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ललित प्रसंग: चोट और घाव

उस दिन सदानंद जी महीनों बाद आए। आते ही बोल पड़े, ‘भाई साहब आप से एक सवाल पूछना है।’ मैं थोड़ा हैरान हुआ। इसलिए कि सदानंद जी जब भी आते है आनंद में आते हैं। ऐसा नहीं है कि परेशानियों से उनका परिचय नहीं हैं...

Author January 27, 2019 12:06 AM
प्रतीकात्मक फोटो

उमेश प्रसाद सिंह

उस दिन सदानंद जी महीनों बाद आए। आते ही बोल पड़े, ‘भाई साहब आप से एक सवाल पूछना है।’ मैं थोड़ा हैरान हुआ। इसलिए कि सदानंद जी जब भी आते है आनंद में आते हैं। ऐसा नहीं है कि परेशानियों से उनका परिचय नहीं हैं। नहीं वे परेशानियों के बीच हमेशा रहते हैं फिर भी आनंद में रहते है। हमारे समय में प्राय: लोग अपनी ही परेशानियों में लस्त-पस्त दिखते हैं। मगर सदानंद जी अपनी परेशानियों के साथ औरों की परेशानियों को भी हल करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते हैं, फिर भी प्रसन्न रहते हैं। वे किसानो के संगठन का बीड़ा उठाए गांव-गांव घूमते रहते हैं, फिर भी उर्दू अदब के प्रतिष्ठित रचनाकारों की मुहब्बत की गजल गाते-सुनाते रहते हैं। मिलते ही मिलते दिल खोल कर ठहाका मार कर हंसते हैं, हंसाते हैं। आज उनके मुंह से सवाल की बात सुन कर मुझे थोड़ा झटका लगा।

‘यह सवाल कहां से पकड़ लिया आपने?’ मैने विनोद में पूछा। ‘नहीं, मैंने नहीं पकड़ा है। उसी ने कई दिन से पकड़ रखा है, मुझे।’ उन्होंने भावहीन सरलता से कहा। ‘चलिए पूछ लीजिए। मैने हंसते हुए कहा, ‘वैसे हमारे समय के तो सारे सवाल केवल राजनीति से पूछे जाने वाले सवाल बन गए हैं, फिर भी। सवाल कोई भी हो, जवाब सिर्फ राजनीति के पास है। ‘नहींं, मेरा सवाल, साहित्यिक सरोकार का सवाल है। आप साहित्यकार हैं, इसलिए सोचा आपसे पूछ लेंगे।’ ‘आजकल तो साहित्यकारों से साहित्य के विद्यार्थी भी सवाल पूछना छोड़ चुके हैं। फिर भी मेरी तरफ से आपके सवाल का स्वागत है।’
‘भाई साहब! क्या आनुप्रासिक शब्दों में अर्थसाम्य भी समाहित रहता है?’

उनकी बात सुन कर मेरे माथे पर बल की लकीरें उग आर्इं। मैंने देखा, उनका चेहरा गहन अवसाद से भर आया था। ‘भाई साहब, इस महीने मैं पीड़ा से परेशान रहा। पहले पागल का शिकार हुआ। फिर पुलिस का।… पागल ने मेरे शरीर को चोट पहुंचाई। पुलिस ने मन को घायल किया।… पुलिस का काम भी पागलपन का काम है, क्या? तबसे सोच रहा हूं, पागल और पुलिस में अर्थसाम्य है क्या? दोनों के कार्य व्यवहार में समानता देख कर मैं हैरान हूं।… अभी-अभी मैं कचहरी से मुचलका करा कर आ रहा हूं।’ ‘अरे! ऐसा क्या हुआ?’ मेरी उत्सुकता अचानक सदानंद के प्रति काफी बढ़ गई।
‘जी बताता हूं। बताता हूं।’

मेरे पड़ोस से एक लड़का कई दिनों से मेरे दरवाजे पर र्इंट-पत्थर के टुकड़े फेंक रहा था। एक बार तो मैंने ध्यान नहींं दिया। मगर जब बार-बार ढेले गिरने लगे तो मुझे चिंता हुई। मैं परेशान हुआ। अपने दूसरे पड़ोसियों से मैंने उलाहना भेजा। कोई परिणाम नहींं निकला। फिर मैंने खुद घर के जिम्मेदार लोगों से कहा। लेकिन कोई सुधार नहीं आया। रुक-रुक कर ढेले-पत्थर आते रहे।
एक दिन जैसे ही मैं शाम को बाहर से लौटा, र्इंट के दो-तीन टुकड़े मेरे आगे गिरे। दरवाजे पर कई लोग बैठे थे। बड़ा नागवार लगा। मुझे गुस्सा आ गया। मैंने कहा चलकर पूछते हैं, ऐसा क्यों हो रहा है। लड़का बिगड़ैल हो गया है तो क्या, चलिए चल कर डांटते हैं। थोड़ा डर होगा तो ऐसा करना बंद कर दे।

हम लोग गए। चार-पांच आदमी गए। मगर डांटने-फटकारने की नौबत ही नहीं आई। घर में और कोई था नहीं। अंधेरा हो गया था। वही लड़का था, जो र्इंट-पत्थर फेंकता था। हमारे आने की आहट उसे लग चुकी थी। दरवाजे में हेलते ही उसने छिप कर लोहे की वनजदार छड़ी से वार कर दिया। राड सीधे मेरे सिर पर लगा। खून की धारा फूट पड़ी। साथ के लोगों ने हो-हल्ला मचाया। पूरा मजमा लग गया। अब एक दूसरा ही कांड अपनी विभत्सता में अट्टहास कर रहा था। सारे के सारे लोग सकते में आ गए।’

‘फिर।’
‘फिर क्या बताएं। पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। उपचार कराया। कहा जाने लगा कि लड़के का दिमाग ठीक नहीं चल रहा है। तर्क दिया गया कि अगर वह पागल नहींं होता तो आप जैसे प्रतिष्ठित आदमी पर इतना घातक प्रहार कैसे करता। फिर मुझे समझाया जाने लगा कि मेरा प्रतिष्ठित होना लड़के के पागल होने के लिए पर्याप्त प्रमाण है। मुझे उसे बिना क्षमा मांगे क्षमा कर देना चाहिए। उसका पागल होना उसे क्षमा मांगने से छूट देने के लिए पर्याप्त है। मैं समझने की कोशिश में लगा रहा। सिर में सात टांके लग गए। मैं कुछ समझ नहीं सका। कई दिनों बाद हमारे हलके के दरोगा जी आए। उन्होंने बड़े सम्मान के साथ घटना के प्रति खेद व्यक्त किया। और पहले ही घटना की सूचना पुलिस को देने की बात बताई। मन में सवाल उठा, पूंछू कि पहले सूचना देता तो पुलिस क्या कर लेती? जब सूचना दी है, तो पुलिस को क्या करना है? मगर नहीं पूछा। अब तो सब कुछ दिखाई ही दे रहा था। नहीं पूछा। पता नहीं अपने दरवाजे पर शालीनता हमें कैसे हमेशा दबोच लेती है।

जाते-जाते दरोगा जी ने मुझे मेरे सम्मान में आश्वस्त किया कि अगर अब दुबारा पागल बन कर ऐसी हरकत करेगा तो उसे जेल में डाल दूंगा। मैं सोचने लगा कि उसे जेल जाने के लिए मुझे फिर सिर फोड़वाना पड़ेगा। मैंने सोचा ऐसी सजा दिलवाने से जैसा है, वैसा ही भला। खैर। चार-छह दिन बाद थाने का एक सिपाही मुझे नोटिस तामील कराने आया। नोटिस में लिखा था कि थानेदार को मुझसे शांतिभंग की आशंका है। शांति व्यवस्था कायम रखने के लिए मुझे मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित होकर पाबंद होना होगा। दफा 107-117 के तहत छह महीने तक मुचलका कराने के बावजूद नियत तारीख पर मुझे मजिस्ट्रेट के दफ्तर में हाजिर होते रहना है।

बड़ा अद्भुत है! बड़ा विस्मयजनक है। हमारे लोकतंत्र में शांति-व्यवस्था कितनी विचित्र है। कितनी विद्रूप है। कितनी वेदनामय है। मेरे सिर का घाव तो भर गया। मगर दरोगा जी ने कानून का जो डंडा मेरे ऊपर चलाया, उसका घाव जैसे का तैसा है। उसका इलाज कहां कराऊं? पता नहीं। हमारे समय मे पुलिस के लिए सबसे बड़ा अपराध, अपराध की सूचना देना है क्या? आज आपसे पूछने आ गया कि पागल और पुलिस एक जैसे ही होते हैं, क्या? अभी तक तो अनुप्रास शब्दों में ही पढ़ा था, अर्थानुप्रास का तो अब पता चला है।’ मैं सदानंद जी का केवल मुंह ताकता रह गया। एक शब्द भी बोल नहीं सका। कुछ भी कहना मेरे वश का नहीं था। मेरे बूते का नहीं था। मेरे सामने खुद अनुप्रास का नया अर्थ खुल रहा था।

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