कहानी: ईनाम - Jansatta
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कहानी: ईनाम

मास्टर सतप्रकाश नवीं कक्षा में बता रहे थे-प्यारे बच्चों! आप सभी जानते हो कि स्वतंत्रता दिवस आ रहा है।

Author December 18, 2016 1:21 AM
कहानी: ईनाम

राधेश्याम ‘भारतीय’

मास्टर सतप्रकाश नवीं कक्षा में बता रहे थे-प्यारे बच्चों! आप सभी जानते हो कि स्वतंत्रता दिवस आ रहा है। इस बार भी यह पर्व बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाएगा। जो विद्यार्थी इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेना चाहता है वह मुझे अपना नाम लिखा दे। सभी बच्चे चुप थे।
‘रजनी, तुम तो अपना नाम लिखवाओ। तुम तो बहुत अच्छा भाषण देती हो।’ मास्टरजी ने रजनी की प्रशंसा करते हुए कहा।
‘ठीक है सर, मेरा नाम लिख लो और साथ में कोमल का भी। हम दोनों इस बार देशभक्ति का गीत सुनाएंगी। ’ रजनी ने मास्टरजी को कहा।
यह तो और भी अच्छी बात है। इस बार तो कविता, गीत और भाषण प्रतियोगिता करवाई जाएगी। प्रथम द्वितीय और तृतीय स्थान पर आने वाले विद्यार्थियों को ईनाम दिए जाएंगे।
‘दिनेश तुम्हारी भी आवाज अच्छी है। तुम भी अपना नाम लिखा लो।’
‘ठीक है सर, मेरा भी नाम लिख लो।’ दिनेश ने भी अपना नाम लिखा दिया।
‘कोई और अपना नाम लिखवाना चाहता है, वह मुझे बाद में मिल सकता है।’ इतना कह मास्टरजी कक्षा से बाहर चले गए।
जैसे ही वे खिड़की के पास पहुंचे तो उन्होंने अंकित और राजू में हो रही बातचीत सुनी।
‘ राजू यार, मन तो मेरा भी करता है कि मैं भी कुछ सुनाऊं। सब बच्चों को ईनाम मिलता है काश कभी हमें भी कोई ईनाम मिले।’
‘तो लिखवा ले नाम किसने रोका।’
‘पर मेरा पैर ….।’
‘अरे पैरों को थोड़े ही गाना है; मुंह से गाना है।’ राजू ने अंकित की बात बीच में काटते हुए कहा।
‘वह तो मुझे भी पता है। पर, मेरी टांगें कांपती है मंच पर।’
‘इसका तो कोई हल नहीं।’
मास्टरजी अंदर आए और अंकित को बाहर बुलाया।
‘आओ बेटा! मेरे पास आओ। तुम भाषण देना चाहते हो तो अपना नाम लिखा दो।’ मास्टरजी ने प्यार से कहा।
‘नहीं सर, मैं नहीं बोल सकता।’
‘क्यों नहीं बोल सकते?’ जब और बच्चे बोल सकते हैं तो तुम भी बोल सकते हो। अपने आप को कमजोर मत समझो।’ मास्टरजी ने उसका उत्साह बढ़ाते हुए कहा।
‘नहीं सर, रहने दीजिए। मैं तो वैसे ही कह रहा था।’
‘बेटा किसी काम की शुरुआत कभी तो करनी ही होगी। तो वह शुरुआत आज से ही क्यों नहीं? अच्छा, अगर तुम चाहो तो तुम पर्चा देखकर पढ़ सकते हो इससे तुम्हारा ध्यान परचे पर होगा और पैरों की तरफ से बेफिक्र हो जाओगे।’
‘ठीक है सर, फिर तो लिख लीजिए मेरा नाम।’
स्वतंत्रता दिवस पर बच्चे सजधज कर आए। जिन बच्चों ने अपना नाम सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लिखाया था वे अपने कार्यक्रम की तैयारी करने लगे।
अंकित अभी भी सोच रहा था। पता नहीं क्या होगा। मैं बोल पाऊंगा या नहीं। अरे मंच पर पैर कांपने लगी तो सभी हंसी उड़ाएंगे। चार-पांच दिन की मेहनत बेकार जाएगी। मैं रहने देता हूं।
नहीं, सर बुरा मान जाएंगे। मुझे भाषण देना ही होगा। उसने अपनी बात को स्वयं ही काटा और मन ही मन भाषण देना का निश्चय किया।
कार्यक्रम शुरू हुआ।
सभी बच्चों ने अपने कार्यक्रम प्रस्तुत किए। अब स्टेज से अंकित का नाम पुकारा गया।
उसने जाते ही कागज खोलकर पढ़ना शुरू किया। उसने अपने भाषण को बड़े-उतार-चढ़ाव के साथ पढ़ा। भाषण समाप्त होने पर सभी ने जोरदार तालियां बजार्इं। उसके बाद एक छोटी-सी लड़की ने सुंदर नृत्य प्रस्तुत किया।
अंत में मुख्य अतिथि ने विजयी बच्चों को ईनाम दिए। पर अंकित के बारे में इतना ही कहा-‘प्रतियोगिता के कुछ नियम होते हैं इसलिए अंकित को कोई ईनाम नहीं मिला। वैसे इसने बहुत अच्छा भाषण दिया। अगर वह बिना पर्चा देखे भाषण देता तो इसका नाम भी विजेताओं में अवश्य आता।’
कार्यक्रम समाप्त हुआ।
राजू दौडता हुआ अंकित के पास आया और उसे चिढ़ाते हुए बोला-‘ मिल गया ईनाम। तुम तो कहते थे कि जब बच्चों को ईनाम मिलता है तो मुझे बड़ी खुशी होती है और चाहता हूं कभी मुझे भी कोई मंच पर सम्मानित करे।’
‘कहा था, पर राजू एक बात बताऊं?’ अंकित ने कुछ सोचते हुए कहा।
‘बता जो बताना चाहता।’ राजू ने कहा।
‘आज मुझे वास्तव में बहुत बड़ा ईनाम मिला है।’
‘अच्छा, तो मुझे अंधा समझता है। अगर मिलता तो मुझे दिखता नहीं?’
‘नहीं दोस्त, आज मैं मंच पर गया। अब मुझे भी अहसास हो गया है कि मैं भी मंच पर अपने मन के विचार व्यक्त कर सकता हूं और फिर अतिथि महोदय ने भी मेरे भाषण की तारीफ की। उनके वे शब्द मेरे लिए बहुत बड़ा ईनाम है। यह बात मैं अपने मम्मी-पापा और दादाजी को बताऊंगा। देखना कितने खुश होंगे वे।’ अंकित ने प्रसन्न होते हुए अपने मन की बात बताई। उसके बाद वह तेज कदमों से अपने घर की ओर चल दिया। चलते हुए ऐसे लग रहा था मानो उसके पांव जमीन पर न हों। ०

 

 

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