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रविवारी मुद्दा: कुदरत का संग-साथ

कुदरत के साथ अतार्किक छेड़छाड़ के चलते पर्यावरण पर प्रतिकूल असर सबकी नजर में है। इसे लेकर दुनिया भर में चिंता जताई जा रही है। हालांकि हम पहले के लोगों की तुलना में अधिक शिक्षित, अधिक जागरूक और अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुए हैं। स्वास्थ्य और भविष्य की चुनौतियों के प्रति सतर्क हुए हैं।

Author November 25, 2018 3:25 AM

पूनम नेगी

कुदरत के साथ अतार्किक छेड़छाड़ के चलते पर्यावरण पर प्रतिकूल असर सबकी नजर में है। इसे लेकर दुनिया भर में चिंता जताई जा रही है। हालांकि हम पहले के लोगों की तुलना में अधिक शिक्षित, अधिक जागरूक और अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुए हैं। स्वास्थ्य और भविष्य की चुनौतियों के प्रति सतर्क हुए हैं। फिर भी उस तरह प्रकृति से लगाव नहीं महसूस करते, जैसे पुराने समय में लोग रखते थे। जब तक हम प्रकृति को अपने जीवन का हिस्सा नहीं मानेंगे, उससे लगाव और सघन संपर्क नहीं रखेंगे, तब तक सही अर्थों में पर्यावरण की रक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। आज भी प्रकृति के साथ लगाव रखने वाले समुदाय हमारे बीच हैं, अगर उन्हीं से प्रेरणा और सीख लें, तो पर्यावरण संबंधी समस्याओं को काफी हद तक काबू में किया जा सकता है। बहुत सारे गांवों में आज भी पेड़ों, वनस्पतियों के प्रति अनेक तरह की मान्यताएं चलन में हैं, जिसकी वजह से उनका अतार्किक दोहन नहीं हो पाता। आधुनिक सुविधाओं और शिक्षा के प्रचार-प्रसार के अभाव के चलते भले आदिवासी समाज को पिछड़ा माना जाता हो, पर सृष्टि के पंचतत्त्वों की जैसी समझ और अरण्य संस्कृति के प्रति जो संवेदना उनमें दिखती है, वह अन्यत्र कहीं नहीं। उनके जीवन, संस्कृति, परंपराओं, पर्वों और त्योहारों में पर्यावरण संरक्षण के ऐसे अनूठे तत्त्व समाहित हैं, जो प्रदूषण की मार से बचने और छीजती कुदरत को नई संजीवनी देने की ताकत रखते हैं।

विकास की मुख्यधारा से न जुड़ पाने के बावजूद आदिवासी परंपराओं में सामूहिक जीवन, सामूहिक उत्तरदायित्व और भावनात्मक संबंध बने हुए हैं। ये लोग सहज, सरल, प्राकृतिक जीवन जीते हैं और यही प्राकृतिक जीवन पर्यावरण संरक्षण के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक हैं। ये लोग वृक्षों को ‘देवता’ मानते हैं। पीपल, बरगद, नीम, आम, शमी, पलाश, कदंब आदि वृक्षों की पूजा करते हैं, इन्हें काटना पाप मानते हैं। इन परंपराओं का चलन मानव जीवन के विकास के लिए हुआ है। न सिर्फ तार्किक, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी वनवासियों की इन परंपराओं की उपयोगिता सिद्ध होती है। बरगद, पीपल और तुलसी आदि चौबीस घंटे आॅक्सीजन प्रदान कर पर्यावरण को शुद्ध रखते हैं। तुलसी, गिलोय, नीम, गूलर आदि न जाने कितने औषधीय पौधे हमारे लिए स्वास्थ्य का वरदान हैं। जरा सोचिए कि अगर वृक्ष वनस्पतियों के संरक्षण की इन परंपराओं को संजोया न गया होता तो क्या हम इनके गुणों से लाभान्वित हो पाते!

हमारे यहां आयुर्वेद का बड़ा महत्त्व रहा है, पर अंग्रेजी तरीके के उपचार पर भरोसा बढ़ते जाने से लोग आयुर्वेद की तरफ से विमुख होने लगे थे। अब फिर से आयुर्वेद का महत्त्व समझ में आने लगा है। सरकारें भी इसे बढ़ावा दे रही हैं। आयुर्वेदिक औषधि के क्षेत्र में काम करने वालों को पुरस्कृत-सम्मानित किया जाने लगा है। आप देखें, तो यह परंपरा प्राचीन काल से अब तक बनी हुई है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के बैगा आदिवासी देश भर में जड़ी-बूटी और वनौषधियों के सबसे अच्छे जानकार माने जाते हैं। उनका जंगल से जड़ी-बूटी निकालने के तौर तरीकों को जानने के बाद यह अहसास होता है कि जंगल के प्रति उनके मन में कितना आदर है। ये जचकी (प्रसव) के दौरान कल्ले की छाल का उपयोग करते हैं। छाल निकालने के पहले वे वृक्ष को न्योतते हैं, फिर विधि-विधान से उसकी पूजा और प्रार्थना करते हैं। उसके बाद एक बार में कुल्हाड़ी के वार से जितनी छाल निकलती है, उतनी ही दवा के रूप में उपयोग करते हैं। वे मानते हैं कि अगर बिना किसी नियम के छाल निकालने की छूट मिल जाए, तो लोग मनमाने ढंग से छाल निकालने लगेंगे और इससे वन संपदा का नुकसान होगा। इसी तरह पेट-दर्द, उल्टी-दस्त और आंव जैसे रोगों में महुआ और पंडरजोरी की छाल से बने काढ़े का इस्तेमाल करते हैं। सिरदर्द (अधकपारी) होने पर तिनसा के झाड़ की छाल का उपयोग किया जाता है।

बैगा आदिवासी अलग-अलग बीमारियों में अलग-अलग छाल या जड़, फूल फल और पत्तों का इस्तेमाल करते हैं, पर प्रत्येक के इस्तेमाल का तरीका, नियम और विधि अलग-अलग होते हैं। यह जरूर है कि किसी वृक्ष वनस्पति के इस्तेमाल से पूर्व ये आदिवासी उन्हें दाल, चावल का न्योता देना, धूप से पूजा और प्रार्थना करना नहीं भूलते। गौरतलब है कि धूप से पूजा करने के उनकी धारणा यह है कि सूर्यदेव की कृपा से वृक्ष में दवा वाले औषधीय गुण सक्रिय हो जाते हैं। भले आदिवासी जनजीवन की इन परंपराओं को आधुनिक समय के सुशिक्षित लोग उनका अंधविश्वास मानें तथा इससे वृक्ष वनस्पतियों के औषधीय गुण प्रभावित होने के तर्क को अस्वीकृत कर दें, पर इनके पीछे निहित वनवासियों की पेड़-पौधों के प्रति आत्मीय संवेदना को नकार नहीं सकते।

सच बात है कि जो चीज आसानी से मिल जाती है, उसका जरूरत से ज्यादा दोहन होने लगता है और अंतत: उस वस्तु पर विलुप्त होने का खतरा मंडराने लगता है। हम सुशिक्षित और तथाकथित सभ्य लोग आज यही तो कर रहे हैं। जंगल से अपनी जरूरतों के लिए कड़े नियम-कायदे बनाना ही उसके संरक्षण का सिद्धांत है। ऐसा न होने पर आसानी से पूरा पेड़ काट कर छाल निकाली जा सकती है, लेकिन इससे बेशकीमती वनौषधियों का जल्द ही नाश हो जाता, पर धरती से जुड़े इन संवेदनशील लोगों का मानना है कि जंगल भोजन और दवा देकर हमारी सुरक्षा करता है, तो हमारा भी फर्ज है कि हम इस जीवनदायी वनसंपदा को सुरक्षित रखें। वनवासियों की यही भावना जंगलों के संरक्षण का मुख्य आधार है। इसी प्रकार वनों और बहुत सारे गांवों में रहने वालों के मन में वन्य प्राणियों के प्रति भी श्रद्धा होती है।

आधुनिक समाज की सोच ने आज जीवन को लाभ की वस्तु बना दिया है, लेकिन वनांचलों और बहुत सारे ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए जंगल सिर्फ उनकी आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समग्र जीवनशैली है। उनका अस्तित्व ही नहीं, बल्कि सभ्यता और संस्कृति वनों पर टिकी है। वन संरक्षण में इनका दृष्टिकोण व्यापक और महत्त्वपूर्ण है। अगर हम वन संरक्षण की दिशा में इन परंपराओं का पालन करें, तो अधिक सफल हो सकेंगे। अपने नियम-कायदों से वे पुरखों के जमाने से जंगल बचाते आ रहे हैं। आदिवासी अपनी जरूरत के अनुसार जंगल से जितना लेते हैं, बदले में उसे उतना लौटाने का प्रयत्न भी करते हैं। जंगल का उपयोग करने में आदिवासियों के तरीके और नियम को ध्यान से देखें तो महसूस होगा कि वन संरक्षण में उनकी सोच कितनी टिकाऊ और महत्त्वपूर्ण है। अगर आने वाली पीढ़ियों के लिए हमें जंगल की विरासत बचाए रखनी है, तो इसे लाभ के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए बचाने की सोच विकसित करनी होगी। जंगल का सम्मान करना सीखना होगा और अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। आज वन आधारित जीवनशैली, कार्यशैली और सदियों पुराने परंपरागत ज्ञान-विज्ञान को सहेजने-संरक्षित करने की जरूरत है, ताकि पर्यावरण, वन्यप्राणी और जैव विविधता का संरक्षण कर प्रकृति को प्रसन्न और संतुष्ट रखा जा सके।

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