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कहानी- उजला चांद

वापस उदयपुर लौट रही रागिनी इसी सोच में डूबी हुई थी कि मां चाहती तो उसे अजन्मा ही मसोस सकती थी। उसकी मां एक बहादुर औरत थी। उसने न जाने किन कमजोर क्षणों में उसे ग्रहण कर लिया होगा, पर फिर भी परिस्थितियों से सामना करते हुए न केवल उसे जन्म दिया, बल्कि इतना सशक्त भी बनाया। मां के ही प्रयत्नों से आज वह अपनी एक पहचान बना पाई थी।
Author July 2, 2017 00:21 am
प्रतीकात्मक चित्र

रजनी मोरवाल

 

आज फिर रागिनी बालकनी में खड़ी थी। शाम के धुंधलके में चांद कुछ अधिक ही पतला और सफेद नजर आ रहा था। दो पर्वतों के बीच से यों झांक रहा था जैसे किसी ने जबरन ठेल कर धकेला हो। पास ही खटाखट-खटाखट की आवाजें आ रही थीं। शायद पास ही कोई लकड़हारा किसी पेड़ की जड़ों पर निरंतर प्रहार कर रहा था। रात का र्इंधन जुटाने की तैयारी में व्यस्त होगा।… रागिनी मुस्कुराई कि यह लकड़हारा पेड़ों की जड़ें काट कर अपनी जड़ें सुरक्षित कर लेना चाहता है।  दूर पर्वतों पर दूर तक छोटी-छोटी झाड़ियां बिखरी हुई नजर आ रही थीं, जैसे अपने झुंड से विलग होकर परेशानी में यहां-वहां भटक रही हों। पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पर एक लाल बत्ती लगातार जलती-बुझती जा रही थी, जैसे उस बत्ती के तार आपस में मिल कर फिर से बिछुड़ रहे हों।… ओफ्फो! यह क्या हो रहा है मुझे इन दिनों! एयरपोर्ट पास ही है, शायद विमानों को रास्ता दिखाने के लिए उसे वहां लगाया गया होगा। हर चीज इस संसार में उसकी तरह अपनी जड़ों की तलाश में व्याकुल थोड़ी है? क्या यह उसकी अंतरात्मा का प्रश्न है, जो हल ढूंढने के प्रयास में जीवित और निर्जीव हर चीज में वह आजकल अपना उत्तर तलाशने लगा है। येन केन प्रकारेण उत्तर वही पाना चाहता है, जो उसके दिलो-दिमाग में पहले से विद्यमान है।  बचपन में जब वह मां से पूछती थी- ‘मां, मैं कहां से आई?’ मां हंसते हुए रागिनी का हाथ अपनी कोख पर रख कर कहती थी कि ‘देख रागिनी तू यहां से आई’ और रागिनी भी बहल जाया करती थी। मासूम-से सवाल का मासूम-सा उत्तर उसे आश्वस्त कर जाता था और वह मां की रानी बेटी बनी-बनी फिर से इठलाती हुई खेलने चल देती थी।

स्कूल-कॉलेज में भी जब सहेलियां वही पूछती थी कि ‘तुम्हारा नाम क्या है?’ वह कहती, ‘रागिनी कुमारी’।  थोड़ी खुसर-पुसर के बाद फिर कोई पूछती, ‘अच्छा तो तुम्हारे पिता का नाम क्या है?’, ‘तुम्हारा सरनेम क्या है? आई मीन वाट्स योर फुल नेम?… यानी कि तुम्हारा पूरा नाम क्या है?’ रागिनी घबरा कर कहती, ‘चलो भागो यहां से, मुझे पढ़ने दो, कल मेरी परीक्षा है। मगर यह प्रश्न कि ‘रागिनी, तुम्हारा पूरा नाम क्या है?’ रात भर उसका पीछा नहीं छोड़ता था। रात भर क्या, यह प्रश्न तो रागिनी की परछाई बन कर ताउम्र उसके साथ-साथ चलता आया है। दो वर्ष पहले जब वह लेक्चरर बन कर इस शहर में आई, तो वर्किंग वीमेंस हॉस्टल को ही उसने अपना आशियाना बना लिया था। इस शहर की हरियाली और शांति उसे बेहद सुकून देते हैं। झीलों की इस नगरी में महल, दुमहले छतरियों की बेजोड़ नक्काशी निहारती वह पूरे उदयपुर में घूमती रहती थी। इस अजनबी शहर से उसे लगाव हो गया था। सावन में फतेहसागर के लबालब होने पर पूरा उदयपुर इसके किनारे उमड़ पड़ता है। घर के किसी बुजुर्ग की भूमिका निभाता यह सागर आसपास की तमाम छोटी-बड़ी झीलों को भी अपने साथ-साथ लबालब करता चलता है। रागिनी को बड़ी हैरत होती है कि ऐसा क्या है इस सागर में कि यह ‘टॉक आॅफ द टाउन’ बन जाता है? हर अखबार, गली, मुहाल्ला, नुक्कड़, दफ्तर में लोग इसमें भर आए ल्युबिक वाटर की ही चर्चा करते रहते हैं। पूरा उदयपुर जैसे फतेहसागरमय हो जाता है। मोहित ने एक दिन बताया था कि उदयपुर वासियों के जीवन का एकमात्र सूत्र फतेहसागर से जुड़ा है। भरे-पूरे उदयपुर की प्यास बुझाता है यह।

मां तो वहीं देहरादून में रह गई थी। रागिनी को कभी-कभी बहुत अकेलापन सालने लगता है। हां, मगर जबसे मनोज उसकी जिंदगी में आया है, कम से कम अब यह शहर उसे बेगाना तो बिल्कुल नहीं लगता। मनोज की आंखों में झांकती है, तो सारा देहरादून पीछे छूटने लगता है। उसकी उपस्थिति से ही रागिनी के दिन पंख लगा कर उड़ने लगते हैं और रातें सपनीली हो उठती हैं। मां को बताया था उसने कि वह अपने सहकर्मी मनोज से विवाह करना चाहती है। मां को इस विवाह पर कोई आपत्ति नहीं हुई थी। इस बार की छुट्टियों में वे मनोज के परिवार से मिल कर विवाह की बातें भी तय करना चाहती थीं।  उधर मनोज के परिवार को भी कोई अड़चन नहीं थी इस विवाह से। उस दिन मनोज के पिताजी जरूर पूछ रहे थे, ‘रागिनी, अपने बेटे की पसंद में हमारी भी रजामंदी है, पर अपने माता-पिता के बारे में भी कुछ बताओ। कम से कम शादी से पहले एक बार उन्हें हमसे मिलवाओ तो सही।’ यकायक पूछे गए इस सवाल से रागिनी घबरा गई थी। वह इसके लिए तैयार नहीं थी, सो हड़बड़ा कर घर जल्दी जाने का बहाना बना कर वहां से निकल आई थी। पर रास्ते भर इस प्रश्न से हमेशा के लिए छुटकारा पाने के उपाय सोचती आई थी। उसने निर्णय कर लिया था कि अब इस प्रश्न से बच कर भागना उसके लिए नामुमकिन है, उसे कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। वह अपने नए जीवन की बुनियाद किसी दुराव-छिपाव की नींव पर नहीं रखना चाहती थी। उसने मां के पास देहरादून जाने का निर्णय कर किया था। बचपन में एक बार नानी को फोन करके अपने पिता के बारे में पूछने की हिम्मत की थी उसने। नानी ने चिढ़ कर फोन पटकते हुए कहा था, ‘क्या करेगी सब जान कर? तू प्रणय का ठीकरा है?’ और पूरी शाम रागिनी शब्दकोश लेकर ठीकरा शब्द का अर्थ खोजती रही थी। आखिरकार बस इतना समझ पाई थी कि नानी का मतलब किसी ‘वेस्ट मटिरियल’ यानी कचरा जैसी चीज से था। अभी कुछ दिन पहले ही छोटी मासी से पूछने पर उन्होंने बहुत सोचते हुए अटक कर कहा था, ‘…अब भई… कोई ऊंचे ही कुल के रहे होंगे तुम्हारे पिता।’ शायद मासी अपने उच्च कुल को जस्टिफाई करने की कोशिश कर रही थीं।

रागिनी फोन पर ही जोर से हंस पड़ी थी ‘यह मासी और मासी का समाज जाने किस युग में जी रहे हैं? अब भला कुलीनता का अवैधता से क्या वास्ता? क्या अवैधता का भी कोई स्तर होता है?… मगर प्रत्यक्ष रूप से वह मासी से कुछ नहीं कह पाई थी।देहरादून जाते वक्त रेलगाड़ी में पूरे सफर के दौरान रागिनी मन पक्का करती रही थी कि घर पहुंचते ही मां से आर या पार का जवाब लेगी। वह अब इस दुनिया से और अधिक देर तक भागना नहीं चाहती थी। घर में दाखिल होते ही उसने कराहने की आवाजें सुनी। वह सकते में आ गई थी। उसके होश उड़ गए थे। वह सामान फेंक कर सीधे मां के कमरे की तरफ दौड़ पड़ी थी। मां न जाने कब से इस तरह बीमार पड़ी थी। पूछने पर बोली कि ‘तू चिंता करती, इसलिए नहीं बताया, मैं ठीक हूं।’ पर रागिनी समझ चुकी थी कि अब कुछ ठीक नहीं होने वाला… मां कितनी पीली और दुर्बल लग रही थी! उसकी आंखों के आसपास स्याह घेरे फैले हुए थे, बरसों की थकान से लदी बरौनियां मुंदने से पहले आंखों से इजाजत मांग रही थीं। यों लग रहा था मानो सांसें सिर्फ रागिनी के इंतजार में अब तक अटकी हुई थीं। आखिरकार रागिनी ने मां से पूछा ही लिया था वह एक अहम प्रश्न, जो उसे जीवन भर परेशान करता रहा था- ‘…क्या तुम जीवन के इस पड़ाव पर भी पिताजी से मिलना नहीं चाहोगी? मुझे उनका नाम-पता ही बता दो, मैं उन्हें सूचित कर देती हूं। क्या पता तुम्हारी नाजुक हालत की खबर उन्हें यहां खींच लाए?’ मां इस कमजोर हालत में भी मुस्कुरा दी थी। वह बोली- ‘रागिनी, तेरी जड़ें मेरी कोख से उपजी हैं, तू किसी छलावे का पीछा न कर, सृष्टि का निर्माण ही सत्य है, किसने और कैसे किया यह प्रश्न निरर्थक है, तू सिर्फ मेरा अंश है।’

रागिनी को अपना प्रश्न फिर व्यर्थ जाता दिखाई दे रहा था। उसके हाथों से मां की कमजोर हो आई हथेलियों की पकड़ ढीली पड़ चुकी थी, वह समझ चुकी थी कि मां उसे हमेशा के लिए अनुत्तरित छोड़ कर जा चुकी थी। उसे अपने तमाम प्रश्न हवा में मंडराते नजर आ रहे थे… अब उसे अपने इन प्रश्नों से अकेले ही जूझना था। मां तो अब एक गहरी नींद में समा चुकी थी।
मां के क्रियाकर्म के बारहवें दिन बाद वापस उदयपुर लौट रही रागिनी इसी सोच में डूबी हुई थी कि मां चाहती तो उसे अजन्मा ही मसोस सकती थी। उसकी मां एक बहादुर औरत थी। उसने न जाने किन कमजोर क्षणों में उसे ग्रहण कर लिया होगा, पर फिर भी परिस्थितियों से सामना करते हुए न केवल उसे जन्म दिया, बल्कि इतना सशक्त भी बनाया। मां के ही प्रयत्नों से आज वह अपनी एक पहचान बना पाई थी। एक वह है, जो ताउम्र उनसे निरर्थक प्रश्न पूछ कर व्यथित करती रही। उसने मातृशक्ति को नमन किया।मां जाते-जाते भी उसका आत्मसम्मान बढ़ा गई थी। उसने दृढ़ निश्चय किया कि उदयपुर पहुंचते ही वह मनोज के पिताजी से स्पष्ट कह देगी कि उसे अपने पिता के बारे में कोई जानकारी नहीं, वे चाहें तो रिश्ता मंजूर करें या नहीं। रागिनी रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर देखने लगी। आसमान में मुस्कराता चांद उसे अपने साथ-साथ चलता हुआ प्रतीत होने लगा। वह घंटों तक उसे एकटक निहारती हुई यों ही बैठी रही… पता नहीं क्यों सफर की वापसी के वक्त उसे यह चांद कुछ ज्यादा ही उजला नजर आ रहा था, जैसे उसके विचारों पर जमी धुंध को धकिया कर बाहर आ निकला हो।

 

 

 

 

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