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किताबें मिलीं: ज्ञान का ज्ञान

भारत को समझने का लक्ष्य लेकर यहां आए विदेशी विद्वानों को भी उपनिषदों से प्यार हुआ है। मूलभूत प्रश्न है कि क्या तेज रफ्तार जीवन में सैकड़ों वर्ष प्राचीन ज्ञान अनुभूति की कोई उपयोगिता है?’

Author Published on: November 10, 2019 2:17 AM
किताब ज्ञान का ज्ञान

बकौल लेखक ‘ज्ञान का ज्ञान शब्दों से नहीं मिला, लेकिन शब्द ही सहारा है। शब्द मार्ग संकेत है। उपनिषदों के शब्द संकेत जिज्ञासा को तीव्र करते हैं- छुरे की धार की तरह। सो मैंने, अपनी समझ बढ़ाने के लिए ईशावास्योपनिषद, कठोपनिषद, प्रश्नोपनिषद व माण्यूक्योपनिषद के प्रत्येक मंत्र का अपना भाष्य लिखा है। उपनिषद ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। विश्व दर्शन पर उनका प्रभाव पड़ा है। भारत को समझने का लक्ष्य लेकर यहां आए विदेशी विद्वानों को भी उपनिषदों से प्यार हुआ है। मूलभूत प्रश्न है कि क्या तेज रफ्तार जीवन में सैकड़ों वर्ष प्राचीन ज्ञान अनुभूति की कोई उपयोगिता है?’

इस पुस्तक में किसी ज्ञान का दावा नहीं किया गया है। पहला अध्याय ‘ज्ञान का ज्ञान’ है। यहां ज्ञान के अंतस में प्रवेश की अनुमति चाही गई है। दूसरा अध्याय ब्राह्मण, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र है। यह तीनों का परिचयात्मक है। ईशावास्योपनिषद के विवेचन वाले अध्याय के एक अंश में ईश्वर को भी विवेचन का विषय बनाया गया है। यह भाग लेखक ने अपनी ही लिखी पुस्तक ‘सोचने की भारतीय दृष्टि’ से लिया है। प्राक्विवरण के लिए इतना काफी है। इसके बाद चार उपनिषदों को रखा गया है। उपनिषद अध्ययन का अपना रस है। यही रस आनंद बांटने, मित्रों को इस ओर प्रेरित करने के प्रयोजन से इस पुस्तिका की आधारशिला रखी गई है।
ज्ञान का ज्ञान : हृदयनारायण दीक्षित; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 499 रुपए।

झील में चांद
झील में चांद’ हिंदी के विशिष्ट कवि और आलोचक शिवनारायण का गजल-संग्रह है। गजल के लहजे में बात करना एक आंतरिक साधना है। शिवनारायण की शायरी में भाषा की साधना और वैचारिक अभिव्यक्ति की कुशलता दिखती है। गजल के छंदशास्त्र को साध पाना दुष्कर माना जाता है, लेकिन इस चुनौती को भी सहजता से साधते हुए वे अपने इस प्रथम गजल-संग्रह के साथ हाजिर हैं। उनकी गजलों से गुजरकर जो बात तत्क्षण जेहन में आती है, वह यह कि उन्होंने हिंदी गजल की परंपरा, समझ और अपने समय की वैचारिकी की मुख्यधारा को समझा ही नहीं, उसे आत्मसात भी किया है। उनकी गजलें क्रांतिधर्मा ही नहीं, रिश्तों की कांति से भी ओतप्रोत हैं। उनकी गजलों में जगह-जगह जो चमक और रूहानी तड़प मौजूद है, उसका रसास्वादन प्राप्त कर पाठक निश्चय ही इस गजल-संग्रह को सिर-आंखों पर रखेंगे-
खेत में बारूद की फसलें उगाई जा रहीं
आंखों में खौफ का दरिया बहाया जा रहा
000
इतनी जल्दी क्या है साहिब ठहरो भी कुछ बात करो
तुमको भी घर जाना है तो हमको भी घर जाना है
शिवनारायण का यह गजल-संग्रह भाव-पक्ष के साथ-साथ उनके विचार-पक्ष का भी साक्षी बनेगा। उनके इस संग्रह के माध्यम से ही गजल की दुनिया में उनके द्वारा नायाब और विशिष्ट शायरी करने के दरवाजे खुलते हैं और इसीलिए पाठक इंतजार करेंगे कि उनकी रचनाओं में शायरी का उत्तरोत्तर गहरा और अधिक आकर्षक रंग चढ़ता जाए, जो इस दुनिया को गुलजार और मालामाल कर दे।
झील में चांद : शिवनारायण; संजना प्रकाशन, डी-70/4, अंकुर इंक्लेव, करावल नगर, दिल्ली; 150 रुपए।

नमकसार
आज हिंदी साहित्य में चार पीढ़ियां एक साथ सृजनरत हैं। इनमें जिन नए कथाकारों ने तेजी से अपनी जगह बनाई है, उनमें रजनी मोरवाल एक प्रमुख कथाकार हैं। पिता से विरासत में मिले लेखन के संस्कार को आगे बढ़ाते हुए रजनी मोरवाल कहानी लेखन में लगातार सक्रिय हैं। उनमें प्रयोग करने का भरपूर उत्साह है और साहस भी। उनकी नजर समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचती है और उनके भीतर झांक कर वह नए-नए कथानकों की रचना करती हैं।

जीवन को समग्रता से देखने के प्रयास में रजनी मोरवाल अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष, सवर्ण-दलित, हिंदू-मुसलमान, शिक्षित-अशिक्षित सबकी बारीकी से पड़ताल करती हैं और अपने चरित्र और उनके परिवेश को कहानियों में पूरी प्रामाणिकता और सजीवता के साथ पिरोती हैं। यहां रजनी मोरवाल लेखक से चित्रकार बन जाती हैं। वह जो बात शब्दों में लिखती हैं उसे कहानी पढ़ते हुए हम आंखों से देखते हैं।

इनकी कहानियों में भरपूर धैर्य है। रजनी मोरवाल अपनी कहानी को मंजिल तक पहुंचाने की जल्दबाजी या हड़बड़ी कभी नहीं करतीं। अच्छी बात यह है कि उनकी कहानियों के अधिकतर पात्र अपने आपमें बेहद मजबूत और संवेदनशील हैं। ये कहानियां हमारे भीतर उतरकर हमारी संवेदना को झकझोर देती हैं। इनकी कहानियों में संवेदना और मानवीय चिंताएं सर्वोपरि हैं। रजनी मोरवाल को कथा के परिवेश की बखूबी समझ है। यही कारण है कि आज का हर उम्र का पाठक इन कहानियों में अपने आसपास की दुनिया पाएगा।
नमकसार : रजनी मोरवाल; सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए।

मेरी प्यारी मोंटो
मेरी प्यारी मोंटो’ उस दौर की कहानी है, जब मोबाइल का युग नहीं था। विचारों के आदान-प्रदान के लिए फेसबुक और वाट्सएप जैसे प्लेटफार्म भी नहीं थे। उन दिनों प्यार के इजहार करने का सबसे लोकप्रिय जरिया लव लेटर हुआ करता था। लेकिन इस कहानी के नायक-नायिका ने कभी अपने प्यार की अभिव्यक्ति के लिए प्रेमपत्र का सहारा नहीं लिया। अपने जज्बाती स्वभाव के लिए मोंटो ने न केवल सूर्या के दिल में अपनी जगह बनाई बल्कि अपनी मोहब्बत को आखिरी पड़ाव तक भी ले गई।

कहानी की नायिका मोंटो अपने पहले प्यार के साथ बिताए एक-एक पल को बिंदास अंदाज में जीना चाहती है। वह अपने अल्हड़पन और नटखट स्वभाव को बैसाखी बना कर कहानी के नायक सूर्या का दिल जीतने की कोशिश करती है। जिंदगी में एक मुकाम हासिल करने के बाद भी मोंटो को अपने प्यार को हासिल करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। मोंटो अपने पैरों पर खड़ी होने के बाद सूर्या का हर कदम पर साथ देती है ताकि वह भी अपने पैरों पर खड़ा हो सके।

यह कहानी न केवल पाठकों को रोमांचित करती है, बल्कि उनकी आंखें भी भिगो देती है। रोमांस और रोमांच के दीवानों के लिए ‘मेरी प्यारी मोंटो’ एक भावनात्मक कहानी साबित हो सकती है।
मेरी प्यारी मोंटो : सूर्य कुमार उपाध्याय; टिंगल बुक्स, बी-37, संजय विहार, आवास विकास कॉलोनी, मेरठ रोड, हापुड़; 200 रुपए।

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