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स्मरण- तबले के ताल- गुरू

उस समय लच्छू महाराज महज आठ साल के बालक थे। मुंबई में कार्यक्रम चल रहा था, जिसमें उस्ताद अहमद जान थिरकवा भी मौजूद थे।

Author October 16, 2018 10:43 AM
लच्छू महाराज

वे गत-फर्द और उठान के श्रेष्ठ कलाकार थे। बढ़ैया की उठान के अलावा गत, फर्द के बोल जब उनकी उंगलियों से तबले पर निकलते थे तो पूरी महफिल झूम जाती थी और ताल के शास्त्री उसको याद करने लग जाते थे। एकल तबला वादन में तो लच्छू महाराज को महारत हासिल थी ही, गायन और नृत्य में भी वे निपुण थे। 

उस समय लच्छू महाराज महज आठ साल के बालक थे। मुंबई में कार्यक्रम चल रहा था, जिसमें उस्ताद अहमद जान थिरकवा भी मौजूद थे। लच्छू महाराज ने तबले की जोड़ी उठाई और उनकी नन्ही उंगलियां तबले पर बिजली की गति से थिरकने लगीं। उन्हें देख उस्ताद अहमद जान के मुंह से एक ही शब्द ही निकला-‘वाह!’ चरम पर पहुंचने के बाद जब आयोजन थमा तो उस्ताद थिरकवा बोले, ‘काश, लच्छू मेरा बेटा होता।’ बनारस की दाल मंडी की उस हवेली ने पिछली सदी के पहले छह दशकों में मुजरा देखा था, ठुमरी सुनी थी और चारों पट का तबला सुना था। वासुदेव नारायण सिंह उस जमाने में देश के दिग्गज तबला वादकों में शुमार थे। परिवार से अलग क्रांतिकारी कदम उठाते हुए उन्होंने इसी हवेली में शादी की, जिसकी वजह से बनारस के संगीत घरानों से बेदखल हुए। उन्हीं वासुदेव सिंह की दूसरी संतान थे लक्ष्मी नारायण सिंह यानी लच्छू महाराज। वासुदेव सिंह ने बालक लच्छू के हाथों में जो तबले की जोड़ी थमाई, वह अंतिम समय तक उनके साथ रही। आखिरी वक्त तक लच्छू महाराज इसी हवेली के ऊपर के हॉल में रियाज करते-कराते रहे। इसी हवेली में उन्होंने अपनी बहन निर्मला देवी के पुत्र यानी अभिनेता भांजे गोविंदा को भी तबला सिखाया।

16 अक्तूबर, 1944 को जनमे लच्छू महाराज के जीवन की उठान तो अच्छी रही, लेकिन 1970 से 80 के दशक में विलंबित एकताल ही बजी। पहले पिता और फिर मां की मृत्यु ने उन्हें तोड़ दिया, तिस पर स्थानीय संगीत बिरादरी की बेरुखी ने उन्हें अज्ञातवास पर जाने को विवश कर दिया। 1998 में स्पीक मैके के कार्यक्रम में सोलो तबला वादन से उन्होंने वापसी की और शाहिद परवेज के साथ संगत करके संगीत के शास्त्रियों की दुनिया में फिर छा गए। सिद्ध किया कि उनके पिता वासुदेव सिंह ने उनके और बनारस के केदार भौमिक के हाथों में अपनी विरासत को यों ही नहीं थमाया। पिता की ही तरह क्रांतिकारी विचार अपनाते हुए उन्होंने फ्रांसीसी महिला टीना के साथ विवाह रचाया। उनकी बेटी चंद्रा नारायणी अपनी मां के साथ स्विट्जरलैंड में रहती हैं। 1975 में आपातकाल के दौरान जॉर्ज फर्नांडिस और देवव्रत मजूमदार जैसे दिग्गज समाजवादी नेताओं को लच्छू महाराज ने जेल में तबला बजाकर सुनाया। वास्तव में, उन्होंने ऐसा करके आपातकाल का अपने ढंग से विरोध किया था। उन्होंने अपनी ताल में कभी किसी प्रभुत्वकारी शिल्प को स्वीकार नहीं किया।

असहमति को शिल्प से सोचने का उनका अपना कलात्मक नजरिया था। वे जीवनपर्यंत संगीत में विपक्ष की भूमिका निभाते रहे। सत्ता के करीब तबला वादकों को खरी-खोटी सुनाते रहे। लच्छू महाराज ने उस्ताद बड़े गुलाम अली खां से लेकर सितार के शहंशाह भारत रत्न पंडित रविशंकर समेत देश-दुनिया के प्रख्यात कलाकारों के साथ संगत की और कई बॉलीवुड फिल्मों के लिए भी ताल बजाई, मगर कभी आत्मविज्ञापन नहीं किया। जीवन के अंतिम दो दशकों में उन्होंने अपनी शर्तों की छांव तले अनजान ढंग से जिंदगी गुजारी और वैसा ही अपने शिष्यों को भी बताया-सिखाया। गिनती के कुछ संगीत मित्रों और समर्पित शिष्यों ने उन्हें कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वे अकेले हैं, तो उन्होंने भी यह भ्रम बनाए रखा कि उनके बीच वे बहुत खुश हैं और अकेले नहीं हैं। तभी तो जीवन के आखिरी दिनों में लगातार कष्ट सहने के बावजूद उन्होंने अपनी पीड़ा को न तो किसी शिष्य से साझा किया और न ही अस्पताल गए। 19 जुलाई को गुरु पूर्णिमा पर उनके आवास पर शिष्यों का जमावड़ा लगा। उन्होंने शिष्यों को आशीर्वाद दिया और ईमानदारी से अभ्यास करने की सीख दी। सासाराम, बिहार के कुछ शिष्यों के आग्रह पर 21 जुलाई को वे गुरु पूर्णिमा के कार्यक्रम में वहां गए। 22 जुलाई की शाम को बनारस लौटे तो बुखार आ गया। 23 जुलाई को दिन भर वह बुखार में तपते रहे, लेकिन अस्पताल नहीं गए। बुखार उतरा, तो उनकी पुरानी दिनचर्या फिर शुरू हो गई। 26 जुलाई को उनकी सांस अचानक तेज चलने लगी।

करीब चार वर्ष से लच्छू महाराज के साथ छाया की तरह रहने वाले उनके चहेते नेपाली शिष्य दीपक ने कई बार अस्पताल जाने के लिए कहा, मगर उन्होंने उसे चुप करा दिया। 27 जुलाई को उन्होंने भोगाबीर वाले आवास से दाल मंडी जाने के लिए तैयारी की। घर से निकले तो सीने में तेज चुभन होने लगी। पीठ में भी तेज दर्द उठ गया। चिकित्सक से कहकर किसी तरह उन्हें एक इंजेक्शन लगवाया गया, लेकिन अपनी जिद के धनी लच्छू महाराज अस्पताल तब भी नहीं गए। आखिर 28 जुलाई को हृदयाघात से उनका निधन हो गया।

नारियल स्वभाव की-सी अड़ियल शख्सियत लच्छू महाराज की तुनक-मिजाजी के किस्से मशहूर हैं। एक बार उन्हें आकाशवाणी में तबला वादन के लिए बुलाया गया। उन्हें बुलाने वाले केंद्र निदेशक सिर्फ पांच मिनट विलंब से पहुंचे तो देखा कि लच्छू महाराज कार्यक्रम में शिरकत किए बिना ही वापस जा चुके थे। विश्वविख्यात संकट मोचन संगीत समारोह में लच्छू महाराज को तबला वादन के लिए बुलाया गया। वहां तबला बजाते-बजाते अचानक फट गया। दूसरा तबला लाने में देरी हुई तो लच्छू महाराज बीच में ही उठकर चले गए। एक बार एक बड़े संगीतकार अपने बेटे को लेकर उनके पास आए। बोले, बस इतना सिखा दीजिए कि अपनी आजीविका चला सके। इतना सुनते ही लच्छू महाराज खफा हो गए। बोले, संगीत साधना है और संगीतकार को लौटा दिया।

यही नहीं, फक्कड़ मिजाजी का चोला पहनने वाले लच्छू महाराज ने पद्मश्री सम्मान तक ठुकरा दिया। 1992 में जब केंद्र में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली सरकार आई, तब उनको पद्मश्री के लिए नामित किया गया। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के अधिकारी को इस सिलसिले में दिन के 11 बजे दाल मंडी स्थित आवास पर आना था, लेकिन जब वह पहुंचे तो दोपहर के दो बज चुके थे। उस समय महाराज अपने शिष्यों को तबले की तालीम दे रहे थे। जब अफसर के आने की बात उनको बताई गई तो उन्होंने उसे हवेली की सीढ़ी चढ़ने से मना कर दिया। अधिकारी को नीचे से ही बैरंग लौटा दिया गया। चंद्रशेखर से उन्होंने इसकी चर्चा तक कभी नहीं की, जबकि वे उनके करीबियों में थे। अलबत्ता, उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।

ताल गुरु लच्छू महाराज के पास पांच हजार से अधिक गत-फर्द का संग्रह था। आखिर उनके पिता वासुदेव सिंह ने विभिन्न घरानों के तबला वादकों की देखभाल करते हुए उनके घरानों की बंदिशों को इकट्ठा कर लच्छू महाराज को दिया था। वे गत-फर्द और उठान के श्रेष्ठ कलाकार थे। बढ़ैया की उठान के अलावा गत, फर्द के बोल जब उनकी उंगलियों से तबले पर निकलते थे तो पूरी महफिल झूम जाती थी और ताल के शास्त्री उसको याद करने लग जाते थे। एकल तबला वादन में तो लच्छू महाराज को महारत हासिल थी ही, गायन और नृत्य में भी वे निपुण थे। शास्त्रीय गायक राजन-साजन मिश्र बताते हैं, ‘उनकी थाप जब तबले पर पड़ती तो तबला मानो बोल उठता था। हमें याद है करीब चार दशक पहले बिहार के सासाराम का वह आयोजन। वहां हम दोनों भाइयों के साथ लच्छू महाराज भी मंच पर थे। स्वर के साथ मानो तबला भी बोल रहा था। कई बार तबले की ठनक पर खूब तालियां बजीं।’

तबले पर लच्छू महाराज की उंगलियों से निकलते ‘ धिर…धिर…तिटकत’ और ‘ताक…धिन…धिन्ना’ के बोलों को आज तक कोई तबला वादक कॉपी नहीं कर पाया। ‘ना धिं धिं ना…’ के बादशाह अनोखेलाल मिश्र के बाद खड़ी उंगली के बोल का जादू सिर्फ लच्छू महाराज के ही पास था। ठुमरी गायक छन्नूलाल मिश्र कहते हैं, ‘उनकी उठान में जो जान थी, वह किसी दूसरे कलाकार में नहीं थी।’ तबले के चार घरानों- अजराड़ा, बनारस, फर्रूखाबाद और लखनऊ घराने के बाज (बोल और विशेषता) पर लच्छू महाराज का अधिकार था। 71 वर्ष की उम्र में भी उनके पास रियाज था और तैयारी भी। वे बनारस घराने के प्रसिद्ध तबला वादकों- अनोखे लाल, पद्मभूषण सामता प्रसाद गोदई महाराज, पद्मविभूषण किशन महाराज की परंपरा के अंतिम कलाकार थे, जिनकी उंगलियों में जादू-सा असर था और संगीत की दुनिया में दबदबा भी। उनके करीबी शिष्य और प्रसिद्ध तबला वादक अशोक पांडेय कहते हैं, ‘ताल की अनूठी बारीकियां न तो संरक्षित की जा सकीं और न ही कोई सीख सका। लच्छू महाराज जैसी थाप देने वाला फक्कड़ मिजाज न कोई था और न कोई होगा।’ १

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