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कहानीः सब कुछ लुटाके

उसने निद्रा भरी आंखों से बजते हुए मोबाइल को देखा। किसी अपरिचित नंबर से फोन था।

Author May 6, 2018 1:15 AM

सुधेंदु ओझा

उसने निद्रा भरी आंखों से बजते हुए मोबाइल को देखा। किसी अपरिचित नंबर से फोन था।
‘सत्येश।’ फोन उठाते ही किसी महिला स्वर ने उसका नाम लिया।
‘हां! मैं सत्येश बोल रहा हूं…, आप कौन?’ उसने प्रश्न किया।
‘सत्येश, मैं कौशल्या बोल रही हूं। कौशल्या, गृहसज्जा वाली।’ दूसरी तरफ से आवाज आई।
उसने अपने दिमाग पर जोर डाला। कौशल्या उसके साथ डेस्क पर काम करती थी। मोटी-सी लड़की। पर वह तो शायद पिछले कई वर्षों से किसी सरकारी संस्थान से जुड़ चुकी थी?
‘सत्येश मेरी जान खतरे में है… किसी और को इस मुसीबत की घड़ी में अपना साथी न पाकर ही मैंने तुम्हें फोन किया है।’
‘बोलो! समस्या क्या है?’ उसने जवाब दिया।

‘सत्येश मुझे ये लोग मार डालेंगे, पता एसएमएस कर रही हूं, हो सके तो पुलिस लेकर जल्दी यहां तक पहुंचो। अगर तुमने देर की तो ये लोग मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।’
आधी रात गए इस फोन ने उसे खासा चिंतित कर दिया था।
कमरे में घूमते हुए वह सोचने लगा कि कौशल्या ने अवसर होते हुए भी सीधे पुलिस को फोन क्यों नहीं मिलाया? हो सकता है उसने पुलिस को भी फोन किया हो?
उसने पुलिस महकमे में एसीपी मित्र को रात गए फोन लगाया। उसे सारी स्थिति समझाई। यह भी पूछा कि क्या ऐसे हालात में उसका मौके पर पहुंचना ठीक रहेगा?
दोस्त ने सलाह दी कि वह मौके पर तत्काल एक इंस्पेक्टर को भेज रहा है और वह वहां न जाए, स्थिति देख कर इंस्पेक्टर खुद उसे बुला लेगा।
वह निश्चिंत होकर लेट गया।
सुबह हुई। हॉकर द्वारा फेंका गया अखबार रबड़ में लिपटा हुआ पड़ा था। अखबार के दफ्तर में होते हुए भी वह अखबारों से बचता था। दिन भर कंप्यूटर पर वह देश-दुनिया के अखबारों में ही उलझा रहता था।
‘कातिलाना हमला, पुलिस जांच जारी’ मुख्य-पृष्ठ पर छपते-छपते के अंतर्गत छपे हेडिंग को देख कर उसने समाचार को गहराई से पढ़ा।
समाचार से कोई विशेष जानकारी उसे नहीं मिली फिर भी छठी इंद्रीय इशारा कर रही थी कि हो न हो यह समाचार कौशल्या से ही संबंधित है।
दफ्तर में घुसते ही उसने अपने एसीपी दोस्त किशोर को फोन मिलाया।
‘हां सत्येश, बोलो।’ उधर से आवाज आई।
‘यह क्या हुआ कल रात?’ सत्येश ने पूछा।
‘इंस्पेक्टर ने ज्यादा ब्योरा तो नहीं दिया, पर यह जरूर बताया कि जब वह मौका-ए-वारदात पर पहुंचा तो उसने देखा कि एक महिला और पुरुष गंभीर रूप से घायल अवस्था में पड़े हैं। नींद में होने की वजह से मैं ज्यादा जानकारी नहीं ले सका। तुम ऐसा करो, थाने चले जाओ। मैं इंस्पेक्टर को कह देता हूं।’ किशोर ने उसे कुछ जानकारी दी।
वह थाने पहुंचा, इंस्पेक्टर उसका इंतजार करता मिला।
इंस्पेक्टर ने एक महिला सिपाही को कौशल्या को लाने के लिए भेज दिया।
थोड़ी देर में उसने देखा कि वही महिला सिपाही एक स्थूलकाय महिला, जिसकी आयु लगभग साठ से पैंसठ वर्ष के बीच की होगी, का हाथ पकड़े लिए चली आ रही है।
अस्त-व्यस्त, बिखरे हुए बाल, आभाहीन झुर्रीदार चेहरा, चौड़ी नाक, रंग साफ होने के बावजूद कौशल्या शुरू से ही आकर्षक नहीं थी। इधर बुढ़ापे में उसका चेहरा और बिगड़-सा गया था। उसने देखा कि कौशल्या की साड़ी पर खून के छींटे पड़े हुए थे।
महिला ने चेहरे पर हल्की-सी छद्म हंसी बिखेरने का प्रयास करते हुए उससे पूछा ‘कैसे हो सत्येश?’
‘यह क्या हुआ?’ उसने महिला से पूछा।
‘मेरी किस्मत ही ऐसी है सत्येश!’ महिला ने एक लंबी सांस छोड़ते हुए कहा।
वह कौशल्या को लगभग पच्चीस-तीस साल बाद देख रहा था।
वह दिल्ली के जंगपुरा में रहती थी। कुल मिला कर वे चार भाई और चार बहनें थीं।
पिता एक सरकारी कार्यालय में क्लर्क।
मां-बाप की सेवा के लिए उसने शादी नहीं की थी। उसके सभी भाई-बहन शादी-शुदा थे और उसके इस त्याग को हर मौके पर झूठा सिद्ध करते रहते थे।
उनका आरोप था कि मां-बाप की संपत्ति पर अधिकार के लिए उसने शादी नहीं की थी।
जो भी हो, कई बार उसके घर का झगड़ा पुराने कार्यालय तक पहुंच चुका था। उसकी तीन बहनों ने खुद ही अपना परिवार बसा लिया था। वे दूसरे शहरों में रहती थीं, पर जंगपुरा के मकान पर अपना हक बनाए रखती थीं।
जब वह पत्रिका में नया-नया आया था, तो कौशल्या संस्थान में संपादन विभाग में वरिष्ठ पद पर थी, उससे लगभग बारह-पंद्रह साल बड़ी रही होगी।
‘क्या हुआ यह सब? मुझे आराम से समझाओ।’ उसने उसकी आंखों में देखते हुए कहा।
‘क्या बताऊं सत्येश! जीवन के शुरुआती दिन माता-पिता की सेवा में होम हो गए। अपना जीवन अस्त-व्यस्त रहा। भाई-बहन अपने-अपने परिवार के होकर रह गए। मुझे कोई नहीं मिला। मेरे भाई-बहनों को यही उम्मीद थी कि मेरी जायदाद उनके बच्चों को ही मिलेगी।’ उसके आंसू मेज पर गिर रहे थे।
‘पिता जी की मृत्यु हो चुकी थी। मां अस्थमा से जूझ रही थी। उसे हर क्षण देख-रेख और दवा की जरूरत थी। बहनें दिल्ली में नहीं थीं और भाइयों की पत्नियां मां की देखरेख नहीं करती थीं। मां का एक सहारा मैं ही थी। ऐसे में भाइयों ने मां से लड़-झगड़ कर मकान तुड़वा कर फ्लैट बनवा लिए। सारी बहनें अपना हिस्सा लेने पहुंच गर्इं। घरेलू पंचायत में भाई-बहन मां को फ्लैट में हिस्सा देने को मना करते रहे। मां ने कागजों पर दस्तखत करने से मना कर दिया तो वे सब बड़ी मुश्किल से मां को एक फ्लैट देने को सहमत हुए।
मां की मृत्यु के बाद मैंने मां और अपने हिस्से वाला फ्लैट बेच दिया। उन पैसों से मैंने गुड़गांव में जमीन खरीद ली। नोएडा, नया बस रहा था, कोई वहां जाना नहीं चाहता था। एक बनी बनाई कोठी भी उन्हीं पैसों से खरीद ली।

इधर, इस दफ्तर में कुछ लोगों ने मुझे पारिवारिक दायित्वों से मुक्त देख दबाव बनाया कि मुझे आने वाले समय को देखते हुए एक जीवन साथी तलाश लेना चाहिए। हालांकि, मेरी कोई रुचि नहीं थी, पर वृद्धावस्था की कठिनाइयों को देखते हुए मुझे भी इसमें कोई बुराई नजर नहीं आई।
इसी बीच मेरे इन प्रयासों की जानकारी मेरे बैंक के मैनेजर भाटिया जी को हो गई।
उसकी पत्नी मेरे साथ ही काम करती थी। भाटिया जी के घर में आए महीने सत्संग होता था। ऐसे ही एक सत्संग में उसकी पत्नी मुझे जबर्दस्ती अपने घर ले गई। श्रीमती भाटिया ने जान-बूझ कर मुझे सत्संग में सबसे आगे, स्वामी जी के पास बैठाया था।

मैंने पाया कि सत्संग के दौरान स्वामी जी का ध्यान बराबर मुझ पर ही केंद्रित था। पूरी संगत में उन्होंने मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा की। मैं किसी पुरुष के इन स्नेह सिंचित शब्दों की जनम-जनम से प्यासी थी। मेरे जीवन में कभी किसी पुरुष का पदार्पण नहीं हुआ था। सत्संग का कार्यक्रम देर रात तक चला। आयोजन के उपरांत भाटिया दंपत्ति ने मुझे घर पर ही रुक जाने का आग्रह किया। सच पूछो तो मैं भी स्वामीजी का और सान्निध्य चाहती थी।
मुड़ कर देखती हूं तो लगता है शायद यह सब पूर्वनियोजित ही था। सत्संग आयोजन स्थल को श्रद्धालुओं ने शीघ्र ही स्वामीजी के शयन कक्ष में परिवर्तित कर दिया। धीरे-धीरे श्रद्धालुओं की भीड़ छंट गई। कमरे में मैं, स्वामीजी और स्तब्ध रात के साथ किसी पुरुष के छुअन की मेरी अतृप्त प्यास रह गई थी। भाटिया दंपत्ति वहां नहीं दिखाई दे रहे थे और मेरी कामांध निगाहें उन्हें तलाश भी नहीं रही थीं। मैं चाहती थी कि स्वामी जी मुझे छुएं, मेरे मस्तक पर अपना हाथ रखें। मुझे अंग लगा लें। मैं जल रही थी। उस दावानल में मेरे साथ मेरा विवेक भी भस्म हो रहा था।…

स्वामीजी ने मुझे बताया कि उनका विचार हरिद्वार में आश्रम बनाने का है। पैसों की समस्या है, वह भी कुछ समय में दूर हो जाएगी। वह सोचने लगी, स्वामी जी शायद उसे अपना नहीं समझते, अगर समझते होते तो कम से कम एक बार आश्रम बनवाने की बात अवश्य करते।
वह कभी हरिद्वार गई तो नहीं थी, पर स्वामीजी के पास, आंख मूंदे-मूंदे उसने गंगा जी के तट की कल्पना कर ली। शुभ्र-वस्त्रा वह स्वामी जी के साथ गंगा में जल-क्रीड़ा कर रही है। आगत के भय से जब उसकी कल्पना टूटी तो पाया कि उसने वास्तव में स्वामी जी के हाथ को कस पर पकड़ रखा है और स्वामी जी उसे हृदय से लगाए उसके सिर को आत्मीय भाव से सहला रहे हैं। उसने प्रतिरोध नहीं किया। शीघ्र ही उसकी सांसें उखड़ने लगीं।

सुबह, भाटिया दंपत्ति को स्वामी ने बताया कि उसका कौशल्या के साथ ‘आध्यात्मिक विवाह’ हो गया है। भाटिया दंपत्ति के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई।
थोड़ी ही देर में स्वामी के चेले-चपाटों में यह बात जंगल की आग की तरह फैल गई। उसी दिन भरी भीड़ के सामने स्वामी के साथ उसका विवाह संपन्न हो गया। चेले-चपाटों में कुछ वकील भी थे, जो विवाह संबंधी कागजात तैयार करा लाए थे, बस उसके हस्ताक्षर की देर थी। अब वह स्वामी के चेले-चपाटों की गुरु मां थी। उसे अपने और स्वामी पर गर्व हो रहा था। वह बावन वर्ष की और उसके पति, स्वामी पैंतीस वर्षीय।
अगले दिन वह स्वामी के साथ सीधे हौजखास मार्केट पहुंची। स्वामी के नाप की छह-छह पैंट-कमीज उसने अपने पसंद के रंग की लीं, साथ ही जूता भी। स्वामी के कपड़े बदलवा कर, उन्हें लेकर सीधे दफ्तर पहुंची।
उसके ललाट पर गेरुआ सिंदूर घोषित कर रहा था कि उसका स्टेटस अब बदल गया है। ‘मीट हिम, ही इज सेंट तरुण कुमार अवधूत, माइ हजबैंड।’ उसने दफ्तर में सबसे परिचय कराया।
समय धीरे-धीरे खिसकता रहा। कौशल्या के हाथों से जायदाद भी। गुड़गांव की जमीन और नोएडा की कोठी बेच कर हरिद्वार में आश्रम का निर्माण हुआ। पैसे घटे तो उसने अपने फंड को खाली कर दिया। इस आश्रम के कागज पर मालिक स्वामी रहा। तीन आलीशान कारें उसने विभिन्न बैंकों से ऋण पर खरीदा था। आश्रम से होने वाली आय स्वामी उसे देता, जिससे वह बैंक की किश्त लौटाती।

कुछ समय बाद स्वामी ने बताया कि आश्रम से अब आय नहीं हो रही है, सो किश्त उसकी तनख्वाह से ही कटने लगी। वह जहां नौकरी करती थी उस संस्थान ने कर्मचारियों के लिए कुछ क्वार्टर बनवा रखे थे। अब वह वहां रहने लगी थी। स्वामी हरिद्वार के आश्रम में अकेले सत्संग करने लगा। वहां कौशल्या का जाना प्रतिबंधित हो गया था।
स्वामी जब दिल्ली आता तो उसके साथ ही रहता, अलबत्ता अलग कमरे में अपनी नई-नई प्रेमिकाओं के साथ।
वह फिर पुरानी जैसी कौशल्या बन कर रह गई थी, जिसका अब इस दुनिया में कोई नहीं था। रुपया-पैसा अब कुछ भी उसके पास नहीं रह गया था। स्वामी से अलग होकर उसके पास सिर्फ जलालत बची थी। बाहर किसी को वस्तुस्थिति बता भी नहीं सकती थी। स्वामी ने उसे निचोड़ कर फेंक दिया था।
कल की रात स्वामी आया था। पर इस बार वह दृढ़ प्रतिज्ञ थी। उसने स्वामी के साथ आए लोगों को तबीयत खराब होने का बहाना कर बाहर होटल जाने को कह दिया। स्वामी के लिए अंतिम बार खुद थाल सजा कर लाई। स्वामी के सोते ही उसने लोहे का पाइप निकाल लिया, फिर उस पर चंडी सवार हो गई थी। उसे कुछ भी होश नहीं रहा उसने क्या किया।
‘मैंने जब तुम्हें फोन किया था तो उसके चेले लौट आए थे और दरवाजा पीट रहे थे।’ अस्पष्ट शब्दों में वह सत्येश को देख बुदबुदाई।
तभी, इंस्पेक्टर का फोन बज गया। इंस्पेक्टर ने उसे बताया, ‘अस्पताल से फोन था, स्वामी को गंभीर रूप से घायल अवस्था में एडमिट करवाया था… खत्म हो गया है।’
इंस्पेक्टर और उसे खड़ा होते देख कौशल्या ने पूछा, ‘सत्येश मैंने कल रात कुछ गलत किया था क्या?’
उसे लगा कौशल्या यह प्रश्न उससे नहीं, बल्कि पूरे समाज से कर रही थी। ०

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