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कहानी: उड़ी पतंग

जनसत्ता नन्ही दुनिया कॉलम में पढ़ें रोचिका शर्मा की कहानी उड़ी पतंग

Author January 27, 2019 2:03 AM
प्रतीकात्मक फोटो

रोचिका शर्मा

समान में बादल छाए थे। सर्दी ने जोर पकड़ लिया था। आज पूरा एक हफ्ता बीत गया, सूरज ने दर्शन नहीं दिए। कल तो हल्की-हल्की बूंदा-बांदी भी हुई। रोहित का गला खराब हो गया थी। उसकी आवाज भारी हो गई थी। गले में कफ जमा रहने लगा था। वह भर्राए गले से बोला- ‘मां गले में दर्द है… कुछ निगलने में भी परेशानी हो रही है।’ ‘ओह! यह तो परेशानी हो गई… पर तुम फिक्र मत करो, मैं तुम्हें गरम सूप बना कर देती हूं। उसे पी लो और आराम से रजाई ओढ़ कर सो जाओ। थोड़ा आराम करने से शरीर में फिर से ताकत आ जाएगी। वरना तुम बाहर ही खेलते रहोगे, तो शरीर में और ज्यादा ठंड बैठ जाएगी। दोपहर में जब हल्की धूप होगी तब बाहर खेलना।’ मां ने समझाया।

रोहित ने झट से पूरी बांह का स्वेटर पहना और अपने दादाजी के पास रजाई में दुबक गया। तभी उसकी मां टमाटर का सूप लाई, दादाजी और रोहित ने खूब स्वाद लेकर पिया और फिर से रजाई में दुबक गए।
सूप पीकर शरीर में गरमी आ गई। उसकी मां ने उसमें काली मिर्च का पाउडर भी डाला था, जिससे गला थोड़ा खुल गया। आवाज का भारीपन भी कम हो गया। दोपहर में जब थोड़े बादल छंटे, रोहित ने अपना बैट लिया और दादाजी से जिद करने लगा- ‘दादाजी, आप बॉलिंग कीजिए न, हम दोनों खेलेंगे।’

दादाजी ने भी सोचा, थोड़ी धूप ही सेक लें और साथ में रोहित के साथ खेलना भी हो जाएगा। फिर क्या, दोनों की जोड़ी ने पार्क में खूब रंग जमाया, खूब खेले। बातचीत करने से रोहित का गला भी ठीक होने लगा था। करीब चार बजे फिर से बादल छाने लगे। ‘रोहित अब हमें घर चलना चाहिए, तुम्हारी मां हमारी राह देख रही होगी। वैसे भी अब ठंड बढ़ेगी फिर से तुम्हारी आवाज भारी न हो जाए।’ दादाजी ने कहा।
‘जी दादाजी, आपने ठीक कहा।’ रोहित ने अपना बैट-बॉल लिया और दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर घर पहुंच गए।

‘अरे! आप लोग आ गए? मैं जल्दी से चाय बनाती हूं।’ रोहित की मां ने कहा।
तभी दादाजी ने पुकारा- ‘रोहित की मां, रोहित के लिए काढ़ा भी बना दो… जरा अदरक और लौंग डाल कर। इसके गले के लिए अच्छा रहेगा।’ रोहित की मां उसके लिए काढ़ा बना लाई। रोहित ने गरमा-गरम काढ़ा पिया तो उसके गले की खूब सिंकाई हो गई। इसी तरह दो दिन में सूप और काढ़ा पीकर रोहित ने अपना गला ठीक कर लिया। उसकी आवाज अब सामान्य हो गई। मगर सूरज तो जैसे छुट्टी पर चला गया था।

आज जब रोहित स्कूल गया तो दादाजी बाहर गए। दुकानों पर गजक, तिल पट्टी और रेवड़िया देखीं तो वे गजक और रेवड़ियां खरीद लाए। जब रोहित घर आया तो दादाजी बोले- ‘चलो रोहित पार्क में चलते हैं। आज तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है।’ ‘वो क्या दादाजी!’ रोहित उछल कर बोला। ‘है कुछ स्पेशल… बस तुम जल्दी से अपना हल्दी वाला दूध पीकर आओ।’

मां ने उसे दूध का गिलास थमाया, तो रोहित उसे गटागट पी गया। झट से कपड़े बदले और दादाजी के पास पहुंच गया। पार्क में जाकर दादाजी ने मांझा निकाला, पतंग की कन्नी बांधी और बोले- ‘रोहित अब देखो, इस कागज की पतंग का कमाल।’ थोड़ी ही देर में दादाजी की पतंग आसमान में हवा से बातें करने लगी थी। दादाजी कभी ढील देते, तो कभी डोर को खींच लेते। ढील और खिंचाव से पतंग आसमान में तरह-तरह के करतब दिखा रही थी। कभी गोते खाती, तो कभी दूर तक उड़ जाती, जैसे कभी लौट कर नीचे आएगी ही नहीं। ‘अरे, यह सरप्राइज है! सच में खूब जोरदार सरप्राइज है दादाजी।’ रोहित खुश होकर बोला।
‘दादाजी अब आप गिरगड़ी संभालिए और मुझे पतंग उड़ाने दीजिए।’ जैसे ही दादाजी ने उसे डोर हाथ में थमाई, पतंग थोड़ी लड़खड़ाई। तभी दादाजी ने कहा- ‘रोहित डोर को थोड़ा अपनी ओर खींचो तो पतंग ऊपर जाएगी वरना यह नीचे आ गिरेगी।’

रोहित को हाथ में पतंग थोड़ी भारी महसूस हो रही थी। उसने बार-बार डोर को अपनी ओर खींचा। पतंग ऊपर गई। दादाजी बोले, ‘अब धीरे-धीरे ढील दो।’ उसने ढील दी और वह देखो, पतंग और ऊपर गई।
आसमान में सैकड़ों रंग-बिरंगी पतंगें उड़ रही थीं। रोहित को लगा, उसकी पतंग कट न जाए। दादाजी बोले- ‘घबराओ मत रोहित। चलो, तुम्हें पेच लड़ाना सिखाता हूं।’
उन्होंने डोर संभाली। गिरगड़ी फिर से रोहित ने संभाली और वह देखो, दादाजी की पतंग सबसे आगे। आसपास उड़ने वाली पतंगों में से एक पतंग के करीब दादाजी की पतंग गई और उन्होंने अपनी पतंग की डोर उस पतंग की डोर से उलझा दी। थोड़ी देर पेच लड़े रहे, फिर दादाजी ने अपनी डोर को एक तेज झटका दिया और दूसरी पतंग कट कर हिलती-डुलती जमीन की तरफ आने लगी। पार्क में उपस्थित दूसरे बच्चे उसे पकड़ने के लिए दौड़-भाग करने लगे और रोहित उछल-उछल कर तालियां बजा कर ‘वो काटा- वो काटा’ की तर्ज पर नाचने लगा था।
शाम ढलते ही दादाजी और रोहित खुशी-खुशी घर लौट आए और खूब मजे से चिक्की, गज्जक व रेवड़ियां खार्इं।

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