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कहानी: सिरफिरी

एकाएक आरती का नाम सुन कर मेरी आंखों की नींद उड़ गई।

Author January 15, 2017 1:54 AM

एकाएक आरती का नाम सुन कर मेरी आंखों की नींद उड़ गई। एक साल मेरे साथ रहने के बाद वह गांव चली गई थी। इस दौरान वह छह महीने तक जिंदगी और मौत से लड़ती रही। जब उसका हंसना, खिलखिलाना पहले की तरह फिर से शुरू हुआ, तो मैंने उसे गांव भेज दिया था। आरती के बारे में सोचते हुए मुझे वह दिन याद आया जब गांव जाने के बाद एक दिन मैं ननिहाल जा रहा था, तो प्यास से मेरा बुरा हाल था। उस वक्त आरती झरने पर पानी लेने आई हुई थी।

उसे देखते ही मैंने कहा, ‘प्यास लगी है, पानी मिलेगा।’
‘हां मिलेगा।’
मैंने जैसे ही अपनी हथेली अपने मुंह पर लगाई, वह अपनी कसेरी से मेरी हथेली में पानी डालने लगी। उसे कसेरी हटाने के लिए मैंने अपना सिर हिलाया तो वह कसेरी का पूरा पानी मेरे ऊपर डालते हुए वह जोर-जोर से हंसने लगी। उसे हंसता देख कर मुझे लगा कि शायद यह पागल है। पर जब उसकी हंसी नहीं रुकी तो मैं भी जोर-जोर से हंसने लगा। एकाएक मुझे हंसता देख कर बोली, ‘तू क्यों हंसा?’
‘तू क्यों हंसी?’
‘हमारे गांव का उसूल है। जब कोई झरने पर आकर पानी मांगता है तो बाकी के बचे पानी से उसे नहलाना पड़ता है।’
‘हमारे गांव का भी एक उसूल है कि जब कोई लड़की पहली बार पानी डाले तो उससे शादी कर लेनी चाहिए।’
‘तो तू मुझसे शादी करेगा?’
‘हां…।’
‘ऐ कमला, ऐ बिमला, ऐ सकोती, ऐ देवी, इधर आना।’ कुछ दूरी पर पेड़ की छाया में बैठी लड़कियों को आवाज देकर उसने पुकारा, तो वे सब उसके पास आकर बोलीं, ‘क्या हुआ? छेड़ा इसने क्या?’
‘नहीं… मुझसे शादी करना चाहता है।’

‘तो कर ले न! अच्छा है, सुंदर है, गोरा है, जोड़ी बहुत अच्छी है।’ कह कर खिलखिलाती वे सभी लड़कियां उसे छेड़ने लगीं। पता नहीं, मुझे क्या हुआ कि मैंने उसकी पानी भरी कसेरी उसी के ऊपर उलट दी। एकाएक ठंडा पानी पड़ने से वह चिल्लाई ‘उई मां’ और फिर वह जोर-जोर से सांसें लेने लगी थी। मुझे लगा कि उसकी सांसें अब अटकी, तब अटकी। जबकि उसकी सहेलियां ताली बजाती हुई बोलीं, ‘मिला न सेर को सवा सेर! अब बता… लड़का ठीक है न?’
आरती उन्हें चिढ़ाते हुए, अपनी कसेरी लेकर चली गई। लड़कियां हंसती हुई मेरी ओर देख कर बोलीं, ‘पागल…!’
ननिहाल की ओर बढ़ते हुए मैंने देखा कि आरती बार-बार पीछे मुड़ कर मुझे देखती जा रही है। मुझे उसका मुड़-मुड़ कर देखना बहुत अच्छा लग रहा था।
शाम के वक्त मैं श्यामू के साथ घूमने निकला तो वह फिर मुझे झरने पर दिखाई दी। मुझे देख कर उसने मुंह बनाते हुए श्यामू से कहा, ‘ऐ श्यामू, ये कौन है?’
‘मेरी बुआ का लड़का है, दिल्ली रहता है।’

‘परेदशी है…!’
अचानक मेरे मुंह से निकला, ‘वाह! कितनी सुंदर है।’
‘क्या कहा तूने?’ श्यामू ने मेरी ओर देखते हुए कहा।
‘मैं कह रहा था कि यह झरना कितना सुंदर है।’
मेरे शब्दों को सुन कर हंसते हुए वह बोली, ‘पागल… सुनाता मुझे है और कहता झरने को है।’ कसेरी को एक हाथ से पकड़े वह मेरी ओर देखते हुए बोली, ‘श्यामू मेरी कसेरी मेरे सिर में रखवा दे न?’
उससे पहले कि श्यामू उसकी कसेरी पर हाथ लगाता, मैंने कसेरी को उसके सिर पर रखते हुए कहा, ‘झरना इतना सुंदर नहीं, जितनी तुम हो।’
वह मुस्कराती हुई चली गई और मैं अपनी जगह खड़े-खड़े उसको जाते हुए देखने लगा तो श्यामू ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘सुंदर है न?’
‘हां… सचमुच इन पहाड़ों में इस जैसी खूबसूरत कोई नहीं है।’
श्यामू मुस्करा दिया। शाम को जब अंधेरा घिरने लगा तो श्यामू मुझे उसके घर ले गया। मुझे देख कर आरती के चाचा ने श्यामू से पूछा, ‘श्यामू ये तेरे साथ कौन है?’

‘मेरी बुआ का लड़का है, दिल्ली में रहता है, मिलने आया है। मैंने सोचा कि सारा गांव घुमा दूं।’
‘बहुत अच्छा किया तूने। आरती कुर्सी ला, और चाय बना बेटा?’
आरती कुर्सी रख कर चाय बनाने फिर से ओबरे में चली गई।
कुछ ही देर बाद वह गिलासों में चाय ले आई थी। चाय का घूंट लेते ही मैं झनझना गया था। चाय में चीनी की जगह मिर्ची थी। हकीकत जानने के लिए मैंने श्यामू के कान में धीरे से कहा, ‘चीनी कुछ ज्यादा हो गई है।’
‘नहीं, ठीक ही है। हम लोग इतनी ही मीठी पीते हैं।’
चाय में मिर्च इतनी तेज थी कि मेरी आंखों से आंसू निकल गए। कई बार मन में आया कि पानी मांगू, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा सका। जब नहीं रहा गया तो मैंने पानी मांगा।
‘बेटा चाय के ऊपर पानी नहीं पीना चाहिए।’ आरती की मां ने कहा।
‘दरअसल, मैं इतनी ज्याद मीठी चाय नहीं पीता। ऐसा लग रहा है कि जैसे जीभ तालू से चिपक गई है।’
‘आरती पानी लेकर आ…।’ आरती की मां ने उसे आवाज देते हुए कहा, ‘पता नहीं कब इसे अकल आएगी? कितनी बार इसे समझाया है कि जब घर में कोई आता है, तो चीनी कम डाला कर। लेकिन यह अपनी हठ नहीं छोड़ती।’
‘मुझे क्या पता कि कौन कितनी मीठी चाय पीता है?’
उसकी बातें सुन कर मुझे गुस्सा आ रहा था। मेरा मिर्च के कारण बुरा हाल हो रहा था और वह खुश होकर किसी पहाड़ी चिड़िया की तरह चहकते हुए मिर्च का पहाड़ा पढ़ रही थी। मिर्ची एकम मिर्ची, मिर्ची दुना दो मिर्ची…।

और फिर मैं उठ खड़ा हुआ। आधे रास्ते आने पर श्यामू ने कहा, ‘भैया आप बार-बार रुमाल से अपना मुंह क्यों दबा रहे थे?’
मैंने श्यामू को जब हकीकत बताई तो वह भी आरती की तरह जोर-जोर से हंसते हुए बोला, ‘वाह! क्या कमाल की लड़की है, मजा आ गया।… बड़ा मजेदार इश्क रहा भैया। पहली मुलाकात में ही झरने से लेकर आंगन और आंगन से लेकर ओबरे तक पहुंच गए।’
‘ओए… ओबरे तक कौन गया?’
‘भैया, नमक मिर्च तो ओबरे में ही रहता है न, अब मिर्च का स्वाद ले लिया तो समझो कि ओबरे में पहुंच गए!’
‘तू कहना क्या चाहता है?’

‘वाह भैया, उल्टा चोर कोतवाल को डांटे। इतना जान लो कि प्यार में लक्कड़-पत्थर सब हजम। अपने प्यार के लिए वक्त आने पर मिर्च क्या, जहर भी पीना पड़ता है।’श्यामू की बातें सुन कर मैं तिलमिला गया। घर पहुंचते ही उसने मामी से कहा, ‘मां, भैया की और मेरी मिर्च खाने की शर्त लगी थी। भैया ने पूरी दो मिर्चें खा ली हैं। उनके मुंह और पेट में बहुत जलन हो रही है।’मामी ने बिना कोई प्रश्न किए दही का बर्तन और चीनी मेरे सामने रखते हुए कहा, ‘सारी की सारी दही चीनी मिला कर पी जा। दूसरा बर्तन भी दही से भरा है, पी लेना।’

दही पीने के बाद मुंह की जलन शांत हो चुकी थी। उसके बाद तो मैं पूरा एक हफ्ता ममकोट में ही रुका रहा। फिर आरती के साथ-साथ उसके चाचा परू से भी मेरी दोस्ती हो गई थी। एक हफ्ते बाद वापस घर आने के तीन दिन बाद मैं दिल्ली चला आया था। उन तीन दिनों में मुझे खोया-खोया देख कर नलनी ने जब इसका कारण पूछा तो मैंने उसे आरती के बारे में बताया। उसने हंसते हुए कहा, ‘वाह भैया, मेरी सहेली को ही दिल दे आए। अगर प्यार हो गया तो देर किस बात की, चट मंगनी और पट ब्याह।’

मैं सोच में डूबा था। गांव से आने के बाद मुझे अभी एक साल हुआ था कि एक दिन नलिनी ने मुझे फोन पर कहा, ‘आरती बहुत भयानक दौर से गुजर रही है भैया। उसके माता-पिता ने उसे अपनी गोशाला में रखा हुआ है। उसकी मां उसे वहीं खाना दे आती है। लोग कह रहे हैं कि उस पर किसी प्रेत का साया है। एक दिन जब मैं नानी के घर गई तो मुझे प्रेत और जिन्न का भय बता कर आरती से मिलने नहीं दिया गया। मैं वहां तीन दिनों तक रही। उन तीन दिनों में मैं रात को आरती के साथ ही रही। सच कहूं तो इस वक्त उसे आपकी सख्त जरूरत है भैया। मुझे नहीं लगता कि उस पर किसी प्रेत या जिन्न का साया है। मुझे ऐसा लगता है कि वह किसी ऐसी बीमारी से ग्रस्त है, जिसका इलाज यहां नहीं है। आप आरती से प्यार करते हैं, तो उसे बचाने के लिए कुछ कीजिए। झाड़खंडियों की मार ने उसे बेहाल कर दिया है। एक झाड़खंडी ने तो उसे लाल मिर्चों की धूनी तक दे दी। उस रात मैं और श्यामू उसके साथ ठंडी हवा में बाहर बैठे रहे तब कहीं उसकी जान बची। अगर इसी तरह इन झाड़खंडियों का इलाज चलता रहा तो वह कुछ ही दिनों में मर जाएगी।’

नलनी की बातें सुन कर आरती की हंसी, उसका खूबसूरत चेहरा और उसके साथ बिताए दिन मुझे झिंझोड़ने लगे थे। अवश्य वह ऐसे समय मुझे याद कर रही होगी। दिल्ली आने के बाद श्यामू से मैं लगातार बातें करता रहा, लेकिन उसने कभी मुझे आरती की तबियत के बारे में नहीं बताया। मगर नलिनी का फोन आने के बाद जब मैंने उसे डांटते हुए सच्चाई बताने को कहा तो उसने कहा कि, ‘आरती की कई महीनों से तबियत खराब चल रही है। लगातार वैद्य कक्का की दवाइयों से भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है बल्कि उसकी तबियत दिन-प्रतिदिन और ज्यादा खराब होती जा रही है। एक दिन एक जोगी गांव में आया तो उसने बताया कि इस लड़की पर प्रेत के साथ-साथ जिन्न का साया है। जिस घर में यह लड़की रहेगी उस घर में प्रेतों का वास होगा, उस घर का सर्वनाश हो जाएगा, गांव में जिस पर भी इसका साया पड़ेगा वह बे-मौत मरेगा।’ उस दिन से आरती के घर वालों ने उसे गौशाला में रख दिया है। श्यामू की बातें सुन कर मैंने उसे समझाते हुए कहा, ‘अगर परू अपने घर वालों को समझाए तो मैं आरती को दिल्ली लाकर उसका इलाज करवाना चाहता हूं। तुम एक बार उससे बात करके देखो।’

रात को श्यामू ने जब परू से मेरी बात कराई तो पहले वह अकड़ने लगा था। एक जवान लड़की को हम आपके पास कैसे भेज सकते हैं, वगैरह। लेकिन जब मैंने उसे बताया कि हो सकता है कि आरती को कोई गंभीर बीमारी हो, जिसका इलाज वैद्य के पास नहीं है। अगर उसे कुछ हो गया तो उसके जिम्मेवार तुम होगे। अगर तुम आरती को बचाना चाहते हो तो तुम्हें मेरी मदद करनी होगी। ताकि मैं उसे दिल्ली लाकर उसका इलाज करवा सकूं।’  कुछ देर शांत रहने के बाद परू ने फोन पर अपनी स्वीकृति दे दी। मैंने उसी वक्त नलनी को फोन पर हकीकत बताते हुए कहा कि वह आरती को दिल्ली आने के लिए तैयार करे। मैं तीन दिन बाद सीधे आरती के पास ही पहुंचूंगा, ताकि मां और पिताजी को यह पता न चले कि मैं गांव आया था।

मैं ठीक तीन दिन बाद आरती के पास पहुंच गया था। मुझे देखते ही आरती के नीरस चेहरे पर बुझी-बुझी और निर्जीव मुस्कान तैर गई। वह लेटी-लेटी मुझे टुकुर-टुकुर देखती रही। जैसे ही मैंने उसके चेहरे पर अपना हाथ रखा, उसकी आंखें बहने लगीं।तभी श्यामू के साथ परू और आरती के माता-पिता भी आ गए। उन्हें समझाने के बाद हम आरती को लेकर बस अड््डे के लिए निकले। खुशी इस बात की थी कि नलनी के साथ-साथ आरती के माता-पिता भी हमें बस अड््डे छोड़ने आए थे। दिल्ली आने के बाद मैंने आरती को अपने पास के ही एक क्लीनिक में दिखाया, खून की जांच आने के बाद डॉक्टर ने बताया कि आरती को टीबी है और वह खतरनाक स्थिति मैं है।’ डॉक्टर की बातें सुन कर मैं सन्न रह गया। पलभर की देर किए बिना मैंने आरती को दिल्ली के एक बड़े टीबी अस्पताल में भर्ती करा दिया। उसके खून, बलगम और थूक की जांच होने के बाद उसे इंजेक्शन लगने शुरू हो गए थे। डॉक्टर का कहना था कि उसे एमडीआर टीबी हो चुकी है।  इस बीच मैंने आरती की मां को भी दिल्ली बुला लिया। आरती को अस्पताल में देख कर और उसकी हालत में सुधार देख कर उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। एक महीने के बाद उसे अस्पताल से छुट््टी देते हुए डॉक्टर ने कहा, ‘बाकी इंजेक्शन इसे रोज नियमित रूप से घर में लगाएं, और रोज इसका बुखार और वजन चैक करते रहें। महीने में एक बार इसे ओपीडी में जरूर लाएं।’

एक साल तक मेरे पास रहने के बाद आरती गांव चली गई थी। उसे गांव गए तीन महीने से ऊपर हो चुका था। पर आज नलनी ने लगातार फोन करते हुए मुझे परेशान कर दिया। वह फोन करती और फिर फोन कट जाता। रात के दो बजे दुबारा जब फिर नलनी का फोन आया तो मैंने उसे डांटने के अंदाज में कहा, ‘ये चुटिया की चोटी, फोन मत काटना। तूने आज मुझे परेशान कर दिया है, बोल क्या बात है?’‘भैया आरती के साथ आपका रिश्ता तय हो गया है। अगले हफ्ते आपकी सगाई का दिन निकला है… सुबह होते ही गांव चले आओ।’ ‘ऐ झूठी…! घर आकर तेरी चुटिया पकड़ कर चक्कर घिन्नी की तरह घुमा दूंगा।’
‘मत आओ, लेकिन बाद में पछताना नहीं। फिर मैं फोन रखूं?’‘ऐ चुटिया की चोटी, तेरे फोन की घंटियों ने मेरी नींद उड़ा दी है, और तू मुझे चिढ़ा रही है।’ ‘नींद तो आपकी आरती ने चुरा ली है भैया। जैसे तुम बचपन में दही चुराया करते थे। ये लो बात कर लो?’उसके बाद दूसरी तरफ से आरती की आवाज सुनाई दी। जब आरती ने मुझे बताया कि सगाई का दिन निकल आया है, तो मैं खुशी से उछल पड़ा। अचानक मेरे हाथ से फोन छिटक कर दूर गिर पड़ा और उसका कवर, उसकी बैटरी, सब अलग-अलग हो गए। स्क्रीन में दरारें पड़ चुकी थीं। मैंने घड़ी में समय देखा तो अचानक मेरे मुंह से निकला, ‘ओ माई गॉड! पहली बस तो पांच बजे की है।’ और फिर मैं गांव जाने के लिए अपना जरूरी सामान अटैची में ठूंसने लगा था।

 

 

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