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कविताएं

जनसत्ता की कविताएं...

उलटबांसी

कुछ लोग भोले होते हैं
कुछ लोग बहुत भोले होते हैं
कुछ लोग शरीफ होते हैं
कुछ लोग बहुत शरीफ होते हैं
कुछ लोग अच्छे होते हैं
कुछ लोग बहुत अच्छे होते हैं
कुछ लोग सच्चे होते हैं
कुछ लोग बहुत सच्चे होते हैं
कुछ लोग इनके विलोम भी होते हैं
ये सभी वक्त जरूरत सबका दुख हरते हैं!

प्रभु इच्छा थी!

पुल ढल गया
उतर गई पटरी से
रेलगाड़ी
लीला थी उनकी
गांव तो गांव
बाढ़ में डूब गई राजधानी
प्रभु इच्छा थी
सो गए सैकड़ों
पीकर अमृत का प्याला
छीन लिया निवाला
मिल के गेट पर झूल गया ताला
प्रभु इच्छा थी
लग गई मंदिर में आग
सोता रह बंदे
कभी मत जाग
प्रभु की इच्छा है!

तलाश

वहां न पत्तों की हिलडुल थी
न चह-चह थी चिड़ियों की
सुबह का वक्त था और
आसमान खाली-खाली
खेतों में न भड़-भड़ का शोर था
न टुन-टुन का संगीत
झाड़ियों के पीछे खुसुर-फुसुर जरूर था
बहुत अनाचार हुआ था बीती रात
एक सिरफिरे की तलाश में आई थी पुलिस
जो नेताओं, मंत्रियों, अफसरों के खिलाफ
गांव के लोगों को भड़का रहा था लगातार।

हर तरफ हरा-हरा…

न चेहरे पर छाई
घटा दिख रही थी काली
न उमड़ती-घुमड़ती बदली
उदास आंखों की
भक्ति रस में डूबे थे ऐसे
कि न दिख रही थी
सूखी टहनियां, न पीली पत्तियां
दिख रहा था बस
हर तरफ हरा-हरा…

तो कोई बात बने!

शोर तो बहुत है
लगभग कोलाहल
मगर उसमें जोर नहीं
दिल तक पहुंच ही नहीं पाता
कोई संदेश, बस आवेश
अरे भाई, तार को मंद्र पर ले जाओ
थोड़ा, कुछ तो दे सुनाई, मेरे भाई
तो कोई बात बने! ०

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