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कहानी- समय की गठरी

सुबह से दोपहर तक दोनों ने आधा खेत साफ कर दिया। धूप तेज हो रही थी। फुलणू घास की गैस से सिर चकराने लगा। बापू उठे और घर की ओर चल पड़े। अम्मा भी उनके पीछे से चल पड़ीं।
Author November 5, 2017 00:40 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

मुरारी शर्मा 

नीला फुलणू बड़ी ही नकटी घास है। जितनी उखाड़ो उतनी ही फैलती है। जबसे ये खरपतवार गांव की मिट्टी में शामिल हुए हैं, लोगों की उपजाऊ जमीन बंजर और खेत उजाड़ हो गए हैं। ऐसी बेकार बदबूदार घास है, जिसे न तो डंगर खाते हैं और न ही किसी काम में लाई जा सकती है। उस रोज अम्मा और बापू घर से थोड़ी दूर नाले वाले खेत से नीला फुलणू निकाल रहे थे। उनकी अवस्था ऐसी हो गई है कि उन्हें पता ही नहीं चलता है कि अपने खेत में काम कर रहे हैं या दूसरे के में। उस दिन भी अपनी तरफ से तो दोनों ही अपने खेत में काम कर रहे थे। मगर वह खेत पड़ोसियों का था। सुबह से दोपहर तक दोनों ने आधा खेत साफ कर दिया। धूप तेज हो रही थी। फुलणू घास की गैस से सिर चकराने लगा। बापू उठे और घर की ओर चल पड़े। अम्मा भी उनके पीछे से चल पड़ीं।
घर पहुंच कर बड़ी भाभी से पानी मांगा। इससे पहले भाभी रसोई से पानी लाकर उन्हें देती वे जमीन पर सिर पकड़ कर बैठ गए, सिर जैसे दर्द से फटा जा रहा हो। भाभी पानी लेकर आती तब तक बापू जमीन पर पड़े तड़प रहे थे। भाभी ने यह सब देखा तो जोर से रोने-चिल्लाने लगी। उसके रोने की आवाज सुन कर खेतों में काम कर रहे लोग और घास काट रही औरतें दौड़ी चली आर्इं। देखते ही देखते पूरा घर आंगन लोगों से भर गया। बापू को उठा कर बिस्तर पर लिटाया गया। जैसा कि ऐसे वक्त में अक्सर होता है, हर कोई बिना डिग्री के ही डॉक्टर और वैद्य बन जाते हैं। कोई कहे- चक्कर आ गया है। गीला कपड़ा सिर पर रखो। कोई कहता- बीपी बढ़ गया है आराम करने दो। जितने मुंह उतनी तरह के उपचार शुरू हो गए। मगर किसी ने यह नहीं सोचा कि उन्हें अस्पताल ले चलें। बापू की आंखें बंद थीं। मगर जब शाम तक बापू की तबीयत में सुधार नहीं हुआ तब फिर सबका माथा ठनका। कहीं बापू को किसी तरह का कोई अटैक तो नहीं पड़ गया है?

बापू को गाड़ी में शहर के बड़े सरकारी अस्पताल ले जाया गया। छुट्टी का दिन होने की वजह से ओपीडी में एक ही डॉक्टर था। इमरजंसी केस होने की वजह से डॉक्टर ने जल्दी अटैंड कर लिया और इंजेक्शन आदि देकर आपातकालीन कक्ष में भर्ती कर बापू का इलाज शुरू कर दिया। नर्स ने जाते ही ग्लूकोज लगा दिया। इसके बाद डॉक्टर द्वारा लिखी दवाइयों की लिस्ट थमा दी और साथ ही साथ कई तरह के टैस्ट अस्पताल के बैड पर ही शुरू हो गए। बापू ने उम्र भर कभी बुखार की गोली तक नहीं खाई थी, इंजेक्शन भी नहीं लगवाया था। बुखार आदि होने पर काढ़ा पीकर ठीक हो जाते थे। अब अस्पताल में अचेत पड़े थे। जितने भी टैस्ट लिए गए उनकी रिर्पोट भी संतोषजन नहीं आ रही थी। हमारी चिंता बढ़ती जा रही थी। नर्स एक और चिट थमा गई- सिटी स्कैन करवा लाओ जल्दी, इसके बाद ही पता चलेगा कि मरीज को कहां रैफर करना है? आइजीएमसी शिमला या फिर पीजीआइ चंडीगढ़। बड़े भाई साहब और अन्य लोग बापू को सीटी स्कैन करवाने ले गए और मैं पैसों का इंतजाम करने एटीएम की ओर भागा।

देश में नोटबंदी का एलान क्या हुआ, पांच सौ और हजार के नोट अब महज कागज के टुकड़े बन कर रह गए। देश में हलचल मच गई थी। आम आदमी को एटीएम की लाइन में खड़ा कर दिया था। सबके सब बदहवास-हैरान और परेशान थे। एटीएम के आगे कतार लंबी थी। अपनी बारी का इंतजार करता मैं भी कतार में खड़ा हो गया। खड़े-खड़े टांगों में दर्द होने लगा था। मगर लाइन छोड़ कर कहीं जा भी नहीं सकता था। अपनी जगह से खिसकने का मतलब था कि पचास आदमियों के पीछे चले जाना। मगर मुझसे आगे और पचास लोग थे। मेरे साथ खड़े एक अधेड़ व्यक्ति ने रूमाल से पसीना पोंछते हुए कहा- तीन दिन से लगातार कतार में लगा हूं। दो हजार से ज्यादा एटीएम से नहीं निकलते। अगले महीने बेटी की शादी है और ये कहते हैं कि एक हफ्ते में चौबीस हजार से ज्यादा नहीं निकाल सकते। अब तो नाते रिश्तेदारों से भी पैसा नहीं मांग सकते।… कहते हैं काला धन बाहर आ जाएगा… अब देखते हैं कितना काला धन बाहर आता है और कितना ठिकाने लगता है।

करीब दो घंटे तक इंतजार करने के बाद एटीएम से दो हजार रुपए ही निकाल पाया था।  अस्पताल वापस पहुंचा। बापू की सिटी स्कैन रिपोर्ट आ चुकी थी। डॉक्टर ने बापू को वापस घर ले जाने का मशविरा दिया, बोला- अब इनकी उम्र इतनी नहीं है कि आॅपरेट किया जा सके… अब तो बस दवा और दुआओं पर ही भरोसा रखना होगा। इनके बे्रन में क्लॉटिंग है, जिसकी वजह से उन्हें यह अटैक पड़ा। अब यह दवा से ही ठीक हो सकती है… इन्हें आराम की सख्त जरूरत है। अगर ऐसा नहीं किया तो दोबारा अटैक पड़ सकता है। वह जानलेवा साबित हो सकता है।  घर वापस लौटने पर भी बापू की बेहोशी नहीं टूटी थी। वे अचेत से पड़े थे। बस सांसें चल रही थीं। चम्मच से पानी और दवा देते तो आंखें बंद किए ही निगल लेते। दो दिन इसी हाल में रहने के बाद तीसरे दिन बापू ने आंख खोली थीं।

गांव में सबसे उम्रदराज और दीर्घजीवी जोड़ी है अम्मा-बापू की। अम्मा नब्बे के करीब पहुंचने वाली है और बापू पंचानवे के आसपास हैं। इस उम्र में भी दोनों सुबह मुंह अंधेरे दोनों उठ जाते और देर शाम तक किसी न किसी काम में लगे रहते। उनकी इस दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया। यह अलग बात है कि उम्र बढ़ने का असर सेहत पर भी पड़ने लगा। दोनों का शरीर कमजोर होने लगा है… आंखों में भी अब कम दिखाई देने लगा है, कानों में ऊंचा सुनाई पड़ता है और याददाश्त भी कमजोर हो गई है। बहुत-सी बातें स्मृति से लोप हो जाती… यहां तक कि सगे संबंधियों को भी नहीं पहचान पाते। याद दिलाने पर ही स्मृति वापस लौटती। लगता है दोनों के लिए समय ठहर सा गया है। अम्मा और बापू ने जैसे समय को गठरी में बांध कर अपने संदूक में कैद कर रखा है। और धर्मराज का मुंशी चित्रगुप्त अपने बही-खाते में जैसे उनकी उम्र का हिसाब रखना ही भूल गया है।

आज अम्मा की कमर भले झुक गई हो, मगर चेहरे पर वही रौब कायम है। किसी की क्या मजाल जो उसकी मर्जी के बगैर घर में कोई फैसला भी ले। वह बराबर बापू के कंधे से कंधा मिला कर सारे काम करती है। कोई रोक के तो देखे भला, उसकी खैर नहीं। इस उम्र में भी अम्मा की दिनचर्या बदली नहीं है। डंगर पशुओं की सेवा टहल करना… दूध दुहना, घास काटना, खेतों में फसल की निराई गुड़ाई तक सारे काम करती है। गांव वाले दोनों की हिम्मत की दाद देते हैं। दोनों के लिए सारा गांव अपने ही घर-परिवार जैसा है। मां की गठरी गुम हो गई थी। गठरी का इस तरह गुम हो जाना कोई मामूली बात नहीं थी। मां के लिए तो यह गठरी किसी खजाने से कम नहीं थी। मां की यह गठरी कभी खाली नहीं रहती थी। बचपन से ही मैंने कपड़े के चिथड़ों में लिपटे नोट मां के उस हरे संदूक में देखे थे। हरे रंग का यह संदूक किसी शाही खजाने की तिजोरी से कम नहीं था। उसमें मां के गहने, कपड़े और कपड़े की लीरों में लिपटे पांच, दस, बीस, पचास और सौ के नोट रहते। और मां अपने इस खजाने की चाबी लाल परांदे से बांध कर रखती। मतलब मां के सिवाय उस संदूक की चाबी किसी के हाथ नहीं लगती थी।

बापू अस्पताल में थे और अम्मा काम में व्यस्त रही। पीछे से किसी ने संदूक पर हाथ साफ कर गठरी को उड़ा लिया था। शक घर के ही लोगों पर था। मगर बिना सुबूत के किसी पर इल्जाम भी तो नहीं लगाया जा सकता था। यह तो सभी को मालूम था कि मां के संदूक में रखी उस गठरी में पांच सौ और हजार के नोट थे। क्योंकि अम्मा-बापू दोनों को वृद्धा पेंशन मिलती थी। इसके अलावा गायों का दूध सोसायटी में बेचते उस रकम को भी किसी को हाथ नहीं लगाने देते। और तो और बड़े और छोटे भाई से हर महीने पैसे लेते और उसे भी कहीं खर्च न करके संदूक में संभाल करते। बैंक में खाता खोलने कभी नहीं गए। कौन झंझट में पड़े पैसे जमा करवाने हो या फिर निकलवाने के लिए कौन दूसरों का मुंह ताकता रहे। और दूसरों को इस बात का भी पता चल जाता है कि बैंक में कितनी रकम जमा है। अभी बापू इस हाल में नहीं थे कि उनसे गठरी की चोरी की बात की जा सके। मगर गठरी की चोरी अब लोगों के बीच चर्चा का विषय बन चुकी थी। जो कोई भी बापू का हाल पूछने आता, तो वह मां की उस गठरी के बारे में भी बात करता। बापू का हालचाल पूछना तो अब औपचारिकता भर ही रह गई थी। बात हट-फिर कर मां की गठरी पर आकर रुक जाती। कितनी पुरानी गठरी थी। तब तो बहुत पैसे होंगे उसमें। आपने कब देखे थे, गिने तो होंगे ही। इतने पैसे घर में क्यों रखे बैंक में क्यों नहीं रखे। और नाते रिश्तेदार तो हमदर्दी जताते हुए कहते समय रहते उस गठरी को ढूंढ़ लो भाई। उसमें जितने भी नोट हैं उन्हें बैंक में ले जाकर बदलवा दो।

बापू का हालचाल पूछने आने वाले अब उनकी सेहत के बारे में कम ही बातें करते। बस किसी न किसी बहाने नोटबंदी का किस्सा छेड़ देते। जितने मुंह उतनी बातें। हर कोई इससे खुद को जुड़ा हुआ महसूस करने लगा था। मजे की बात तो यह थी कि जिनके नल्ले-पल्ले कुछ नहीं था वे सबसे ज्यादा कथापड़ी बने हुए थे। अपनी बात वे बड़े सलीके से शुरू करते, सुना आपने…? दूसरा व्यक्ति उसके सवाल पर प्रतिक्रिया व्यक्त करे इससे पहले ही शुरू हो जाते- भई पैसे वालों की आजकल नींद हराम हो गई है, फलां साहूकार ने पैसे खड्ड में फेंक दिए। यह सब वे इतने विश्वास के साथ कहते मानों सारा काम उनकी आंखों के सामने हो रहा हो।बापू का हालचाल पूछने आए देवता के कारदार पुरुषोत्तम ठाकुर ने अपनी मूंछों को ताव देते हुए यह किस्सा छेड़ दिया कि कैसे उन्होंने अपने देवता के लाखों रुपयों को ठिकाने लगा दिया। वह बोला- हमारे देवता के पास हजार और पांच सौ के नोट कोई नब्बे लाख के करीब निकले। मगर देवता की कृपा से सब ठिकाने लग गए। उसकी करामात वही जाने। बस उसी ने बुद्धि लगाई और काम हो गया। उसकी इस बात ने मेरी भी उत्सुकता बढ़ा दी थी।
वो कैसे हुआ कारदार जी और इतने पैसे देवता के पास कहां से आ गए?

मेरी ओर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरते हुए वह बोला- सब मालिक की कृपा है। अपना देवता सात हारियों का मालिक है चढ़ावे के रूप में ही लाखों की रकम जमा हो जाती है। देवता के साथ चलने वाले गल्ले में ही एक महीने में डेढ़ से दो लाख रुपए निकल आते हैं। वो सब तो ठीक है कारदार जी। अगर इतनी रकम होती है तो उसे बैंक में जमा क्यों नहीं करवाते। आपको देवता के नाम पर बैंक में खाता खुलवाना चाहिए। वहां देवता का पैसा सुरक्षित भी रहेगा और कोई हेराफेरी भी नहीं करेगा। पुरुषोत्तम ठाकुर अपनी मूछों को ताव देते हुए कहने लगा- एक बार बैंक वाले आए भी थे खाता खुलवाने, बैंक की नई-नई ब्रांच खुली थी। मगर देवता ने साफ मना कर दिया। बैंक वाले जब देवता के भंडार की तरफ जाने लगे तो उनकी आंखों के आगे अंधेरा छा जाता कुछ नहीं दिखाई देता और जब पीछे की ओर वापस मुड़ते तो सब कुछ साफ दिखाई देने लगता। बैंक वाले माफी मांग कर वापस लौटे। बस जी वो ध्याड़ा और आज का बार देवता के नाम से बैंक में खाता नहीं खुला।

मुझे उसकी बात पर कतई विश्वास नहीं हो रहा था। ऐसे मिथक गढ़ने में पुरषोत्तम ठाकुर जैसे कारिंदे सिद्धहस्त होते हैं। बैंक वालों का अंधा होना और वापस लौटने पर आंखों की रोशनी लौट आना चमत्कार ही तो था, मगर आस्था पर कोई सवाल नहीं उठा सकता है और मैं भी उस वक्त इस बात का प्रतिकार नहीं कर सकता था। हां, देवता के उन पैसों को अवैध से वैध और काले से सफेद करने की प्रक्रिया भी आसान थी। देवता के कारिदों जिनमें गूर, पुजारी, कठयाले आदि के दस परिवारों में इन पैसों का बंटवारा कर हर परिवार से पांच सदस्यों के नाम पर बैंक में दो-ढाई लाख की रमक बैंक में जमा करवा दी गई और बाद में नई करंसी के रूप में पैसे निकलवा दिए गए। आखिरकार कुछ दिनों के बाद बापू की हालत में सुधार होने लगा था। अब वे बिस्तर पर बैठने लगे थे। अंदर ही अंदर जैसे बेचैनी महसूस करने लगे थे। एक दिन मौका पाकर भाभी बापू से मां की गठरी के गुम होने की बात बापू के कान में कह डाली और पूछा कहीं आपने तो नहीं रखी है। बापू कुछ देर तक उसकी ओर देखते रहे और बाहर जाने के लिए उतावले हो गए- बाहर चलो, खेतों में चलो। हाथ में लाठी लिए बापू खेतों की ओर चल पड़े। उन्हें सहारा देने के लिए भाभी और मैं भी साथ-साथ चल रहे थे। एक खेत से दूसरे खेत तक हरियाली देख कर उनके चेहरे पर रौनक लौट आई थी।

बापू के चेहरे पर संतोष के भाव थे। पता नहीं किस बात को लेकर वे संतुष्ट थे। गठरी के खो जाने या फिर गठरी न मिल पाने पर। बापू ने एक-एक खेत का मुआयना कर इस बात की तसल्ली कर ली थी कि उनकी बीमारी के बावजूद खेत उजाड़ नहीं थे। उनमें अगली फसल की बिजाई कर दी गई थी।
बापू एक जगह पर रुके और जमीन पर बैठ गए। अपने हाथ से मुट्ठी भर मिट्टी उठा कर माथे से लगाई और मुट्ठी खोल कर मिट्टी को ध्यान से देखने लगे। भाभी ने झुक कर उनके कान में जोर से कहा- पिताजी क्या देख रहे हैं?
– कणक बीज दी क्या?
– हां, बाजी, हमने सबसे पहले बीज दी है।
बापू के चहरे पर जैसे रौनक लौट आई थी। भाभी की पीठ थपथपाते हुए बोले-शाबाश…। इसके बाद वे मेरी ओर मुस्कुराते हुए बोले- ये समय की गठरी है भाऊ… जाने कहां खो गई है… समय पर ही मिलेगी। उनकी यह पहेली मेरी समझ में नहीं आई। मैं जानता था कि मां की गठरी अब उनकी स्मृति से लोप हो चुकी थी। वे उठे और लाठी टेकते हुए घर की ओर वापस चल पड़े, जैसे उनके मन की मुराद पूरी हो गई थी। मैं अवाक-सा उन्हें वापस लौटता हुआ देखता रहा। १

 

 

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