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नन्ही दुनिया: तुम मत आना

तवार को छोड़ कर हर दोपहर में प्रेमा के घर में चार काम एक साथ चलते हैं। वह बच्चों को पढ़ाती है, रसोई में मंदिरा बर्तन साफ करती है, मंदिरा की बेटी रश्मि दरवाजे की ओट से बच्चों को देखती रहती है, और प्रेमा के ससुर जगदीश जी अंदर वाले कमरे में आराम करते हैं। जितनी देर बच्चों की पढ़ाई चलती है, रश्मि का दरवाजे की ओट से झांकना भी जारी रहता है।

Author February 10, 2019 4:40 AM
प्रतीकात्मक फोटो

देवेंद्र कुमार

तवार को छोड़ कर हर दोपहर में प्रेमा के घर में चार काम एक साथ चलते हैं। वह बच्चों को पढ़ाती है, रसोई में मंदिरा बर्तन साफ करती है, मंदिरा की बेटी रश्मि दरवाजे की ओट से बच्चों को देखती रहती है, और प्रेमा के ससुर जगदीश जी अंदर वाले कमरे में आराम करते हैं। जितनी देर बच्चों की पढ़ाई चलती है, रश्मि का दरवाजे की ओट से झांकना भी जारी रहता है। बच्चों ने रश्मि के इस तरह लगातार देखते रहने पर प्रेमा से उसकी शिकायत कई बार की है। इस पर प्रेमा ने मंदिरा से कहा- ‘उसके इस तरह लगातार देखते रहने से बच्चों का ध्यान भंग होता है। इससे ज्यादा अच्छा तो यह होगा कि वह रसोई में तुम्हारी मदद करे।’ सुन कर मंदिरा को बुरा लगा, लेकिन सिर्फ इतना कहा- ‘मैडमजी, उसे शायद बच्चों को पढ़ते देखना बहुत अच्छा लगता है इसीलिए…’

एक और बात है, जो विचित्र लगती है- दोपहर में सब काम निपटा कर घर लौटते वक्त रश्मि का एक दुकान के सामने ठहर जाना। दुकान कबाड़ी की है। कबाड़ के बीच पुरानी किताबें और रद्दी अखबार रखे होते हैं। वह एक तरफ रखी पुरानी किताबें उलटने-पलटने लगती है। कबाड़ी का नाम शेख है। वह पूछता है- ‘क्या लेना है बेटी।’ इस प्रश्न का उत्तर रश्मि कभी नहीं देती। पर मां के पूछने पर कह देती है- ‘मैं किताब पढूंगी।’ एक दिन शेख ने पुरानी किताबों के ढेर में से खोज कर रश्मि को ‘अ आ’ की एक पुरानी किताब और स्लेट थमा दी। उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा- ‘खूब पढ़ना बेटी।’ यह मनचाहा उपहार पाकर रश्मि बहुत खुश हुई।

अगले दिन मंदिरा ने रश्मि को समझाया कि उसे दरवाजे की ओट से पढ़ते हुए बच्चों को नहीं ताकना है। बोली- ‘शेख बाबा ने तुझे किताब और स्लेट दी हैं। अब मन लगा कर पढ़ना-लिखना है।’ रश्मि कुछ देर तक रसोई के फर्श पर बैठी स्लेट पर चाक से लकीरें खींचती रही, पर मन नहीं लग रहा था। तभी प्रेमा का एक शिष्य रसोई में पानी लेने आ गया। उसने जाकर दूसरे बच्चों को बता दिया कि रश्मि रसोई में बैठी पढ़ रही है- सुन कर सारे बच्चे हंसने लगे। प्रेमा ने भी सुना।
कुछ देर बाद वह अपने ससुर जी के लिए चाय बनाने रसोई में गई तो मां-बेटी हड़बड़ा गर्इं। चाय बनाते हुए वह रश्मि की ओर देखती रही। कहा- ‘पढ़ना अच्छा है, पर यहां क्यों? चल कर बच्चों के साथ बैठो। मैंने दरवाजे की ओट से झांकने को मना किया था। लड़कियों का पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता है।’

खुश होकर रश्मि प्रेमा जी के पीछे-पीछे कमरे में जा पहुंची। उसे देख कर प्रेमा जी के शिष्य हैरानी से देखते रह गए। प्रेमा ने रश्मि की स्लेट पर ‘अ आ’ लिख कर कहा- ‘मैंने जो लिखा है, उसे देख कर नीचे लिखो। जब स्लेट भर जाए तब अपना लिखा मिटा कर दुबारा लिखो, इसी तरह करती रहो।’
अगले दिन प्रेमा चाय बनाने के लिए उठने लगी तो रश्मि ने कहा- ‘मैडम जी, आप कहें तो बाबा के लिए मैं चाय बना कर ले जाऊं। मैं शाम को रोज मां और बापू के लिए बनाती हूं।’ प्रेमा ने मुस्करा कर रश्मि की ओर देखा, फिर कहा- ‘ठीक है।’

अगले दिन भी रश्मि ने ही जगदीश बाबू के लिए चाय बनाई। जब वह खाली प्याला रखने जा रही थी, तो एक बच्चे ने कहा- ‘मेरे लिए पानी ले आना।’ रश्मि उसके लिए पानी ले आई और जूठा गिलास भी रखने चली गई। तभी दूसरे बच्चे ने उससे पानी लाने को कहा। रश्मि दौड़ कर पानी लाने चली गई। यह सिलसिला कई दिन तक दोहराया गया। प्रेमा सब देख रही थी। उसने कहा- ‘रश्मि, इसी तरह दौड़-भाग करती रहोगी तो पढ़ोगी कब?’

रश्मि चुप खड़ी रह गई। उसकी समझ में नहीं आया कि क्या कहे। उसी शाम जब मंदिरा काम करके जाने लगी, तो प्रेमा ने रसोई में जाकर कहा- ‘कल से रश्मि को साथ लेकर मत आना।’ मंदिरा अपलक ताकती रह गई, कुछ कह नहीं सकी। उसे मानना ही था। पर एक बड़ी समस्या यह थी कि यह बात रश्मि को कैसे बताई जाए। वह अच्छी तरह समझती थी कि प्रेमा की बात रश्मि के मन पर कितना बुरा असर डालेगी। पर बताना तो था ही।

अगली सुबह काम पर जाते समय भी नहीं बताया। पर प्रेमा के पड़ोसी घर में काम करते हुए मां ने बेटी से कह ही दिया- ‘आज यहीं बैठ कर पढ़ लो। प्रेमा मैडम के घर से लौटते हुए मैं तुझे साथ ले लूंगी। उन्होंने पढ़ाने से मना कर दिया है।’
‘लेकिन क्यों?’ उसने कहा और रो पड़ी। मंदिरा ने बेटी को आलिंगन में भर लिया। बोली- ‘रो मत मुनिया। मैं तुझे बहुत अच्छे स्कूल में पढ़ने भेजूंगी।’ मंदिरा ने उस घर की मालकिन से रश्मि के बारे में बात कर ली। उन्होंने हामी भर दी। फिर मंदिरा प्रेमा के घर काम करने चली गई। उसके मन में भी प्रेमा के प्रति बहुत गुस्सा था। उसने प्रेमा से कोई बात नहीं की, जल्दी से काम निपटा कर झट बाहर निकल गई। प्रेमा के मन में भी रश्मि वाली बात घूम रही थी।

अगले दो दिन मंदिरा काम करने नहीं आई। तीसरे दिन आई तो प्रेमा ने पूछा। मंदिरा ने कहा- ‘रश्मि को बुखार आया है। परसों तो बहुत तेज था। आज बुखार तो नहीं है, लेकिन कुछ खा नहीं रही है, बस रोए जा रही है। कहती है- ‘मैडम ने मुझे अपने स्कूल से क्यों निकाल दिया!’
‘प्रेमा चुप सुनती रहीं। फिर कहा- ‘मैंने उसे निकाला नहीं है, किसी कारण से उसको आने से मना किया है।’
मंदिरा की हिम्मत कुछ पूछने की नहीं हुई। काम करने के बाद बाहर की तरफ चली तो प्रेमा ने रोक कर पूछा- ‘कहीं और काम करना है या घर जा रही हो?’
‘जी सीधे घर ही जा रही हूं।’
‘मैं भी चल रही हूं रश्मि को देखने।’
‘जी वह अब पहले से ठीक है, आप क्यों तकलीफ कर रही हैं।’
‘कैसी तकलीफ, ले चलो मुझे अपने घर।’
मंदिरा आगे कुछ नहीं कह सकती थी। उसका एक कमरे वाला घर पास की बस्ती में ही था। वह प्रेमा को ले गई। रश्मि एक पलंगड़ी पर लेटी थी। प्रेमा को देखते ही उठ बैठी। प्रेमा ने उसकी कलाई पकड़ कर लिटा दिया। माथे पर हाथ रख कर बोली- ‘मुझसे नाराज हो रश्मि?’ इतना सुनते ही रश्मि की आंखों से आंसू बह चले। होंठ कांपने लगे।
प्रेमा ने मंदिरा से कहा- ‘मैंने कुछ सोच कर ही इसे आने से मना क्या था। इसने मेरे ससुरजी को पानी दिया, उनके लिए चाय बनाई तो मुझसे पूछ कर, फिर मैंने देखा कि बच्चे भी इससे पानी मंगवाने लगे। पहले वे खुद रसोई से पानी लाते थे, अपने जूठे गिलास भी रखने जाते थे। उन्होंने सोचा होगा कि यह तुम्हारी बेटी है तो इससे कोई भी काम करवाया जा सकता है। वे इसे अपने जैसी पढ़ने वाली लड़की नहीं समझ रहे थे। मैं उनके इस सोच को भला कैसे सहन कर सकती थी। इसीलिए मैंने रश्मि को मना किया था।’
‘तब यह कैसे पढ़ेगी!’ मंदिरा ने कहा।

प्रेमा ने हंस कर कहा- ‘मैं पढ़ाऊंगी रश्मि को, लेकिन सबसे अलग। सुबह काम पर जाते समय तुम इसे मेरे पास छोड़ सकती हो। तब मुझे कोई काम नहीं होता।’ प्रेमा की बात सुन कर रश्मि का चेहरा चमक उठा। उसकी पनीली आंखों में कुछ सपने तैर रहे थे, जिन्हें वह रोज देखा करती थी। क्या उसका सपना सच हो सकता था!

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