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योग दर्शन: योग का आधार अहिंसा

अहिंसा मनुष्य का स्वाभाविक गुण तो नहीं है, पर आवश्यक गुण जरूर होना चाहिए। योगाभ्यास में अहिंसा प्रथम सीढ़ी है। अहिंसा के बिना योग की सिद्धि संभव नहीं है। अहिंसा के अभ्यास में जब परिपक्वता आ जाती है तब सभी प्राणियों के प्रति भेदभाव समाप्त हो जाता है...

Author January 27, 2019 12:22 AM
प्रतीकात्मक फोटो

डॉ. वरुण वीर

अहिंसा मनुष्य का स्वाभाविक गुण तो नहीं है, पर आवश्यक गुण जरूर होना चाहिए। योगाभ्यास में अहिंसा प्रथम सीढ़ी है। अहिंसा के बिना योग की सिद्धि संभव नहीं है। अहिंसा के अभ्यास में जब परिपक्वता आ जाती है तब सभी प्राणियों के प्रति भेदभाव समाप्त हो जाता है। जब व्यक्ति अहिंसा का अभ्यास मन, वाणी और शरीर से करता है तो उसे अहिंसा की सिद्धि प्राप्त होती है। पर अहिंसा का यह अर्थ कदापि नहीं लगाना चाहिए कि अगर कोई व्यक्ति आपकी हानि करने पर तुला हो या फिर शरीर तथा वाणी से आपके प्रति हिंसा कर रहा हो तो आप चुपचाप उस हिंसा को यह सोच कर सहन करते रहें कि आपको तो केवल अहिंसा का पालन करना है। हिंसक व्यक्ति से अपने और दूसरों को बचाना भी अहिंसा का समर्थन करना है। अहिंसा की रक्षा अगर हिंसा द्वारा होती हो, तो वह भी अहिंसा की श्रेणी में आती है। अक्सर सुना जाता है कि अहिंसा का अभ्यास करने वाले योगी, ऋषि-मुनियों के संपर्क में आने वाले व्यक्ति भी अहिंसक हो जाते हैं। यह मत नितांत भ्रामक है। अगर ऐसा होता तो अहिंसक कहलाने वाले महात्मा गांधी की हत्या हिंसक तरीके से नहीं होती। अहिंसक व्यक्ति की शांति का प्रभाव-क्षेत्र तो जरूर बनता है, पर ऐसा नहीं कि उसके आसपास की हिंसा समाप्त हो जाती है। यह सत्य है कि अहिंसक व्यक्ति का स्वभाव शांत तथा कोमल और दूसरों के प्रति अधिक संवेदनशील होता है।

अहिंसा के दो क्षेत्र हैं। एक व्यक्तिगत क्षेत्र, जिसे योग साधना की कसौटी पर रखा जा सकता है कि अहिंसा की सिद्धि में लगे हुए साधक को शरीर, मन और वाणी से अहिंसा का पालन करना अनिवार्य है, लेकिन अगर कोई अन्य प्राणी उस साधक की हिंसा करना चाहता हो, तो साधक को अपनी रक्षा प्रत्येक स्तर पर करनी चाहिए। अगर यह शरीर ही समाप्त हो जाएगा, तो अहिंसा की सिद्धि भी नहीं की जा सकती। दूसरी हिंसा की सिद्धि, समाज और राष्ट्र के स्तर पर सरकार को करनी चाहिए। जैसे अगर देश और समाज में पुलिस तथा सैन्य सुरक्षा न हो तो संपूर्ण समाज और राष्ट्र में अराजकता तथा असुरक्षित होने पर चारों ओर हिंसा फैल जाएगी। साधक और सामान्य व्यक्ति को अहिंसा का पालन करने के लिए कुछ योग के नियमों का पालन अपने जीवन में करना चाहिए, जिससे नियम का पालन करने वाले व्यक्ति, उसके परिवार तथा पड़ोस में भी अहिंसा का वातावरण बना रहे।

हमारा भारतीय समाज अहिंसक और सहिष्णु माना जाता रहा है, लेकिन आज भारतीय समाज अत्यधिक हिंसक और असहिष्णुता लिए है। इसका उदाहरण हमें चारों ओर देखने को मिलता है। जिन छोटी-छोटी बातों का जीवन में कोई स्थान नहीं, उन्हीं को लेकर हत्याएं हो जाती हैं। पार्किंग को लेकर झगड़े, सड़क पर चलते हुए वाहनों के थोड़ा-सा टकराने पर हिंसा, टोल टैक्स न देने के कारण हिंसा, भाई भाई, पड़ोसी पड़ोसी में हिंसा, वर्ग संघर्ष, पानी को लेकर दो प्रांतों में हिंसा, विधानसभाओं तथा संसद में हिंसा। कई बार तो इतनी छोटी-छोटी बातों पर बड़ी-बड़ी हिंसा हो जाती है कि भारतीय होने पर शर्म आती है। यह अहिंसक कहलाने वाला देश आज विश्व में हिंसा की श्रेणी में ऊंचे पायदान पर पहुंच रहा है। हम भारतीयों को जरूरत है थोड़ा धैर्य पूर्वक इस विषय पर चिंतन कर अपनी अहिंसा की जड़ों तक पहुंचने की। यह सत्य है कि जहां अहिंसा है वहां सुख, शांति, आनंद है। आज देश के नागरिकों को स्कूलों के स्तर पर योगिक अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाने की आवश्यकता है। भारत के युवाओं की उद्दंड, असहिष्णु, असंतोषी तथा हिंसक छवि को अहिंसा की शिक्षा शरीर, मन तथा वाणी के स्तर पर दी जानी चाहिए।

धर्म के नाम पर हिंदू, मुसलिम, सिख तथा ईसाई मत का उपदेश सुनने-सुनाने बंद होने चाहिए। केवल अहिंसा परमो धर्म: का उपदेश प्रत्येक नागरिक को विद्यालयों के स्तर से ही सिखाया जाना चाहिए। व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर हम सभी को अहिंसा का पालन करना अनिवार्य हो और इसके विपरीत राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र की रक्षा हिंसा के माध्यम से करना भी अहिंसा की स्थापना समझना चाहिए।

वितर्का हिंसादय: कृतकारितानुमोदिता
लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा
दु:खाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् (योग दर्शन )
योग दर्शन में यम नियम के विरोधी भाव वितर्क कहलाते हैं। हिंसा के तीन प्रकार हैं पहला कृत (स्वयं की हुई हिंसा), दूसरी कारित (किसी से करवाई गई हिंसा) और तीसरी अनुमोदित (किसी द्वारा की गई हिंसा को उचित मानना)। लोभ, क्रोध और मोह हिंसा के तीन कारण हैं। लोभ से कृत, लोभ से कारित तथा लोभ से अनुमोदित हिंसा। क्रोध से कृत, क्रोध से कारित तथा क्रोध से अनुमोदित। इसी प्रकार मोह से कृत, मोह से कारित तथा मोह से अनुमोदित ये नौ भेद हुए। कारणों के स्तर के भेद से हिंसा तीन प्रकार की होती है। अल्पलोभ से, मध्यस्थ लोभ से और अधिक लोभ से की हुई हिंसा और अल्प क्रोध, मध्य स्तर पर क्रोध तथा अधिक क्रोध इसी प्रकार अल्पमोह, मध्य स्तर मोह और अधिक मोह से की गई हिंसा। इस प्रकार से कारणों के भेद से कृत हिंसा के नौ भेद कारित तथा अनुमोदित हिंसा के नौ-नौ भेद होने से सताईस भेद होते हैं और अल्प, मध्य तथा अधिक भेद होने से हिंसा इक्यासी प्रकार की होती है। वास्तव में भ्रष्टाचार, बेईमानी, दूसरे का दिल दुखा कर तथा हिंसा से कमाए गए धन से जब व्यक्ति भोजन करता है, तो उसके संस्कार भी हिंसक होते चले जाते हैं।

योग और संस्कारों का विज्ञान अत्यंत सूक्ष्म है। व्यक्ति का शरीर, आचरण और संस्कार उसकी शिक्षा के साथ-साथ भोजन पर भी निर्भर करता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्।

तामसिक भोजन हिंसक स्वभाव को जन्म देता है, इसलिए भोजन शुद्ध, सात्विक हो तथा अहिंसक तरीके से कमाया गया हो, वही जीवन में सुख, शांति, आनंद का देने वाला होता है। सभ्य कहलाने वाला हमारा भारत देश आज अपने मूल संस्कारों से विमुख होने के कारण अपनी मूल विचारधारा को भूल कर अन्य क्षणिक लोभ से ग्रसित केवल भौतिक भोगवादी विचारों से घिर कर अपने जीवन के चिरस्थायी आनंद को खो बैठा है। आज आवश्यकता है अपने मानवतावादी संस्कारों को जागृत कर अहिंसा के समर्थन में राष्ट्रव्यापी आंदोलन जन सामान्य के साथ-साथ सरकार को भी चलाना चाहिए। जो भी कार्य राष्ट्र में आंतरिक हिंसा को जन्म देते हैं, जैसे मांसाहार, शराब, नशीले पदार्थों का सेवन भ्रष्टाचार आदि को बंद करने का दृढ़ संकल्प सरकार के माध्यम से जन-जन तक चलाया जाना चाहिए तथा तपस्वी महावीर भगवान बुद्ध और ऋषि-मुनियों के गौरव को पुन: स्थापित करना लक्ष्य होना चाहिए। योग साधक के साथ जनसाधारण को भी अहिंसा की सिद्धि के लिए अपनी जीवन शैली में योग की धाराओं को महत्त्वपूर्ण स्थान देना चाहिए।

समाज के प्रत्येक स्तर पर सहिष्णुता, उदारता, प्राणी मात्र के प्रति प्रेमभाव को स्थापित कर समस्त भारतीय समाज संपूर्ण विश्व के लिए आदर्श हो सके, यह हम सभी भारतीयों का दृढ़ संकल्प राष्ट्र को योगमय बनाने में सहायक सिद्ध हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अहिंसा तथा हिंसा के तरीके से राष्ट्र की रक्षा करते हुए राष्ट्र, समाज तथा व्यक्ति के स्तर पर देश को विकास के मार्ग पर चलना चाहिए तभी सही मायने में हम भारतीय योग के अहिंसक चिंतन को ठीक तरीके से स्थापित कर सकते हैं।

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