाम था, जिसमें अंग्रेजी सीख कर ‘ज्ञानी’ बना जा सकता था और ऐसे ‘ज्ञानी’ ब्रिटिश सरकार की स्थापना के लिए तो आवश्यक थे ही, साथ में स्थानीय भाषाओं में ‘ज्ञान’ पहुंचाने में सक्षम थे। दूसरी तरफ महात्मा गांधी ने 1909 में लिखे ‘हिंद स्वराज’ में स्वीकार किया है कि ‘सारा हिंदुस्तान गुलामी में घिरा हुआ नहीं है। जिन्होंने पश्चिम की शिक्षा पाई है या इसके पाश में फंस गए हैं, वे ही गुलामी में घिरे हुए हैं।’
गांधी अपने जीवन में भाषा के प्रति हमेशा सजग थे। उस समय जब संचार के इतने साधन नहीं थे, तब भी देश के वे एक ऐसे नेता थे, जिनकी आवाज पर लाखों लोग सड़क पर लाठी खाने को तैयार रहते थे तो यह अनायास नहीं, उसके पीछे गांधी की देश की नब्ज की समझ और उसके प्रति नैतिक और सत्याग्रही सोच थी। जाहिर है कि यह सब कुछ बिना किसि ऐसी भाषा के संभव नहीं था, जो आमजन के संप्रेषण हेतु संभव हो। एक तरफ तो वे देश को एक सूत्र में पिरोने के लिए हिंदुस्तानी के पक्षधर थे और अखिल भारतीय स्तर पर ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ जैसे संगठनों की स्थापना की थी, तो खुद ‘हिंद-स्वराज’ को अपनी मातृभाषा गुजराती में लिखा था। ध्यान रहे कि जिस समय वे हिंद-स्वराज का लेखन कर रहे थे, उस समय उनके लिए सबसे सुविधाजनक भाषा अंग्रेजी होती। लेकिन इन सबसे परे गांधी ने गुजराती को चुना, क्योंकि वे जिस भारत की परिकल्पना कर रहे थे, उसमें भारतीय सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक जातीय और स्वतंत्रचेता मनुष्य थे। ऐसे में उनकी भाषा और संस्कृति उनके लिए महत्त्वपूर्ण थी।

यह अनायास नहीं था कि देश की स्वतंत्रता की पूर्वसंध्या पर उन्होंने बीबीसी के पत्रकार को अपना संदेश यह कह कर देने से मना कर दिया था कि ‘ब्रितानियों को बता दो कि गांधी को अंग्रेजी नहीं आती।’ स्पष्ट है कि उनके जीवन में अंग्रेजी के प्रयोग की आवश्यकता समाप्त हो चुकी थी और अब आजाद भारत का सपना सबसे बड़ा था, क्योंकि उनकी दृष्टि में स्वराज्य का मतलब सिर्फ उसमें काम करने वाले अधिकारियों और कर्मियों के शरीर का रंग बदल जाने तक सीमित नहीं था। गांधी लिखते हैं कि ‘आप बाघ (अंग्रेज) का स्वभाव तो चाहते हैं, लेकिन बाघ नहीं चाहते। मतलब यह हुआ कि आप हिंदुस्तान को अंग्रेज बनाना चाहते हैं और हिंदुस्तान जब अंग्रेज बन जाएगा तब वह हिंदुस्तान नहीं कहा जाएगा, बल्कि सच्चा इंग्लिस्तान कहा जाएगा। यह मेरी कल्पना का स्वराज्य नहीं है।’ स्वतंत्र भारत में गांधी की आवश्यकता पहले से अधिक थी। यह देश का दुर्भाग्य था कि उन्होंने जिस सपने को लेकर स्वतंत्रता-संघर्ष का आह्वान किया था, वह आज भी यथावत है। जहां तक भाषा का सवाल है, आज मातृभाषा शिक्षा और संरक्षण की चिंता करने की आवश्यकता पहले से अधिक है, क्योंकि तबके अंग्रेज तो शरीर के रूप में सामने थे, लेकिन आज वे खून बन कर हमारी रगों में दौड़ रहे हैं।

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