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कहानी- वह एक पल

मां-बाप, पत्नी, बेटा, बहन, भाई, भाभियां, जीजा- सभी उसे दोषी लग रहे थे। किसी ने भी उसे समझने की कभी कोशिश नहीं की। पिता तो बचपन में ही नहीं रहे थे। मां भाइयों पर आश्रित रही। उसके साथ, वह भी। एक तरह की हीन भावना का शिकार वह बचपन से ही रहा था। पढ़ाई में अच्छा न होता, तो शायद कोई दोस्त-यार भी न होता उसका। जो थोड़ा-बहुत प्यार-लगाव मिला, वह दोस्तों से ही मिला। पर थे तो वे भी अपनी गरज के ही दोस्त।

Author Published on: December 3, 2017 5:47 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

उषा महाजन

उसने तैयारी पूरी कर ली थी। सभी खिड़कियां अच्छी तरह बंद कर दी थी। उसके बेडरूम की खिड़की के ठीक सामने महज दस फुट की दूरी पर पड़ोसी के बेडरूम की खिड़की थी, जो दिन-रात खुली रहती थी, दिन में धूप की खातिर और रात में हवा के लिए। दरवाजा तो बंद ही था।  जबसे सुषमा गई थी, वह सिगरेट पर सिगरेट ही फूंकता रहा था रात भर। जाते वक्त उसने कहा था कि वह दो दिनों का इकट्ठा खाना बना कर फ्रिज में रखे जा रही थी। कुछ फल भी रख गई थी, साथ ही सुना भी गई थी, ‘पापा ने… रुपए न भेजे होते, तो दूसरा एफडी भी प्री मेच्योर ही तुड़ाना पड़ता…।’ उसे सुषमा की बात पर न तो गुस्सा आया था, न खीझ। पहले की तरह वह न चिढ़ा था, न चीखा था। निरपेक्ष-सा, उसकी ओर बिना देखे ही वह बुदबुदाया था, ‘बेफिकर रहो, अब नहीं तुड़ाना पड़ेगा…।’  बीती पूरी रात उसने सारी स्थिति का अच्छी तरह आकलन कर लिया था और वह पूरी तरह आश्वस्त हो चुका था कि जो फैसला उसने किया था, उसके सिवा उसके पास अब कोई चारा नहीं बचा था।

यह पहली बार नहीं हुआ था कि सुषमा उसे अकेला छोड़ कर मायके चली गई थी, बल्कि इस बार तो आपसी सहमति से कार्यक्रम बना था उसके जाने का, बेटे आनंद के साथ। दरअसल, आनंद को लेकर वे दोनों ही कई सालों से खासे परेशान थे। पिता इंजीनियर और मां अध्यापिका, फिर भी बेटा पढ़ाई-लिखाई में इतना नाकारा कि अठारह साल की उम्र तक भी दसवीं पास नहीं कर पाया था। ऐसा नहीं कि उन्हें इसका कारण नहीं पता था। उसकी ‘मेडिकल प्रॉब्लम’ का तो डॉक्टरों ने उन्हें बचपन के दिनों में ही बता दिया था कि बच्चा ‘आॅटिस्टिक’ था और यह कोई बीमारी नहीं कि दवाइयों से ठीक हो जाती। बच्चे को जीवन जीने लायक बनाने के लिए उसकी कई तरह की थेरेपी करवाने की ज़रूरत थी। ऐसी कुछ संस्थाएं थीं, जहां ये सुविधाएं उपलब्ध थीं। लेकिन दोनों पति-पत्नी को आपसी टकराव और लड़ाई -झगड़ों से ही फुर्सत नहीं थी कि बच्चे को लेकर ऐसी लगन दिखा पाते। जब माता-पिता के बीच ही आपसी सामंजस्य न हो तो सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों का ही होता है। बहरहाल, यहां तो नुकसान सभी को हुआ था। उसने नौकरी में एक ब्रिलियंट / आलीशान करियर की अपेक्षा की थी, पर निजी जीवन के असंतोष ने उसे भी तबाह कर दिया। सभी हैरान रह गए थे, जब उसने बॉस से लड़ कर नवरत्न कहे जाने वाले सार्वजनिक उपक्रम से अचानक ही इस्तीफा दे दिया था। बाद में वह पछताया भी था और कुछ ही महीनों की बेरोजगारी ने उसे चिरंतन अवसाद की ऐसी घातक स्थिति में ला छोड़ा था कि वह नई नौकरी खोजने की स्थिति में भी नहीं रहा था। घर के हालात थोड़े ही अरसे में इतने बिगड़ गए थे कि जीना हरेक के लिए दूभर हो गया था।

वह खुद नहीं समझ पा रहा था कि उसे जीवन से क्या चाहिए था। मां-बाप, पत्नी, बेटा, बहन, भाई, भाभियां, जीजा- सभी उसे दोषी लग रहे थे। किसी ने भी उसे समझने की कभी कोशिश नहीं की। पिता तो बचपन में ही नहीं रहे थे। मां भाइयों पर आश्रित रही। उसके साथ, वह भी। एक तरह की हीन भावना का शिकार वह बचपन से ही रहा था। पढ़ाई में अच्छा न होता, तो शायद कोई दोस्त-यार भी न होता उसका। जो थोड़ा-बहुत प्यार-लगाव मिला, वह दोस्तों से ही मिला। पर थे तो वे भी अपनी गरज के ही दोस्त। किसी को गणित की जटिलताएं समझनी होतीं उससे, तो किसी को फिजिक्स की। उसे सभी पहचानते थे मेधावी छात्र के बतौर। दरअसल, नौकरी में भी छवि तो उसकी ऐसी ही थी, लेकिन व्यवहार की कमियों के चलते हर बार गंवाई उसने नौकरी।  पत्नी उसे चाहती नहीं, बेटा बोझ की तरह! इतने दिनों की बेरोजगारी के चलते अब कोई नौकरी तो क्या ही मिलेगी? क्या करे वह? है क्या कोई भविष्य उसका जिसकी उमंग में जिए जाए वह?  सुषमा की चुन्नी उसे सहज ही उसकी लकड़ी वाली अलमारी में मिल गई थी।

फंदा वह आसानी से बना सकता था। कई बार फिल्मों में देखा था।  उसे जबर्दस्त पसीना आने लगा था। गला सूखने लगा था। चुन्नी उसने पंखे पर फेंक कर टांग दी। पलंग के बगल की तिपाई को ऊपर चढ़ने के लिए और फंदा बनाने के लिए वह पंखे के नीचे सरका ही रहा था कि उसका मोबाइल घनघना उठा। वह रुका, पर कॉल नहीं लिया। फोन फिर बजा। लगातार।… ‘सुषमा का होगा! तो उसको बता ही देता है कि…’  फोन सुषमा का ही था। जैसे ही उसने ‘हेलो’ कहा, उधर से आई आवाज ने उसे चौंका दिया। ‘अरे यार, मैं संजय बोल रहा हूं, संजय वाही, बीएचयू वाला। भाभी के फोन से बोल रहा हूं। कितना ढूंढ़ा तुझे। फेसबुक पर, लिंक्डइन पर… और आज अगर नैनीताल में सुषमा भाभी से मुलाकात न होती, तो तेरा पता ही नहीं चलता कभी। बता रही हैं कि तूने अभी-अभी नौकरी से इस्तीफा दिया है। यार, दूसरी मत ढूंढ़ना अब। सीधे पहुंच यहां हल्द्वानी। मैं यूएस से वापस आ गया हूं। बहुत कर ली नौकरी। अब फार्मिंग करेंगे यार। खेती-बाड़ी। तेरा कमाल का ब्रेन भी लगेगा तो सक्सेस जरूर मिलेगी हमें। आनंद को भी साथ लगा लेंगे…।’ वह किंकर्तव्यविमूढ़ सा सुनता जा रहा था और उसकी आंखों से तरल कुछ बहता जा रहा था। उसके भीतर कुछ कांपा। लगा जैसे वह किसी गहरी नींद से जागा हो। उसने झटके से तिपाई को वापस पलंग के साथ टिकाया और पंखे पर लटकती चुन्नी को नीचे खींच लिया। मोबाइल को कान से लगाए-लगाए ही, वह कमरे की सुबह से बंद खिड़कियां खोलने को दौड़ा। ०

 

 

 

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