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इमली का पेड़

जेठ की शाम। कॉलोनी में घरों के दरवाजे खुलते तो बच्चों का समूह इमली के पेड़ के नीचे इकट्ठा हो जाता। पेड़ बहुत घना है। उसके नीचे और आसपास खूब छांव और शीतलता रहती है। उसके छोटे-छोटे सूखे पत्ते सब घरों के बच्चों को न्योता देना नहीं भूलते। बच्चों की माएं बहुत चिढ़तीं। पूरा आंगन न्योते से भर जाता...

Author January 27, 2019 12:06 AM
प्रतीकात्मक फोटो

राजेश झरपुरे

जेठ की शाम। कॉलोनी में घरों के दरवाजे खुलते तो बच्चों का समूह इमली के पेड़ के नीचे इकट्ठा हो जाता। पेड़ बहुत घना है। उसके नीचे और आसपास खूब छांव और शीतलता रहती है। उसके छोटे-छोटे सूखे पत्ते सब घरों के बच्चों को न्योता देना नहीं भूलते। बच्चों की माएं बहुत चिढ़तीं। पूरा आंगन न्योते से भर जाता। जेठ की दुपहरी में घरों में कैद, कूलर पंखों की हवा से कुम्हलाए बच्चों की किलकारियां पेड़ के सान्निध्य में आकर चमक उठतीं। यह चमक दोपहर की चमक से ज्यादा प्रखर और उन्मुक्त होती। पूरी कॉलोनी में एक ही पेड़ था। वह कॉलोनी बनने और बसने से पहले भी था और अब भी है। उसका होना मात्र एक संयोग है। कॉलोनी का नक्शा तैयार हुआ। बहुत से पेड़ प्लाट एरिया के बीचों-बीच सीना ताने खड़े थे। प्लाट में मकान और मकान में परिवार रह सकते हैं। मकान में पेड़ के लिए कोई स्थान नहीं।

अपनी कॉरपोरेट सोच के अधीन कॉलोनाइजर ने उनके सीने में चोरी-छुपे हींग भरवा कर उन्हें सुखा कर गिरा देने का षड्यंत्र रचा था। जैसे कोई शत्रु को स्लो पाइजन देने का रचता है। हालांकि कॉलोनाईजर इस तरह का पाप करने से पूर्व क्षणभर के लिए दहला था, पर अपने अभिप्राय से पीछे नहीं हटा। उसका लोभ, लाभ तक आसानी से पहुंच रहा था। उसने शीघ्र ही अपने डर पर विजय पा ली। वह उसी रास्ते पर चल पड़ा, जहां उसका लाभ था। इस तरह पाप के रास्ते पर चलने से पूर्व उसने पेड़ों से कहा था- ‘…चलो! मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हें जंगल तक छोड़ आता हूं। तुम वहां रहना अपने बंधु-बांधव के साथ। हम यहां अपने वालों के साथ ठीक-ठाक तरीके से रह लेंगे। हम और हमारे लोग लगातार बढ़ते जा रहे हैं। तुम्हें हमारे लिए कुछ जगह तो छोड़नी ही पड़ेगी।’ यह उसकी भलमनसाहत थी। पर पेड़ नहीं माने। तब कालोनाइजर ने हींग की बात मानी। हींग पेड़ से अधिक ताकतवर था। उसे अपने से कमजोर लोगों के आगे झुकना और उनकी बातें सुनना बिल्कुल पसंद नहीं था। हींग उसके व्यापार के पक्ष में था। वैसे भी उसे चीजों और लोगों का अपने विपक्ष में होना पसंद नहीं था। यही कारण था कि नक्शे में दिख रहे पेड़ उसकी पहली नापसंद बने।

हींग ने एक पक्के दोस्त की तरह वादा किया। उसने सच्ची दोस्ती निभाते हुए उन हरे-भरे पेड़ों को दो साल से कुछ महीने पहले ही सुखा कर कांटा कर दिया। सूखे पेड़ बिना किसी प्रशासकीय आपत्ति के काट दिए गए। भूखंड समतल मैदान में बदल गया। बस! बचा रहा इमली का पेड़। यद्यपि उसके भी सीने में छेद कर दिया गया था। हो सकता है, जल्दी में और कोई देख न ले के डर से मजदूर भाई उसमें हींग डालना भूल गए हों। जब सब पेड़ काट दिए गए तो पता चला, वह नक्शे के हिसाब से गली नंबर पांच और छह की बाईस फीट चौड़ी गली के आखिर में आ रहा है। वहां उसके होने से निर्माण कार्य और कॉलोनी की सुंदरता में कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। हां! थोड़ा आकर्षण जरूर बढ़ गया था।

इस तरह उसका आकर्षक होना उसको बचाए रखा। वह जल्द ही बन और बस गई कॉलोनी का हिस्सा हो गया। आस-पड़ोस में लोग भले एक-दूसरे से बातचीत न करते हों। एक-दूसरे के घरों में उनका आना-जाना न हो, पर वे सब इमली के पेड़ के पास तक अवश्य आते-जाते। कॉलोनी की अन्य गलियों की अपेक्षा, गली नंबर पांच-छह में कुछ ज्यादा आवाजाही रहती। इसी गली में चौंतीस नंबर डुप्लेक्स में रहने वाली नीतू की मम्मी को इमली का पेड़ फूटी आंख नहीं सुहाता था। उसका मानना था- ‘…पेड़ भी शुभ-अशुभ फलदायी होते हैं। पेड़ में या तो देव रहते हैं या दानव। यह उनका गृह कहलाते हैं। इमली का पेड़ तो बड़ा ही अशुभ होता है। इसमें शैतान का डेरा होता है। मेरा बस चले तो इसे तुरंत कटवा कर फिकवा दूं।’

स्वीटी की मम्मी जो नीतू की मम्मी की पड़ोसन है- इस बात से इत्तिफाक नहीं रखती। वह कहती, ‘… घर के आसपास पेड़ होने चाहिए। हमें शुद्ध वायु मिलती है। शुद्ध वायु जहां से मिले वह शुभ। पेड़ पर न देव रहते हैं न दानव। पेड़ पर पक्षियों का घोंसला होता है। वे रहते हैं वहां। उनका कलरव किसी मधुर संगीत से कम नहीं होता। आप जो बता रही हैं, वह सब कही-सुनी बातें हैं। जो प्रत्यक्ष हैं- आप उसे देखें और महसूस करे।’
नीतू की मम्मी स्वीटी की मम्मी से सहमत नहीं हो पाती। वह डरती है। उसका ज्ञान उसे डरपोक बनाता है।

वह अपने डरपोक स्वभाव के कारण सदा अपनी बेटी नीतू को पेड़ के समीप जाने से रोकती रही है, पर बच्चे कहां मानते?
गली नंबर पांच-छह में रहने के कारण नीतू और स्वीटी का इमली के पेड़ पर पहला हक है, ऐसा उन दोनों का मानना था। गली नंबर तीन-चार से जब डॉली, मिनकी, रितू और बंटी आकर पेड़ के नीचे बॉल उछालने लगे, तो नीतू का माथा ठनका। वह अभी तैयार ही हो रही थी। कल उसका हैप्पी बर्थडे है। यह बात वह अपने सभी दोस्तों को बताना चाहती थी। उसने सोचा सभी दोस्त पहले उसके घर आएंगे तब वह उनको बताएगी और उन्हीं के साथ पेड़ के नीचे खेलने चली जाएगी। सभी दोस्तों को देख कर मम्मी नाराज नहीं होती। वह तनिक उदास हो गई, लेकिन मम्मी के मुंह फेरते ही वह गेट से बाहर निकल कर पेड़ के समीप पहुंच गई। उसके घर के गेट के खुलने की आवाज सुन कर पड़ोस से स्वीटी भी दौड़ी चली आई।

पक्षी अपने घोंसले में लौट रहे थे। बच्चों का हंसना, खिलखिलाना और पक्षियों का कलरव पेड़ की खिलखिलाहट में बदल गया। भरी दुपहरी में तेज धूप और लू के थपेड़े सहने के बाद भी वह मुसकरा रहा था। कॉलोनी की अन्य गलियों से भी बच्चे दो-दो, तीन-तीन के समूह में आने लगे। स्वीटी और नीतू पेड़ का चक्कर लगा रही थीं। अन्य बच्चों ने भी बॉल को एक तरफ कर दिया और उनके पीछे पेड़ का चक्कर लगाने लगे। पेड़ बच्चों के लाड़-प्यार से बंधा था। वह सदा इस तरह के बंधन के लिए आतुर रहता, पर बच्चे शाम को ही घर से निकल पाते थे। वह शाम से उनकी प्रतीक्षा करता। जब सारे बच्चे उसके इर्द-गिर्द इकट्ठे हो जाते तो वह भी एक बच्चे की तरह झूम उठता।

दौड़-भाग के खेल में मिनकी अचानक औंधे मुंह गिर पड़ी। पेड़ की जड़ का अंदरूनी सिरा सतह पर झांक रहा था। उसकी सेंडिल का अगला हिस्सा उससे टकरा गया। बच्चे अचानक थम गए। नीतू ने हाथ पकड़ कर उसे उठाया और पेड़ से टिका कर बैठा दिया। स्वीटी ने उसकी फ्रॉक से इमली के सूखे पत्तों को झाड़ा। उसके घुटने छिल गए। मिनकी ने स्वीटी से कहा- ‘…स्वीटी तेरा घर पास है। जा, दौड़ कर कोई एंटीसेप्टिक क्रीम ले आ। बहुत दर्द हो रहा होगा बेचारी को।’ स्वीटी दौड़ कर घर से दवा उठा लाई। रितू ने झट उसके हाथ से टूयब लेकर मिनकी के घुटने में लगा दिया। बंटी घुटने के बल बैठा था। वह मिनकी के घुटने से रिसते खून को अपने नन्हे हाथों से पोंछता हुआ लगातार फूंक मार रहा था। मिनकी न रो रही थी, न सिसक रही थी। बस, सहमी हुई थी। उसे डर था कि मम्मी नाराज होगी। डांटेगी। ज्यादा गुस्सा हुई तो दो-चार थप्पड़ भी जड़ सकती है।

मिनकी की तरह नीतू और दूसरे बच्चे भी डर गए थे। सभी को घर से हिदायत मिली हुई थी- ‘…ज्यादा मस्ती नहीं करना। संभल कर चलना। किसी को चोट नहीं लगनी चाहिए। किसी अजनबी से बिल्कुल बात नहीं करना, न उसकी कोई बात मानना।’ ये निर्देश सभी मम्मियों के थे। बच्चों को सहमा हुआ देख कर पेड़ भी सहम गया। उसे बच्चों की मम्मियों का बच्चों को डांटना और मारना बिल्कुल पसंद नहीं था। गली नंबर पांच-छह से जब भी किसी बच्चे की रोने-चीखने की आवाज आती, तो वह क्रोधित हो उठता। जोर-जोर से हुंकारे भरता। उसका वश चलता तो वह घर जाकर बच्चों के मम्मी-पापा को डांट देता। लेकिन वह विवश था। बस, हुंकार भर कर रह जाता। पर अभी पूरी गलती उसी की थी। उसे सतह पर निकल आई अपनी जड़ की लट पर बहुत गुस्सा आया। उसने अपने गुस्से को दिन भर सोखे गए जेठ की दुपहरी के ताप और अपने ताव को शाखाओं के माध्यम से जोर से झंझोट कर अभिव्यक्त किया। वह मजबूर था। कुछ नहीं कर सकता था। कॉलोनाइजर ने भूखंड को समतल करते समय उसके आसपास की बहुत-सी मिट्टी को हटा दिया, जिससे उसकी जड़ का अंदरूनी सिरा बाहर निकल आया था। सभी बच्चे चुप और सहमे हुए थे। वातावरण में गहरी निस्तब्धता छा गई।

नीतू ने वातावरण को भयमुक्त बनाने के लिए कहा- ‘…रितु कल मेरा हैप्पी बर्थडे है। कल केक का पहला टुकड़ा हमारी टीम की सबसे बहादुर दोस्त मिनकी को मिलेगा।’ इस सूचना के साथ ही बच्चे चहक उठे। मिनकी भी मुस्करा उठी। ‘अब कोई दौड़ेगा नहीं। सब बैठ जाओ। कल बर्थडे में कौन, किस सांग पर डांस करेगा, पहले ही बता दो।’ नीतू ने स्वीटी का हाथ पकड़ कर उसे बैठाते हुए कहा। कुछ बच्चे पहले से ही बैठे थे। कुछ नीतू और स्वीटी के साथ बैठ गए। कॉलोनी में किसी घर से कोई मम्मी इधर झांक कर देख ले तो उन्हें लगना चाहिए कि बच्चे मस्ती नहीं कर रहे। नीतू के चेहरे पर अतिरिक्त प्रसन्नता छा गई थी। मम्मी-पापा द्वारा लाई हल्के हरे रंग की फ्राक उसकी आंखों के सामने तैर गई। केक और टॉफी तो कल पापा ऑफिस से लौटते समय लाएंगे। बच्चों की उदासी के साथ पेड़ की उदासी भी छंटने लगी। हवा का एक गुनगुना-सा झोंका आया। सब बच्चों के मुख हल्की धूल से नहा गए। ‘ऐ मिनकी! तेरी दादी ने तुझे जो डेविल वाली कहानी सुनाई थी न, वैसी ही कहानी कल टीवी पर आई थी…’ डॉली ने कहा।

बंटी को कहानी सुनना अच्छा लगता था। उसने डाली से कहा- ‘…मुझे भी सुनाओ न दीदी।’ वह सबसे छोटा था। कक्षा दो में पढ़ता था। मिनकी की दादी इन दिनों गांव से आई हुई थीं। दादा-दादी बदलते हुए सामाजिक दौर में अपने बेटे के घर मेहमान की तरह आते और चले जाते। मिनकी उन्हें गेस्ट कहती। दादी जब तक रहतीं, मिनकी को अपने साथ ही सुलातीं और रोज उसे बीते जमाने की कहानी सुनाती। बंटी की उत्सुकता देख कर उसने कहा- ‘…अरे बंटी मिनकी ने तो हम सबको पहले ही सुना दिया था। उस स्टोरी में एक डेविल होता है। उसने छोटी राजकुमारी को चुरा कर अपनी गुफा में छुपा दिया। उसके मम्मी-पापा खूब रोए। दूर आसमान से एक राजकुमार उड़ते घोड़े पर आया। उसने राजकुमारी के मम्मी-पापा की मदद की। अपनी जादुई छड़ी से डेविल को मार कर छोटी राजकुमारी को छुड़ा कर उसके मम्मी-पापा को दे दिया… बस।’ डॉली ने संक्षेप में बंटी को कहानी अपने शब्दों में कह सुनाई।

‘दीदी! क्या सचमुच के डेविल होते हैं?’ बंटी ने सहज जिज्ञासा से पूछा। कहानी सुन कर वह डेविल से डर गया था। ‘हां! दादी कहती है। टीवी में भी दिखाया जाता है। मतलब होते हैं।’ डॉली ने कहा। वह डेविल जैसी किसी चीज के धरती पर होने की बात को अपने मन में पक्के तौर पर बैठा चुकी थी। सभी बच्चों को भी डेविल से डर लगता था। उन्होंने सचमुच का डेविल नहीं देखा। उनकी कल्पना में दो सींग, लंबे-लंबे नाखून, बड़े-बड़े बाल और विकराल देह वाले किसी आदमकद की तस्वीर को जड़ दिया गया था। वे सब उसे डेविल मानने लगे। ‘हां! बहुत खतरनाक होते हैं डेविल।’ स्वीटी ने हाथ की अंगुलियों को पंजे की तरफ मोड़ कर बंटी को डराते हुए कहा। वह सचमुच डर गया। पीछे हटा और मिनकी के गले में हाथ डाल कर उससे लिपट गया। ‘डरपोक! डरपोक!! डरपोक!!!’ कह कर सभी बच्चे उसे चिढ़ाने लगे।

बंटी को भी ताव आ गया। उसने मिनकी के गले से हाथ निकाल कर ऊपर उठाया और जोर से चीखा ‘…तुम सब डरपोक हो। बंटी नहीं है।’ फिर खुद भी अन्य बच्चों की तरह चिल्लाने लगा- ‘डरपोक! डरपोक!! डरपोक!!!’
डर और साहस के बीच बंटी की पैंट नीचे खिसक गई। उसने झट से उसे ऊपर की ओर खींच कर ठीक किया। उसकी इस हरकत पर सभी बच्चे खिलखिला कर हंस पड़े। इस सामूहिक हंसी में बंटी की भी छोटी-सी हंसी शामिल थी, जिसे सागर में उठने वाली बड़ी लहरों के बीच एक छोटी और ताकतवर लहर के रूप में महसूस किया जा सकता था। इस हंसी में पक्षियों का कलरव और पेड़ का उन्माद भी शामिल था। मंद-मंद चल रही बयार में वह भी बच्चों की तरह झूम रहा था।

टीवी पर डेविल की कहानी दिखाए और सुनाए जाने पर बंटी को सहसा समाचार में दिखाए गए उस व्यक्ति का स्मरण हो आया, जिसके चेहरे को काले कपड़े से ढंक दिया जाता है और वाचक उसे रेपिस्ट कहते हैं। उसके मन में जिज्ञासा ने फिर करवट ली। उसने डॉली से पूछा- ‘अच्छा दीदी! यह बताओ डेविल ज्यादा खतरनाक होते हैं या रेपिस्ट?’ सब बच्चे शांत हो गए। लड़कियां एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं। एक तेज हवा का झोंका आया। हवा का झोंका दूर किसी गली के कोने में जा टकराया। उस झोंके में सवार कई पत्तियां, कागज के टुकड़े, घास-फूस के तिनके उस घर के आंगन में घुस गए, जिससे वह टकराया था।
स्वीटी ने जोर से चिल्ला कर कहा ‘…भागो! भागो!!’ सब बच्चे भाग कर अपने-अपने घर चल दिए। बंटी असमंजस्य में वहीं खड़ा रहा। उसे समझ में नहीं आया कि उसने ऐसा क्या पूछ लिया कि सब दीदी डर कर भाग गर्इं…? वह कुछ समझ पाता उससे पहले एक ईगल इमली के पेड़ के ऊपर आकर बैठा। बंटी अपने आप को अकेला पाकर उसे देख कर डर गया और जोर से चीख कर कहने लगा- भागो! भागो !! ईगल आया है। सभी बच्चे पहले ही दौड़ पड़े थे। वह भी दौड़ कर अपने घर की तरफ चल पड़ा।

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