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किताबें मिलीं: गांधी और समाज

उनकी हत्या करने वाली ताकतों के वर्चस्व के बाद भी वे होंगे। वे कोई पूरी लिखी जा चुकी धर्म-पुस्तिका नहीं हैं, वे जीने की एक पद्धति हैं जिसका अन्वेषण हमेशा जारी रखे जाने की मांग करता है।

Author Updated: November 3, 2019 5:33 AM

गांधी के जीवन और विरोधाभासों को देखें तो कहा जा सकता है कि उनका व्यक्तित्व और दर्शन एक सतत बनती हुई इकाई था। एक निर्माणाधीन इमारत, जिसमें हर क्षण काम चलता था। उनका जीवन भी प्रयोगशाला था, मन भी। एक अवधारणा के रूप में गांधी उसी तरह एक सूत्र के रूप में हमें मिलते हैं जिस तरह मार्क्स; यह हमारे ऊपर है कि हम अपने वर्तमान और भविष्य को उस सूत्र में कैसे समझें। बीच-बीच में अप्रासंगिक सिद्ध करने और जाने कितनी ऐतिहासिक गलतियों का जिम्मेदार ठहराए जाने के बावजूद गांधी बचे रहते हैं; और रहेंगे। उनकी हत्या करने वाली ताकतों के वर्चस्व के बाद भी वे होंगे। वे कोई पूरी लिखी जा चुकी धर्म-पुस्तिका नहीं हैं, वे जीने की एक पद्धति हैं जिसका अन्वेषण हमेशा जारी रखे जाने की मांग करता है।

‘पहला गिरमिटिया’ लिख कर गांधी-चिंतक के रूप में प्रतिष्ठित हुए, वरिष्ठ हिंदी कथाकार गिरिराज किशोर ने ‘गांधी और समाज’ पुस्तक में अपने आलेखों, वक्तव्यों और व्याख्यानों में गांधी को अलग-अलग कोणों से समझने और समझाने की कोशिश की है। ये सभी आलेख पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग मौकों पर लिखे गए हैं इसलिए इनके संदर्भ नितांत समकालीन हैं और आज की निगाह से गांधी को देखते हैं। इन आलेखों में ‘व्यक्ति गांधी’ और ‘विचार गांधी’ के विरुद्ध इधर जोर पकड़ रहे संगठित दुष्प्रचार को भी रेखांकित किया गया है और उनके हत्यारे को पूजने वाली मानसिकता की हिंस्र संरचना को भी चिंता व चिंतन का विषय बनाया गया है।
गांधी और समाज : गिरिराज किशोर; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 595 रुपए।

बहुव्रीहि

यह सुपरिचित चित्रकार, कला अध्यापक, रंगकर्मी और सिने अभिनेता कनु पटेल के कृतित्व पर आधारित पुस्तक है। पुस्तक में चार अध्याय हैं- दृश्यता का नया मानक, कला-दृष्टि का विस्तृत आयतन, रंग संस्कार और नाट्यावदान तथा परदे पर अभिनय का कौशल। इसके पहले अध्याय ‘दृश्यता का नया मानक’ में एक चित्रकार के रूप में उनके सृजन की प्रक्रियाओं और महत्त्वपूर्ण चित्र शृंखलाओं पर विचार करने के साथ-साथ कला जगत में उनकी उपस्थिति को विवेचित करने का प्रयत्न है तो ‘कला-दृष्टि का विस्तृत आयतन’ में एक कला अध्यापक और विचारक के रूप में कला पर उनकी चिंताओं और व्यावहारिक समझ का अनुशीलन है।

‘रंग संस्कार और नाट्यवदान’ अध्याय में एक रंग अभिनेता और निर्देशक के रूप में उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों को देखने के साथ हिंदी और गुजराती भाषाओं में उनके महत योगदान को परखा गया है तो ‘परदे पर अभिनय का कौशल’ कनु पटेल द्वारा अभिनीत दूरदर्शन के नाटकों, धारावाहिकों तथा फिल्मों को देखने का यत्न किया गया है तो उनके विशिष्ट अवदान को परखने का प्रयत्न भी। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि ‘बहुव्रीवि’ कनु पटेल जैसे सर्वतोन्मुखी प्रतिभा के व्यक्ति को मूल्यांकित करने की एक आवश्यक पहल है जिससे हम सहजता से एक ऐसे व्यक्ति के सामने होते हैं जो स्वयं में एक समग्र संस्था है।
बहुव्रीहि- कनु पटेल का कलावदान : ज्योतिष जोशी; लज्जा पब्लिकेशंस, दूसरी मंजिल, सुपर मार्केट, राजेंद्र मार्ग, नाना बाजार, वल्लभ विद्यानगर, आनंद (गुजरात); 750 रुपए।

माटी मानुष चून

‘गंगा के दोनों किनारे धान की अकूत पैदावार देते थे, इसी तरह गेहूं, दालें और सब्जियां- क्या नहीं था, जो गंगा न देती हो। लेकिन आर्सेनिक ने सबसे पहले धान को पकड़ा और उनकी थाली में पहुंच गया, जो गंगा किनारे नहीं रहते। रही-सही कसर खेतों में डाले जा रहे पेस्टिसाइड से पूरी कर दी, जो बारिश के पानी के साथ बह कर गंगा में मिल जाता। अनाज और सब्जियों में आर्सेनिक आने के कारण वह चारा बन कर आसानी से डेयरी में घुस गया और गाय-भैंसों के दूध से भी बीमारियां होने लगीं। भूमिगत जल में पाया जाने वाला यह जहर पता नहीं कैसे मछलियों में भी आ गया। मछलियों में आर्सेनिक की बात सुन सभी ने एक-दूसरे की ओर देखा, लेकिन गीताश्री अपनी ही रौ में थी।

देखते ही देखते गंगा-तट जहर उगलने लगे, जिस अमृत के लिए सभ्यताएं खिंची चली आती थीं वह हलाहल में तब्दील हो गया। नतीजा, विस्थापन। लाखों बेमौत मारे गए और करोड़ों साफ पानी की तलाश में गंगा से दूर हो गए। ‘गंगा से दूर साफ पानी की तलाश’, कहने में अजीब-सा लगता है, नहीं?’ नारों और वादों के स्वर्णयुग में जितनी बातें गंगा को लेकर कही जा रही हैं, अगर वे सब लागू हो जाएं तो क्या होगा? बस आज से पचास-साठ साल बाद सरकार और समाज के गंगा को गुनने-बुनने की कथा है ‘माटी मानुष चून’।
माटी मानुष चून : अभय मिश्रा; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 250 रुपए।

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