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कहानीः घोष बाबू का स्कूल

सुबह उठ कर घंटा-दो घंटा पढ़ने के बाद थोड़ी देर बाहर लॉन में टहलना घोष बाबू का रोज का नियम है। अकसर वे बाहर टहल रहे होते हैं, तभी मिल्दू आता है।
Author April 15, 2018 00:55 am

प्रकाश मनु

सुबह उठ कर घंटा-दो घंटा पढ़ने के बाद थोड़ी देर बाहर लॉन में टहलना घोष बाबू का रोज का नियम है। अकसर वे बाहर टहल रहे होते हैं, तभी मिल्दू आता है। घरों का कूड़ा उठाने के लिए। ‘कूड़ा…!’ उसकी रोज की आवाज एक साथ कई घरों में गूंजती है।
कुछ लोग उसी समय उठ कर झटपट ताला खोलते हैं। जल्दी से दरवाजा खोल देते हैं, मगर कुछ मिल्दू के घंटी बजाने पर भी देर तक बेपरवाह सोए रहते हैं। कहीं-कहीं दो-दो, तीन-तीन बार घंटी बजानी पड़ती है। मिल्दू को हर घर का पता है। कौन-सा घर सुबह जागा होता है, कौन-सा आलस में पसरा, सोया-सोया सा। और कौन-सा गहरी नींद में डूबा।
पर घोष बाबू के यहां मिल्दू को कोई मुश्किल नहीं थी। क्योंकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह आया हो और घोष बाबू का बाहर का दरवाजा बंद हो। बल्कि कभी-कभी तो ऐसा लगता, जैसे घोष बाबू टहलते हुए उसी का इंतजार कर रहे हैं।
मिल्दू के आते ही घोष बाबू बड़े प्यार से कहते, ‘आओ बेटा…!’
एक-दो बार उन्होंने नाश्ता करते हुए मिल्दू से बात करने की भी कोशिश की, पर मिल्दू संकेत में जवाब देता, फिर आगे अपने काम पर निकल जाता। जैसे उसकी इस तरह के सवालों में कोई दिलचस्पी न हो।
एक बार घोष बाबू जब नाश्ता कर रहे थे तो उन्होंने मिल्दू को प्लेट में पड़े बिस्कुट उठा कर खाने को दिए। कहा, ‘लो बेटा, खा लो।’ पर उसने मना कर दिया। बोला, ‘रहने दीजिए बाबू जी, ऐसे ही ठीक हूं।’
घोष बाबू को अचरज हुआ। वे फिर से मिल्दू के बारे में सोचने लगे। सोचते, ‘देखो, कपड़े कितने मामूली हैं, फटे-पुराने। लेकिन बोलना-चालना इसका…! सबमें कुछ नफासत है। जैसे काफी समझदार हो। अपनी उम्र से ज्यादा समझदार। फिर इनकार भी किया तो किस तरह?… सचमुच यह लड़का कुछ अलग-सा है। इसमें कुछ अलग बात है।’
वह इतवार का दिन था। घोष बाबू को आज दफ्तर नहीं जाना था। मिल्दू कूड़ा उठाने आया। कूड़ा उठा कर जाने लगा तो घोष बाबू ने उसे पुकारा, ‘मिल्दू, कुछ काम है तुमसे। कब फ्री होगे?’
‘कौन-सा काम?’ मिल्दू चौंका। जैसे बात का सिरा न पकड़ पा रहा हो।
‘वह तो बाद में बताऊंगा। पर पहले बताओ, तुम्हारा यह काम कब तक खत्म हो जाएगा। फिर कोई और काम तो नहीं है।’ घोष बाबू की आंखें मिल्दू के चेहरे पर टंगी थीं।
पता चला, कोई बारह-साढ़े बारह बजे तक मिल्दू सब घरों का कूड़ा उठाता है और उसे शहर के बाहर वाले बड़े कूड़ेदान में डाल कर घर पहुंच जाता है। नहाता-धोता, नाश्ता करता है और कोई एक बजे बिल्कुल फ्री हो जाता है। फिर शाम को पांच-साढ़े पांच बजे उसे कहीं और भी काम पर जाना होता है।
‘तो ठीक है, साढ़े बारह या एक बजे सही। थोड़ा-सा काम है आ जाना।’ घोष बाबू ने कहा।
‘ठीक है, बाबू जी!’ कह कर मिल्दू चला गया। कुछ-कुछ अपनी उधेड़-बुन में खोया-सा।

दोपहर को मिल्दू आया, तो सुबह से काफी कुछ अलग लग रहा था। नहाया-धोया हुआ, साफ-सुथरा। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की दीप्ति थी।
‘हां, बाबू जी, बताइए?’ उसने गंभीरता से कहा।
घोष बाबू मुस्कराए। बोले, ‘बैठो, काम भी बताता हूं। पर पहले दो-चार बातें तो कर लें।’
अब मिल्दू थोड़ा निश्चिंत-सा, आराम से बैठ गया और बातें चल निकलीं।
पता चला कि मिल्दू के पिता नहीं हैं। कोई पांच साल हुए वे गुजर गए। मिल्दू तब सात-आठ साल का रहा होगा। तभी से वह यह काम कर रहा है। घर में मां हैं, एक छोटी बहन भी। वे भी यही काम करती हैं।
‘क्या हमेशा यही काम करते रहोगे?’ घोष बाबू ने पूछा और गौर से मिल्दू की आंखों में देखने लगे।
मिल्दू ने हैरानी से घोष बाबू की ओर देखा कि वे कहना क्या चाहते हैं?
‘इसलिए कह रहा हूं मिल्दू कि जिस फैक्टरी में मैं काम करता हूं, उसमें भी तुम्हें काम मिल सकता है। क्या नहीं करना चाहोगे? मैं मैनेजर साहब से कह दूंगा, वे तुम्हें रख लेंगे। तनख्वाह अच्छी है, और काम भी कुछ अलग सा…!’
‘पर… पर साहब, ये कैसे?’ मिल्दू कुछ हैरान हुआ।
‘कुछ खास नहीं। मैं मैनेजर साहब से कह दूंगा तो वे रख लेंगे। उन्हीं के हाथ में है सब कुछ। सारी नियुक्तियां वही करते हैं। मेरा कहना मान लेते हैं। इसलिए जरा भी मुश्किल नहीं है।… तुम यकीन मानो।’ घोष बाबू ने एक बार फिर दोहराया।
इस बार मिल्दू की आंखों में चमक दिखाई दी। ‘सच…?’ उसने अंदर की खुशी छिपाते जैसे कहा।
‘हां, सच… बिल्कुल सच।’ मिल्दू के चेहरे पर अचानक आई रौनक देख कर घोष बाबू इतने खुश हुए, मानो उन्हें कोई खजाना मिल गया हो।
‘पर साहब, वह कैसे?’ थोड़ी देर बाद मिल्दू फिर पूछ रहा था। जैसे अंदर ही अंदर कुछ टटोल रहा हो।
‘वही तो बता रहा हूं।’ घोष बाबू हंस कर बोले, ‘काम तुम्हें मिल सकता है। बल्कि निश्चित मिल जाएगा। और इससे बहुत अच्छा काम होगा। पर अभी नहीं, तुम्हें उसके लिए पढ़ना होगा।’
सुन कर मिल्टू के चेहरे की खुशी कुछ-कुछ तिरोहित हो गई। वहां अब उलझन नजर आ रही थी। जैसे पास आई हुई चीज अचानक दूर चली गई हो।
‘अच्छा मिल्दू, तुम कितनी जमात पढ़े हो?’ घोष बाबू ने पूछा।
‘कक्षा चार, बाबू साहब। उसके बाद तो पढ़ाई छूट ही गई…!’ कहते हुए मिल्दू के चेहरे पर मलाल था। एक उदासी का तार अंदर-अंदर काटता हुआ।
‘तो क्या हुआ, मैं पढ़ाऊंगा।’ घोष बाबू ने कहा, ‘एक साल बाद तुम पांचवीं का इम्तिहान दे देना। फिर आगे हाईस्कूल तक तो तुम्हें पढ़ना ही चाहिए। प्राइवेट भी हाईस्कूल का इम्तिहान दे सकते हो। काम करते रहो और पढ़ते भी रहो।… पर तुम चिंता न करो, पढ़ाऊंगा मैं और किताबें भी दूंगा। यह जिम्मा मेरा।’
‘अच्छा, बाबू जी…?’ मिल्दू को यकीन नहीं हो रहा था।
‘हां-हां, तुम क्या सोच रहे हो? मैं क्या खाली कहने के लिए कह रहा हूं?’ घोष बाबू के चेहरे पर कोई अलग ही बात थी, जिसने मिल्दू को रिझा लिया।
‘पर यह काम…?’ उसने घोष बाबू ने पूछा। फिर खुद ही कहा, ‘यह तो जरूरी है, वरना तो साहब, हमारा घर नहीं चल सकता।’
‘हां-हां, तो इसे छोड़ने के लिए मैं कब कहता हूं?… तुम इसे करते रहो, बस मेरे पास शाम के समय आ जाया करो। रोजाना कोई दो-ढाई घंटे पढ़ा दिया करूंगा और इतवार को जब मेरी छुट्टी रहती है, दोपहर को भी आ सकते हो।… उस दिन थोड़ी ज्यादा पढ़ाई हो जाएगी।’ घोष बाबू ने समझाया।

उसके बाद मिल्दू रोजाना घोष बाबू के घर आने लगा। खूब ध्यान से पढ़ने-लिखने लगा। घोष बाबू जो कुछ पढ़ाते, उसे वह बहुत जल्दी समझ लेता। याद भी कर लेता। घोष बाबू समझ गए कि उनके सामने एक अनगढ़ पत्थर है, पर वे उसे तराशेंगे, तो उसकी चमक दूर तक दिखाई पड़ेगी। वे उसे खेल-खेल में ही पढ़ाते। बीच-बीच में खूब हंसाते। मिल्दू कभी इतना नहीं हंसा था। पर घोष बाबू का तरीका ही खूब हंसा-हंसा कर पढ़ाने का था। कहानी-किस्सों और मजेदार कविताओं के जरिए ही वे जीवन की बड़ी-बड़ी गूढ़ बातें समझा देते। ज्ञान-विज्ञान की बातें भी कहानियों की शक्ल में पेश करते तो मिल्दू झट से उन्हें याद कर लेता। खुद भी आगे सोचता। पहली बार उसके दिमाग के जंग लगे ताले खुले थे।
मिल्दू सोचता, ‘पढ़ाई-लिखाई इतनी मुश्किल चीज तो नहीं है। मैं तो बेकार ही डर रहा था।’
और घोष बाबू सोचते, ‘मिल्दू बहुत जल्दी पढ़ाई-लिखाई की दुनिया में चल निकला है। ऐसे ही यह सरपट दौड़ता रहा तो एक दिन…!’
फिर एक बार घोष बाबू ने मिल्दू से कहा, ‘मिल्दू, इस इतवार को मैं तुम्हारे घर आऊंगा।’
मिल्दू को यकीन नहीं आया। बोला, ‘सच्ची, मास्टर जी?’
‘हां सच्ची, एकदम सच्ची।’ घोष बाबू बोले, ‘मैं तुम्हारे घर आऊंगा। वहीं तुम्हें पढ़ाऊंगा। साथ ही तुम्हारा घर भी देख लूंगा।’
मिल्दू को यकीन नहीं हो रहा था कि इतनी बड़ी कोठी में रहने वाले घोष बाबू कभी उसके घर आएंगे। पर इतवार आया तो सचमुच घोष बाबू मिल्दू के घर जा पहुंचे। मिल्दू बड़े संकोच में था कि उन्हें कहां बैठाए? कैसे उनका सत्कार करे?
पर घोष बाबू तो अपने आनंद में थे। वे मिल्दू के घर के सामने बिछी चारपाई पर ही बडे ठाठ से बैठे। बीच में अंदर जाकर उसका घर भी देखा। मिल्दू की मां से बड़े आदर से मिले। उसकी छोटी बहन रेखा ने चाय बनाई तो वहां बैठ कर चाय भी पी। और रेखा बिटिया के हाथ की बनी चाय की प्रशंसा करना भी नहीं भूले।
फिर घोष बाबू ने मिल्दू को उसके घर के आगे एक पेड़ के नीचे बैठ कर पढ़ाया, तो देख कर आसपास के और बच्चे भी आ गए। उनमें से ज्यादातर स्कूल नहीं जाते थे। सबकी हालत मिल्दू जैसी ही थी। मिल्दू ने सबको बता रखा था घोष बाबू के बारे में। घोष बाबू को देखा तो वे बच्चे पहले तो शरमाए, फिर हिम्मत करके पास आकर खड़े हो गए। बोले, ‘मास्टर जी, हम भी आ जाएं?’
‘अरे, आओ-आओ, यह तो खुला स्कूल है। यहां कोई हाजिरी नहीं, कोई फीस नहीं। हर किसी का स्वागत है!’
देखते-ही-देखते वहां पंद्रह-बीस बच्चे इकट्ठा हो गए। उनकी खुशी, उनकी उमंग और उत्साह का ठिकाना न था। इतने बच्चों को देख कर घोष बाबू भी उत्साहित थे। बच्चों के उत्साह ने उनका उत्साह और बढ़ा दिया था। घोष बाबू को लगा, वे तो एक मिल्दू की तलाश में आए थे, पर यहां तो एक नहीं कई मिल्दू हैं।
तो अब तय हुआ कि घोष बाबू हर इतवार को यहां आकर पढ़ाया करेंगे, ताकि मिल्दू के साथ-साथ बस्ती के और बच्चे भी पढ़-लिख लें। बाकी दिनों में मिल्दू शाम के वक्त घोष बाबू के घर जाकर पढ़ आया करेगा। जो कुछ सीखेगा, वह बस्ती के दूसरे बच्चों को भी सिखाएगा।
घोष बाबू का स्कूल चल पड़ा।

बस्ती के बच्चों में पढ़ने-लिखने की खासी ललक पैदा हो गई थी। अब तो घोष बाबू और उनकी पत्नी मिताली पढ़ाने आते तो पूरा मैदान बच्चों से भरा होता। कभी-कभी तो इतने ज्यादा लोग हो जाते कि पढ़ाने-लिखाने में भी दिक्कत होने लगी।
घोष बाबू को एक तरीका सूझा। उन्होंने सोचा, ‘मिल्दू को जल्दी से पढ़ा-लिखा दिया जाए, तो वह बड़ा काम कर सकता है। वह दूसरों को तो पढ़ाएगा ही, पूरी बस्ती में भी जागृति की लहर पैदा हो सकती है।’
घोष बाबू ने मिल्दू से कहा, ‘देखो मिल्दू, मेरा रिटायरमेंट अब नजदीक आ गया। दो-तीन महीने की छुट्टियां बची हुई हैं। सोचता हूं, ले लूं। तो अब मेरे पास ज्यादा समय होगा। तुम चाहो तो ज्यादा देर तक पढ़ लो, ताकि हाईस्कूल तक का कोर्स तुम्हारा जल्दी से खत्म हो जाए। फिर इम्तिहान जब होगा, दे देना।’
मिल्दू के लिए यह दुगनी खुशी की बात थी। एक तो उसे नई जिम्मेदारी मिल रही थी। दूसरे, तेजी से पढ़-लिखकर आगे निकलने का अवसर भी। उसे भला इसमें क्या आपत्ति होती? उसने खुशी-खुशी हां में सिर हिला दिया।
मिल्दू दो-तीन महीने में ही खासा पढ़-लिख गया। तो अब वह खुद भी बस्ती के बच्चों को थोड़ा-बहुत पढ़ा दिया करता। इतवार को घोष बाबू और मिताली पढ़ाने आते और बोलते-बोलते थक जाते तो बीच में मिल्दू खड़ा हो जाता। वह सब बच्चों को पढ़ाता, उनकी कॉपियां चेक करता और उन्हें नए जीवन की सीख देने वाली बातें भी बताता।
धीरे-धीरे समय बीता। मिल्दू ने हाईस्कूल की परीक्षा पास कर ली। अच्छे नंबर आए तो घोष बाबू के कहने पर इंटरमीडिएट में दाखिला ले लिया। इंटरमीडिएट में वह और ज्यादा उत्साह से पढ़ा। घोष बाबू ने भी उसकी तैयारी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मिल्दू इस बार फर्स्ट डिवीजन में पास हुआ।
घोष बाबू ने उसे छाती से लगा लिया। फिर कहा, ‘मुझे खुशी है, मैंने तुम्हारी आंखों में जो प्रकाश देखा, तो वह आज तुम्हारे पूरे जीवन में फैल गया है। पर यह प्रकाश केवल तुम्हारे जीवन में न रहे, बल्कि बस्ती के सब बच्चों तक पहुंचना चाहिए।… मेरी इच्छा है कि बस्ती के बस बच्चों को पढ़ाओ। हम एक स्कूल खोलते हैं। वहां कोई फीस नहीं ली जाएगी। हर बच्चा एडमिशन ले सकता है। वहां मुफ्त किताबें मिलेंगी, मुफ्त पढ़ाई। और अध्यापक का जिम्मा तुम्हें लेना पड़ेगा। तुम्हारा वेतन मैं दूंगा और स्कूल चलाने का खर्च भी।… और हां, साथ ही साथ आगे की पढ़ाई भी करते रहो। तुम्हें पढ़ाने का जिम्मा मेरा।’
और घोष बाबू और मिल्दू की कोशिशों से बड़ी जल्दी वह स्कूल खुल गया, जिसका नाम था- नवप्रभात स्कूल।

अब मिल्दू की हालत यह थी कि जैसे उसे पंख लग गए हैं। जब से यह स्कूल खुला था, रात-दिन वह इसी के बारे में सोचता और रहता भी यहीं था। वही इस स्कूल का प्रिंसिपल भी था, कर्ता-धर्ता भी। घोष बाबू और मिताली कहते, ‘इन साधारण बच्चों को पढ़ाते हुए इतना सुख मिलता है कि हम नहीं जानते, स्वर्ग का सुख क्या होता है?’
मालूम पड़ा, घोष बाबू का एक ही बेटा है मुक्तेश, जो इंजीनियरिंग पढ़ने अमेरिका गया और फिर वहीं बस गया। वहीं उसने अंजिका नाम की लड़की से विवाह कर लिया। एक छोटा सा बच्चा भी है- कीर्तिसंभव। विवाह के बाद बेटे से बस, इतना संबंध रह गया है कि वह साल में एक बार आ जाता है मिलने अंजिका और संभव के साथ।
घोष बाबू अपने बेटे-बहू और पोते से कम प्यार करते हों, ऐसा नहीं। पर उनके जीवन में बहुत कुछ खाली-खाली सा छूट गया था। वहां कोई धड़कन नहीं थी, भावनाओं की कोई हलचल नहीं। सब कुछ रीता-रीता सा। उस खालीपन को भरा मिल्दू और लिखने-पढ़ने के लिए उत्सुक गरीब बच्चों की टोली ने। वे सबसे कहते हैं, ‘अब तो यही हैं मेरी आशा के केंद्र। इन्हीं में मेरा मन रमता है।’ ०

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