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नन्ही दुनिया: कविता और शब्द-भेद

पढ़ें शीला पांडे की कविता सोने-सा देश

Author January 27, 2019 2:15 AM
प्रतीकात्मक फोटो

शीला पांडे

सोने-सा देश
चम-चम सोने-सा यह देश
सबका अलग-अलग है वेश
सीना खड़ा हिमालय ताने
देश, विदेश सभी पहचाने।

वन-औषधि की धरती जननी
संस्कृति भाषा है मन पहनी
विविध भांति की बोली-बानी
संस्कृतियों की चूनर धानी।

सीमा पर प्रहरी ललकारें
पूजा-घर गूंजें जयकारें
सूरज चंदा किरनें उतरें
ऋतुएं विहंसें अन्न-अन्न उभरें।

सिंधु यहां गरजे गुर्राए
सुन कर दुश्मन भी थर्राए
गगन, पवन, बादल मिल बरसें
हरियाली तन-मन से हरषें।

सब मिल कर गहना बनते हैं
मां के तन-मन पर सजते हैं
मां गिरि नदियों संग बल खाती
वेद, पुराण सहित इठलाती।

शब्द-भेद
कुछ शब्द एक जैसे लगते हैं। इस तरह उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ जानते हुए उनका अंतर समझते हैं।

सदा / सादा/ साद/ सधा/ साध/ साधा

हमेशा शब्द का पर्याय है सदा। जैसे सदा सत्य बोलो। इसके अलावा उर्दू में सदा शब्द आवाज लगाने, पुकारने के लिए प्रयोग होता है। जबकि सादा का अर्थ है उजला, सफेद, सामान्य। इसी तरह साद अरबी का शब्द है, जिसका अर्थ होता है पवित्र, निश्छल। जबकि सधा का अर्थ होता है, बिल्कुल संयमित, नपा-तुला, सटीक और साध का अर्थ है उत्कंठा, लालसा, इच्छा। जैसे, उसकी साध थी कि वह प्रयागराज जाए। इसी तरह साधा क्रियापद है। साधने का भूतकाल यानी जो साधा जा चुका है। साधना यानी लक्ष्य वेधना, लक्ष्य प्राप्त करना। जैसे अर्जुन ने मछली की आंख पर निशाना साधा।

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