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भोली की सहेली

वह साड़ी को पहनने लगी, लेकिन वह साड़ी पहनना जानती ही नहीं थी। हर बार उल्टी-सीधी लपेटती और जैसे ही नृत्य की मुद्रा बनाती, वैसे ही साड़ी खिखक कर नीचे गिर जाती। थक-हार कर उसने साड़ी को समेटा और एक तरफ पटक दिया।

Author July 7, 2019 5:38 AM

नाम तो उसका प्रतिभा था, लेकिन सब लोग उसे ‘भोली’ बुलाते थे। सचमुच वह भोली और सरल स्वभाव की थी। कोई अगर पूछता कि ‘तुम्हारा क्या नाम है?’ तो वह एक सांस में कह देती है कि ‘मेरा नाम प्रतिभा है, मेरी उम्र दस साल है, मैं पांचवी कक्षा में पढ़ती हूं।’ उसे नए-नए काम सीखने की ललक सदा रहती थी। भोली का घर तो शहर के पास एक छोटे से गांव में था, लेकिन उसके पिताजी शहर के इस मोहल्ले में किराए का मकान लेकर रह रहे थे। मां और पिताजी यहां रह कर कपड़े धोने और उन पर इस्त्री करने का रोजगार करते थे।

सुबह मां और पिताजी कपड़े धोने पास की नदी पर जाते और दोपहर बाद उन्हीं कपड़ों पर इस्त्री कर लोगों के घर तक पहुंचाते। इस तरह घर का खर्च चल जाता था। भोली पढ़ाई के साथ-साथ घर के काम में हाथ बंटाती।  एक रविवार की बात है, भोली के मां और पिताजी नदी पर थे और भोली घर पर अकेली थी। उसने देखा कि एक साड़ी भूल से मां घर पर ही छोड़ गई है। गहरे रंग की वह साड़ी भोली के मन को भा गई। उसका मन उस साड़ी को पहन कर नाचने का हो रहा था।

वह साड़ी को पहनने लगी, लेकिन वह साड़ी पहनना जानती ही नहीं थी। हर बार उल्टी-सीधी लपेटती और जैसे ही नृत्य की मुद्रा बनाती, वैसे ही साड़ी खिखक कर नीचे गिर जाती। थक-हार कर उसने साड़ी को समेटा और एक तरफ पटक दिया, और लंबी जीभ निकाल कर उस बेजान साड़ी को चिढ़ाने लगी ‘ई ई ई ई ई…’। तभी उस छोटे से कमरे में एक मधुर और धीमी हंसी गूंज गई।

भोली चौंकी, उसने कमरे में चारों तरफ नजर दौड़ाई, पर वहां कोई दिखा ही नहीं। ‘हे भगवान! यहां कोई है ही नहीं तो हंस कौन रहा है?’ उसने मन ही मन कहा। उसने कमरे में चारों तरफ नजर घुमाते हुए कहा- ‘आप कौन हैं? इस तरह हंस क्यों रहीं हैं?… आप सामने क्यों नहीं आतीं?  भोली के इतना कहते ही हंसी रुक गई, और पल भर बाद ही एक बड़ी-सी प्यारी तितली उसके सामने आ गई। भोली कुछ सोचती-समझती या कुछ और पूछती उससे पहले ही वह तितली एक नन्ही परी के रूप में भोली के सामने खड़ी हो गई। उसका रूप और मुस्कराहट देख कर भोली उससे कुछ पूछना ही भूल गई।

‘मैं बहुत देर से तुम्हें नृत्य का प्रयास करते देख रही थी। तुम्हारी झल्लाहट पर मुझे हंसी आ गई। क्षमा चाहती हूं।’ नन्ही परी ने कहा।
‘किंतु आप कौन हैं, आपका नाम क्या है?’ भोली ने सहजता से पूछा।
‘मैं अच्छी परी हूं।’ उसने कहा।
‘हां! वह तो मैं भी समझ रही हूं, कि तुम अच्छी परी हो, पर तुम्हारा नाम क्या है?’ भोली ने फिर पूछा।
‘अभी तो बताया, मैं अच्छी परी हूं…।’ परी ने बनावटी गुस्सा जताते हुए कहा।
‘अच्छा, मैं पहले अपना नाम बता देती हूं, मेरा नाम प्रतिभा है और सब लोग मुझे भोली कह कर बुलाते हैं।’
‘और प्यारी सहेली मेरा नाम ‘अच्छी’ है। और सब लोग मुझे ‘अच्छी परी’ कह कर बुलाते हैं।’ अच्छी परी ने भोली की नकल करते हुए कहा।
इस बात पर पहले भोली फिर अच्छी और फिर दोनों गले मिल कर एक साथ खिलखिला कर हंस पड़ीं। थोड़ी ही देर में दोनों एक-दूसरे की पक्की सहेली बन गर्इं।
‘क्या तुम्हें नृत्य करना अच्छा लगता है?’ अच्छी ने पूछा।
‘हां! नृत्य करते हुए किसी को देखती हूं तो मेरा भी मन होता है कि मैं भी अच्छी नृत्यांगना बन सकूं।’ भोली ने कहा।
‘तुम अवश्य ही अच्छी नृत्यांगना बनोगी।’ अच्छी ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा।
‘पर कैसे? ता-थई ता-थई तो दूर की बात, मुझे तो अभी साड़ी बांधना ही नहीं आता।’ भोली ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा।
अच्छी परी कुछ पल चुप रही फिर उसने कहा- ‘तुम्हें पता है, यह किसकी साड़ी है?’
‘हां! यह साड़ी मीनाक्षी मैम की है, वह कुछ लड़कियों को शास्त्रीय नृत्य सिखाती भी हैं।’ भोली ने भोलेपन से कहा।
‘तब तो तुम भी कल से नृत्य सीखोगी।’ अच्छी परी ने विश्वास के साथ कहा।
‘सो कैसे?’ भोली ने पूछा।
अच्छी परी ने कहा- ‘तुम कुछ देर इसी तरह साड़ी लपेट कर नृत्य करती रहो, मैं ‘यों गई और यों आई।’ अच्छी परी ने चुटकी बजाते हुए कहा और वहां से उड़न-छू हो गई।
भोली ने जैसे-तैसे साड़ी लपेटी और भरतनाट्यम करने लगी। ता-थई, ता-थई, थई-थई, ता-ता थई-थई… पैर चल रहे थे और आंखें दरवाजे पर टिकी हुई थी। कान किसी भी आवाज को सुनने के लिए चौकन्ना थे। अचानक भोली के पांव ठिठक गए। उसके पैरों के नीचे से धरती खिसकने लगी। दरवाजे पर एक छोटी-सी बच्ची के साथ मीनाक्षी मैम आ खड़ी हुई थीं।
‘देखिए मैम! आप खुद ही देख लीजिए। मैंने आपसे सच कहा था न कि भोली आपकी साड़ी का सत्यानाश कर रही है।’ उस छोटी बच्ची ने मीनाक्षी मैम से कहा।
‘हां! तुमने सच कहा था। आज इसकी मां से इसकी शिकायत करूंगी। इसके पिताजी से इसकी पिटाई भी करवाऊंगी।’ मीनाक्षी मैम ने गुस्से में कहा।
‘जरूर, आप शिकायत जरूर करिए। लेकिन मैम एक बात कहूं। यह नृत्य बहुत अच्छा कर रही थी।’ उस छोटी बच्ची ने कहा।
‘अच्छा! ऐसी बात है, तो हम भी इसका नृत्य देखना चाहेंगे। भोली तुम हमें भी नृत्य करके दिखाओ।’ मीनाक्षी मैम ने कहा।
बेचारी भोली के पास कोई दूसरा उपाय था ही नहीं। उसने नृत्य करना शुरू कर दिया। फिर वह नृत्य में रम गई। अगर साड़ी खिसक कर नीचे न गिरी होती तो वह नृत्य करती ही रहती। साड़ी के खिसकते ही उसका नृत्य भी रुक गया। लेकिन उसने देखा कि मीनाक्षी मैम के आंसू नहीं रुक रहे थे। वह कला की पारखी थीं, उन्होंने भोली के नृत्य में छिपे हुनर को पहचान लिया था। भोली को गले लगा कर कहा- ‘आज से तुम मेरी भी बेटी हो। आज शाम से ही तुम मेरे घर आकर निशुल्क नृत्य सीखना शुरू करोगी। और बहुत जल्दी तुम एक प्रसिद्ध नृत्यांगना बनोगी। यह मेरा विश्वास है।’
उसके माथे पर एक प्यार भरा चुंबन देकर मीनाक्षी मैम चली गर्इं।
भोली अवाक खड़ी रह गई। उसे यह सब दिवास्वप्न जैसा लग रहा था।
‘अब मैं भी जाऊं?’ यह सवाल सुन कर भोली सचेत हो गई। वह छोटी बच्ची भोली से ही पूछ रही थी। ‘अब मैं जाऊं?’ उसने फिर पूछा।
भोली कुछ न बोली। उसकी नजर दरवाजे के बाहर किसी को खोज रही थी।
‘किसकी प्रतीक्षा कर रही हो?’ उस छोटी बच्ची ने पूछा।
‘मेरी एक अच्छी सहेली है, उसने कहा था जल्दी आऊंगी, पर अभी तक नहीं आई।’ भोली ने बाहर की ओर देखते हुए कहा।
‘वहां बाहर नहीं, यहां देखो। तुम्हारी अच्छी सहेली तुम्हारे पास ही खड़ी है।’ उस छोटी बच्ची ने कहा। भोली के देखते ही देखते वह छोटी बच्ची, ‘अच्छी परी’ के अपने असली रूप में बदल गई। भोली को समझने में देर न लगी कि मीनाक्षी मैम को यहां तक लाने के लिए ‘अच्छी परी’ ने यह नाटक रचा था।
भोली उसके गले से लिपट गई। उसकी आंखों से खुशी के आंसू झर-झर, झर रहे थे।

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