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किताबें मिलीं: शिलावहा

मनुष्य की सभ्यता यात्रा के तीन महत्त्वपूर्ण मोड़ों को एंगिल्स पहले ही स्त्री की पराधीनता के मूलभूत कारक मान चुके हैं। लेकिा विडंबना है कि स्त्री फिर भी पुरुष को डराती रही है- संवेदना, सहनशीलता में गुंथी सृजनात्मकता और क्रांति की दीपशिखा के कारण।

किताब शिलावहा

किरण सिंह समकालीन हिंदी कथा परिदृश्य में संभवत: पहली सशक्त कथाकार हैं, जो हिंदू धर्म सत्ता के षड्यंत्रों के खिलाफ अपनी सधी आवाज में तार्किक बहस का आयोजन करती हैं। पितृसत्ता और वर्ण व्यवस्था को भी वे धर्म सत्ता के सबसे ज्यादा मारक और धारदार हथियायों के रूप में देखती हैं। ‘द्रौपदी पीक’ कहानी में राजनीतिक आर्थिक, धार्मिक, संरक्षण प्राप्त नागा साधुओं के पाखंड और अपराध को वे अपनी सधी शैली में पहले ही व्यक्त कर चुकी हैं, जहां पर्दापाश एक पड़ी सनसनी की तरह नहीं आता, चरित्र के भीतर गहरी पैठ के कारण उसके संवेगों, प्रतिक्रियाओं और कार्यशैली के जरिए बेआवाज आता है। ‘शिलावहा’ चूंकि राम के ईश्वरत्व पर एक बड़ा सवालिया निशान लगने वाली रचना है, इसलिए किरण सिंह प्रकृति (इंद्र) और स्त्री (अहल्या) की बढ़ती ताकत से व्यथित पुरुष सत्ता (जो राजनीति, धर्म, पूंजी, ज्ञान-विज्ञान और मीडिया पर कब्जा जमाए बैठी है) की बदहवासी और नीयत, दोनों को एक साथ बाहर लाती हैं। ‘परिवार, संपत्ति और राज्य की उत्त्पत्ति’ – मनुष्य की सभ्यता यात्रा के तीन महत्त्वपूर्ण मोड़ों को एंगिल्स पहले ही स्त्री की पराधीनता के मूलभूत कारक मान चुके हैं। लेकिा विडंबना है कि स्त्री फिर भी पुरुष को डराती रही है- संवेदना, सहनशीलता में गुंथी सृजनात्मकता और क्रांति की दीपशिखा के कारण।
शिलावहा : किरण सिंह, आधार प्रकाशन, एससीएफ-267, सेक्टर-16, पंचकूला, हरियाणा; 100 रुपए।

एकांत के वे पल
एकांत के वे पल उपन्यास उत्तराखंड के पहाड़ों का सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश के अनेक रंगों को लेकर उपस्थित है। उपन्यास का एक-एक शब्द, एक-एक वाक्य हमारे अंतरर्मन को कहीं गहरे तक झकझोरते हुए एक गहरी तड़प, वेदना, बेचैनी कशमकश और दर्द भरी टीस पैदा करते हैं। यह उपन्यास एकमात्र भारत के पहाड़ी भागों में बसने वाले लोगों के जीवन, चरित्र-चित्रण, खानपान, रहन-सहन को ही नहीं दर्शाता, बल्कि यह विश्व के सभी पहाड़ी गांवों को अपने में समेटे हुए है। पहाड़ कोई भी हो, कहीं का भी हो, उनमें बसने वाले लोग किसी भी देश के हों। उनकी भाषा अलग हो सकती है। लेकिन उनका खानपान, रहन-सहन, जीवन-चरित्र तकरीबन एक-सा ही होता है। उनके अपने नियम होते हैं, अपने कानून होते हैं। रिश्तों की बुनियाद पर यह उपन्यास विश्व का वह समस्त जीवन अपने आप में समेटे हुए है, जिसमें तकरार है, तुनकमिजाजी है, हंसी है, बैर होने के बाद भी जिनमें अपनापन है और वह अदृश्य प्रेम है, जो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए पहाड़ों की अजेय दीवारों को तोड़ते हुए अपनी सारी हदें पार कर जाना चाहता है।

इस उपन्यास में प्रेम का जो वर्णन है, वह पूरे विश्व का वर्णन है। एक बेहद अनूठा और कोमल प्रेम। पहाड़ों का अप्रतिम सौंदर्य ही देश की खूबसूरती होती है। सघन वनों के, बहती नदियों के, बहते खूबसूरत झरनों के बीच जब कोई प्यार पनपता है तो उस प्यार की कल्पनाएं, इच्छाएं, सपनें, उड़ानें असीमित होती हैं। मिट्टी में से जिस तरह कोई बीज फूट कर पौधे को रूप में पल्लवित होना चाहता है, उसी तरह से पहाड़ों की गहराइयों में जब कोई प्यार पनपता है तो उसका कोई ओर-छोर नहीं होता। वह पनपनता है और वहीं दफन हो जाता है।
एकांत के वे पल : रणीराम गढ़वाली; परमेश्वरी प्रकाशन, बी-209, प्रीत विहार, दिल्ली; 450 रुपए।

मुझे मंजूर नहीं
इस कविता संग्रह की अधिकतर कविताओं में कवि बिशन सागर रूमानी नजर आए हैं। एक कशमकश, एक अधूरी ख्वाहिश, एक इंतजार, एक तन्हाई, एक सूनापन, एक खालीपन, एक प्रेम का गहरा समंदर, एक पक्का वादा और एक निश्छल प्रेम भावना उनकी कविताओं में छलक-छलक कर बाहर निकली हैं। इन कविताओं में कोई ताक-झांक, कोई कल्पना या किसी और का तजुर्बा महसूस नहीं होता। अक्सर प्रेम कविताएं, प्रेम के काल्पनिक इंद्रधनुषी धागों से बुन ली जाती हैं। इनमें प्रेम की इस उधेड़बुन में प्रेमिका के सौंदर्य के उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि यथार्थवादी क्षणों का चित्रण है। ‘फिर जुदा हो जाना’ कविता में कवि लिखते हैं- उम्मीदों के सतरंगी धागों से/ इक ख्वाब बुना था मैंने/ शायद इसका एहसास/ तुम्हें भी तो हुआ होगा/ या फिर ‘पागल प्रेमी मैं’/ करवटें बदलता सोच रहा हूं/ ये कौन सी उम्मीद है तुमसे/ जो/ मेरी नींद उड़ा ले गई है। कवि का प्रेमी मन अपनी इन कविताओं में आशावादी दिखता है, जो एक सहानुभूति हो सकती है। ‘जंजीर’ कविता में वे अपने प्रेम को निस्वार्थ अपनेपन की सतरंगी ओढ़नी से ओढ़ कर वर्तमान को विश्वास दिलाते हुए प्रतीत होते हैं कि प्रेम केवल प्रेम है छल, कपट व मतलब की दुनिया से दूर। ‘वो एक पहाड़ी लड़की’ में भले ही पहाड़ी लड़की कविता में ओझल हो गई हो, मगर पाठक की आंखों से ओझल नहीं हो पाएगी, क्योंकि उसका ओझल होना समंदर की आगोश में सूरज के डूब जाने जैसा प्रतीत होता है। संग्रह में इक्यावन कविताएं हैं जो प्रेम, वात्स्लय, दोस्ती, मानवीय संवेदना को झकझोरती हुई वक्त के साथ और वक्त के बाद चलती हुई प्रतीत होती हैं।
मुझे मंजूर नहीं : बिशन सागर; आस्था प्रकाशन, लाडोरानी रोड, जालंधर; 265 रुपए।

परिवर्तन की परंपरा के कवि
हिंदी कविता के समकालीन फलक पर गए पांच दशकों से अच्छादित लीलाधर जगूड़ी की कविताएं एक ओर अपने काव्य और प्रतीक की यथार्थवादी अभिव्यक्तियों के लिए जानी-पहचानी जाती हैं, वहीं अपनी सर्वथा अलग भाषिक स्थापत्य के लिए भी। हम कह सकते हैं कि आज की कविता को रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह के बाद धूमिल और जगूड़ी ने गहराई से प्रभावित किया है। परिवर्तन की परंपरा के कवि के रूप में लीलाधर जगूड़ी निरंतर अपने काव्य संस्कारों को मांजने वाले कवियों में रहे हैं। इसीलिए वे खेल-खेल में भी शब्दों के नए से नए अर्थ प्रस्तावन के लिए प्रतिश्रुत दिखते हैं। अपनी सुदीर्घ काव्य-यात्रा में जगूड़ी की विशेषता यह रही है कि वे विनोद कुमार शुक्ल की तरह ही, अपने प्रयुक्त कथन, भाव, बिंब या प्रतीक को दोहराने से बचते रहे हैं। यह उनकी मौलिकता का साक्ष्य है। हिंदी की विदुषी आलोचक बृजबाला सिंह ने लीलाधर जगूड़ी पर केंद्रित अपनी पुस्तक में जगूड़ी के पाठ्यबल के गुणसूत्र को कवि-जीवन, रचना यात्रा, कविता के उद्गम स्थल, चेतना के शिल्प और लंबी कविताओं के महाकाव्यात्मक विधान के आलोक में कविता-विवेक के साथ लक्षित-विश्लेषित किया है।

वे कविता में प्रतीकों के दिन थे, जब चिड़िया, बच्चे, पेड़ अपनी संज्ञाओं की चौहद्दी से पार गए अर्थ के प्रतीक रूप में अभिहित हो रहे थे। जगूड़ी जैसे कवि ऐसे प्रतीकों के पुरोधा थे। कविता की धरती को अपने अनुभवन से निरंतर पुनर्नवा करने की उनकी कोशिशों का ही प्रतिफल है कि उनकी कविता का मिजाज ‘नाटक जारी है’ से ‘जितने लोग उतने प्रेम’ तक उत्तरोत्तर बदलता रहा है। मेगा नैरेटिव के कवि जगूड़ी किसी आख्यानक का बानक रचने के बजाय सार्थक वक्तव्यों की लीक पर चलते हुए ्ब तक जीवन के तमाम ऐसे अलक्षित पहलुओं को कविता में लाने में सफल हुए हैं, जैसी सफलता कम लोगों ने अर्जित की है।
परिवर्तन की परंरपरा के कवि लीलाधर जगूड़ी : डॉ बृजबाला सिंह; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 595 रुपए।

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