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किताबें मिलीं: मीडिया में दलित

आलेख में दलितों की मीडिया में तुच्छ हिस्सेदारी को लेकर 2006 में हुए राष्ट्रीय मीडिया के सर्वे का हवाला भी दिया गया है। लंबे अंतराल के बाद भी इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है।

Author नई दिल्ली | September 15, 2019 4:20 AM
लंबे अंतराल के बाद भी इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है।

प्रस्तुत पुस्तक में मीडिया में दलित हिस्सेदारी और दलित सरोकारों की अनदेखी सहित कई मुद्दों को उठाया गया है। न्यूज रूम में हिस्सेदारी की हकीकत बयान करती इस पुस्तक में पच्चीस आलेख हैं, जो दलित मीडिया को लेकर विमर्श करते मिलते हैं। पुस्तक की शुरुआत आलेख ‘मीडिया में दलित ढूंढ़ते रह जाओगे’ से किया गया है, जो मीडिया में दलितों की हिस्सेदारी को लेकर सवाल खड़ा करता है। आलेख में बताया गया है कि कैसे मीडिया घरानों में ऊंचे पदों पर सवर्ण ही आसीन हैं और जहां किसी दलित का पहुंच पाना ही असंभव होता है। आलेख में दलितों की मीडिया में तुच्छ हिस्सेदारी को लेकर 2006 में हुए राष्ट्रीय मीडिया के सर्वे का हवाला भी दिया गया है। लंबे अंतराल के बाद भी इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है।

अन्य आलेख- दलित उत्पीड़न कब तक, दीन दलित का संघर्ष, मीडिया का नजरिया ढुलमुल, कहर दलितों पर और मीडिया की खामोशी, मीडिया में डॉ. आम्बेडकर, कब दूर होगी दलित की शिकायत- दलित आवाज को बुलंद करते हैं। दलितों के मसीहा बाबा साहेब डॉ. भीम राव आम्बेडकर को समर्पित यह पुस्तक लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका और दलितों के प्रति उपेक्षा को जबर्दस्त तरीके से सामने लाती है।
मीडिया में दलित : संजय कुमार; रश्मि प्रकाशन, 204, सनशाइन अपार्टमेंट, बी-3, बी-4, कृष्णा नगर, लखनऊ; 200 रुपए।

आलोचना की नई दृष्टि की तलाश

आलोचना के कब्रिस्तान’ से (चतुर्दिक-4) के बाद ‘आलोचना की नई दृष्टि की तलाश’ (चतुर्दिक-5) के इन सभी लेखों को कोई भी आलोचना के एक वृत्त की पूर्ण गति के अंदर से एक नए वृत्त के स्फुरण की तरह देख सकता है। मानव शरीर के अध्येताओं ने बताया है कि कैसे यह निरंतर अपने अस्तित्व की रक्षा करते हुए विकसित होता गया है। अर्थात अपने अस्तित्व को बाधित करने वाले तत्त्वों को क्रमश: त्यागता हुआ आगे बढ़ता है। इसी प्रकार, किसी भी प्राणीसत्ता के साथ बाह्य यथार्थ के संयोग का पहलू भी है जो उसकी अतिन्द्रिय अनैतिहासिक सत्ता को ऐंद्रिक ऐतिहासिक रूप देता है। आलोचना के ढांचे पर भी यही बात लागू होती है।

‘आलोचना के कब्रिस्तान’ से ‘आलोचना की नई दृष्टि की तलाश’ समाजवादोत्तर काल के एक नए वैश्विक यथार्थ के संयोग-स्थल पर आलोचना के समुच्चय की प्रच्छन्नताओं को एक नई ऐंद्रिक ऐतिहासिकता में प्रत्यावर्ति्तत होते हुए देखने की कोशिश की तरह है। यह आलोचना के निरपेक्ष सत्य को नई सापेक्षता में टटोलने की कोशिश है। इसे ही वस्तुनिष्ठ द्वंद्वात्मकता भी कहते हैं। इसमें सापेक्ष और निरपेक्ष के बीच का फर्क भी सापेक्ष होता है। परंपरावादी आत्मनिष्ठ आलोचना में सापेक्ष सिर्फ सापेक्ष होता है, उसमें निरपेक्ष के लिए कोई जगह नहीं होती; और इसीलिए एक स्तर पर जाकर वह कोरे कुतर्क का रूप ले लेता है।

इस संकलन में अरुण माहेश्वरी के लेखों में नए यथार्थ के संयोग से हिंदी आलोचना की अपनी ‘प्राणी सत्ता’ की प्रच्छन्नताओं का जो नया ऐतिहासिक ठोस रूप आकार लेता हुआ दिखाई देता है, वह हिंदी के किसी भी सुधी पाठक के लिए न सिर्फ एक विस्मय का, बल्कि उपलब्धि का विषय होगा।
आलोचना की नई दृष्टि की तलाश : अरुण माहेश्वरी; अनामिका पब्लिशर्स, 4697/3, 21-ए, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 400 रुपए।

अकथ
मल चोपड़ा उन मुट्ठी भर लघुकथाकारों में हैं, जिन्हें जीवन और सृजन कला की पूरी इत्तिला है। उन्हें इत्तिला ही नहीं बल्कि उनका लघुकथा सृजन प्रकल्प इन बातों से गहरे मुब्तिला है। उनके सृजन-यत्न में लघुकथा की सैद्धांतिकी और उसके अनुपालन का एक अल्पलभ्य सामंजस्य दिखाई देता है। इस संग्रह की लघुकथाओं में दंगे की दहशत में अकुलाते भयाक्रांत मन के अनेक उपाख्यान हैं, दूसरे भूमंडलीकरण की चरम विसंगतियों से उपजे भयानक क्षतिग्रस्त पारिवारिक रिश्तों के मर्मांतक वृत्तांत भी हैं तो तीसरे, भारतीय समाज के प्रांतिक मनुष्यों (मर्जिनल पीपल, जैसे दिहाड़ी के मजदूर, रिक्शेवाले, कामवाली बाई आदि) के संघर्षपूर्ण दैनंदिन जीवन के उपोद्घात से उभरे यथार्थमूलक इतिवृत्त भी कम नहीं हैं।

कमल के चरित्रांकन की दक्षता अलग से रेखांकित किए जाने योग्य है। लघुकथाओं के इस सृजन-कल्प से अनेक असहमतियां भी हो सकती हैं- जैसे कि एक कथा स्थिति से दूसरी कथा स्थितियों में जाने के बरास्ते कई बार उबड़-खाबड़ दिखाई देते हैं, कई बार चरित्रों के विशेषण और क्रियाविशेषण के अचूक-चुनाव से वे चुक जाते हैं- बावजूद इसके बयान की ईमानदारी, बखान की पारदर्शिता और जिम्मेदार सृजनधर्मिता की दृष्टि से ये लघुकथाएं गौरतलब हैं और महत्त्वपूर्ण भी। ‘बताया गया रास्ता’, ‘वैल्यू’ या ‘इतनी दूर’ जैसी लघुकथाएं इस अंक की ही नहीं, बल्कि हिंदी लघुकथाओं की उच्चतर उपलब्धि हैं।
अकथ : कमल चोपड़ा; अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नई दिल्ली; 350 रुपए।

कैसे करें ध्यान?
आज की चुनौतीपूर्ण और व्यस्त दुनिया में क्या आपकी यह इच्छा नहीं होती कि अपने मस्तिष्क को कैसे शांत करें और स्वयं पर कैसे ध्यान केंद्रित करें? क्या आपकी यह इच्छी नहीं होती कि आप कोई ऐसा काम करें जो आपकी राह से बाधाओं को दूर कर दे?

‘कैसे करें ध्यान?’ में विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु श्री एम ध्यान के ढेर सारे फायदों ओर जीवन को परिवर्तित करने वाली क्रियाओं के बारे में आपके सारे प्रश्नों के उत्तर देते हैं। अपने निजी अनुभवों और दुनिया कीविविध ध्यान पद्धतियों और पुस्तकों में दर्ज ज्ञान के आधार पर श्री एम ध्यान की जटिल प्रक्रियाओं को सरल और सामान्य तरीके से प्रस्तुत करते हैं जिसे कोई भी, नौजवान या बुजुर्ग, अपने दैनिक जीवन में प्रयोग में ला सकते हैं।
कैसे करें ध्यान : श्री एम; पेंगुइन बुक्स, सातवीं मंजिल, इनफिनिटी टावर सी, डीएलएफ साइबर सिटी, गुड़गांव; 199 रुपए।

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