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कहानी- नोटा जान

डोर बेल की आवाज आई, तो उसने खिड़की के पल्ले को जरा-सा खोल कर बाहर देखा। बाहर कोई महिला दरवाजे पर खड़ी थी।
Author November 26, 2017 01:37 am
प्रतीकात्मक चित्र।

पंकज सुबीर

डोर बेल की आवाज आई, तो उसने खिड़की के पल्ले को जरा-सा खोल कर बाहर देखा। बाहर कोई महिला दरवाजे पर खड़ी थी। दरवाजा खोला, तो शहर के किन्नरों की मुखिया बिंदिया थी।
‘नमस्ते साहब, मैडम जी को भेज दीजिए, कह दीजिए कि बिंदिया आई है दीवाली का इनाम लेने।’ बिंदिया ने अदब के साथ कहा।
‘बिंदिया, तुम्हारी मैडम जी तो बाजार गई हैं, दीवाली का सामान-वगैरह खरीदने।’ उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा।
‘ओ…! आज तो मेरी किस्मत ही खराब है…।’ बिंदिया ने चूड़ियों से भरे हाथ को माथे पर मारते हुए कहा।
‘अरे नहीं, इसमें किस्मत खराब होने की क्या बात है? तुम्हारा दीपावली का इनाम मैं दे देता हूं।’ उसने कहा।
‘अरे नहीं साहब, वो बात नहीं है। इनाम तो जब चाहे आते-जाते मैडम जी से ले लेंगे। किस्मत की बात तो इसलिए कही कि साल में तीन बार हम लोग इनाम मांगने निकलते हैं, होली, दीवाली और राखी पर। पूरा शहर घूमते हैं पैदल-पैदल, लेकिन चाय-पानी को बस यहां आपके घर आने पर मैडम जी ही पूछती हैं। प्यार से बिठाती हैं, चाय नाश्ता करवाती हैं और इनाम देती हैं। आज भी मैं घूम-घूम कर थक गई, तो सोचा अब मैडम जी के घर चलती हूं, दो घड़ी बैठ कर सुस्ता भी लूंगी और कुछ चाय-नाश्ता भी हो जाएगा। साथ वालियों से कहा कि तुम आगे की दुकानें और घर निबटा के आ जाओ, मैं मैडम जी के घर बैठी हूं, वहीं आ जाना। मैडम जी से बात करके अच्छा लगता है।’ बिंदिया ने पूरी भूमिका के साथ उत्तर दिया।
‘ओ…! ये बात है, मगर उसमें भी किस्मत खराब होने की क्या बात है, आ जाओ तुम अंदर। मैं बाई से कहता हूं तुम्हें चाय-नाश्ता करवा देगी। हो सकता है तब तक तुम्हारी मैडम जी भी आ जाएं।’ उसने कुछ मुस्कुराते हुए कहा।
‘नहीं-नहीं साहब आप क्यों परेशान होते हैं, मैं मैडम जी से इनाम लेने फिर आ जाऊंगी।’ बिंदिया ने कुछ विनम्रता से कहा।
‘इसमें परेशानी की क्या बात है, मुझे तो बनानी नहीं है चाय, बाई को बनानी है। और अभी तुमने कहा न कि थकी हो, तो आ जाओ अंदर बैठ जाओ, तुम्हारी साथ वाली आ जाएं तो चली जाना।’ उसने कुछ अधिकार पूर्वक कहा।

‘नहीं साहब, मैडम जी सोचेंगी कि देखो साहब को परेशान कर दिया, बिंदिया बाद में भी तो आ सकती थी।’ बिंदिया ने कुछ उलझन भरे स्वर में कहा।
‘तुम उल्टा सोच रही हो, तुम्हारी मैडम जी उल्टा मुझे डांटेंगी कि तुम जरा-सा चाय-नाश्ता नहीं करवा सकते थे? अब मुझे डांट से बचाना है, तो चुपचाप अंदर आ जाओ।’ कहते हुए वह दरवाजे से हट गया। कुछ सकुचाते हुए बिंदिया अंदर आ गई। अंदर आकर उसने बिंदिया को सोफे पर बैठने का इशारा किया और खुद अंदर बाई से पानी, चाय-नाश्ते की व्यवस्था को कहने और बच्चों को स्टडी की सफाई के निर्देश देने चला गया।
लौटा तो सामने के सोफे पर बैठ गया। बिंदिया कुछ सकुचाते हुए सोफे पर बैठी थी।
‘ये सब इनाम, पुरस्कार आपको ही मिले हैं साहब?’ बिंदिया ने ड्राइंग रूम की दीवारों पर, शेल्फ पर रखे मोमेंटो, सम्मान-पत्र देखे तो उत्सुकता से पूछा।
‘हां मुझे ही मिले हैं।’ उसने उत्तर दिया।
‘किसलिए मिले हैं साहब?’ बिंदिया ने उत्सुकता से पूछा।
‘मैं लेखक हूं… कहानियां, कविताएं लिखता हूं। उसी के लिए मिले हैं।’ उसने उत्तर दिया। इसी बीच बाई ट्रे में पानी के गिलास ले आई।
‘कविता लिखते हैं आप?’ बिंदिया की आंखों में एक चमक-सी उभरी।
‘हां… कविताएं भी और कहानियां भी।’ उसने संक्षिप्त उत्तर दिया।
‘मुझे स्कूल की हिंदी की किताबों में कविता पढ़ना बहुत अच्छा लगता था। कभी-कभी कुछ लिखती भी थी, ऐसा ही कुछ टूटा-फूटा।’ बिंदिया के स्वर में उदासी थी।
‘अब?’ उसने पूछा।
‘घर के साथ ही सब छूट गया? अब तो…’ बिंदिया ने उदास स्वर में कहा।
उसके सामने एक नया चेहरा खुल रहा था। किन्नर, जिनको सभ्य समाज हमेशा अपने से दूर रखने की कोशिश करता है, घृणा से देखता है, जो किन्नर खुद भी असभ्य और अभद्र तरीके से बातें करते हैं, उनका यह चेहरा भी होता है।
‘अब भी पढ़ा करो उसमें क्या है?’ उसने बिंदिया के चेहरे पर उदासी को घुलता देख कर कहा। लेकिन बिंदिया ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसका चेहरा बता रहा था कि अगर उसने इस प्रश्न का उत्तर दिया तो शायद भरभरा के रो पड़े। बिंदिया ने होंठों को भींच कर बस सिर को इनकार में हिलाया और आंखों में आने की कोशिश कर रहे पानी को अंदर ही पी जाने का प्रयास किया।
बिंदिया पांच-छह साल पहले तब अचानक सुर्खियों में आई थी, जब उसने शहर के सबसे प्रबुद्ध कहे जाने वाले क्षेत्र से नगरपालिका पार्षद का चुनाव जीता था। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के मजबूत प्रत्याशियों को बड़े अंतर से पराजित करके बिंदिया ने वह चुनाव जीता था। उससे पहले किसी किन्नर ने कोई चुनाव नहीं जीता था, इसलिए यह एक बड़ी घटना थी।
अपने कार्यकाल के पांच साल बिंदिया हमेशा खबरों में बनी रही। पार्षद का कार्यकाल समाप्त होने के बाद विधानसभा चुनाव भी लड़ी थी, लेकिन नाममात्र के वोट पाकर हार गई थी। अगला पार्षद का चुनाव भी उसने लड़ा, लेकिन उसमें भी बुरी तरह हार गई और बिंदिया को धीरे-धीरे सब भूल गए।
‘बिंदिया, मुझे तो लगा था कि तुम पार्षद बनने के बाद ये सब काम छोड़ दोगी।’ उसने बात को दूसरी तरफ मोड़ते हुए कहा।
‘नहीं साहब यह तो हमारी रोजी-रोटी है, इसको कैसे छोड़ देती? मैं तो उस समय भी इनाम मांगने निकलती थी, जब पार्षद थी। छोड़ देती तो आज क्या करती?’ बिंदिया ने कुछ आत्मविश्वास के साथ कहा।

‘तुम कहां की हो बिंदिया?’
‘यह बात हम कभी किसी को बताते नहीं हैं साहब, अपने घर-परिवार वालों की बदनामी के डर से।’ बिंदिया ने कुछ विनम्रता के साथ उत्तर दिया। फिर उसके चेहरे की तरफ कुछ क्षण देखने के बाद बोली- ‘लेकिन आप और मैडम जी तो बहुत अच्छे लोग हो, इसलिए आपको बता सकती हूं। मैं उत्तर प्रदेश की रहने वाली हूं साहब। उत्तर प्रदेश में कहां की हूं, वह नहीं बता सकती।’ इतने में बाई चाय और बिस्किट की ट्रे लाकर मेज पर रख गई। उसने एक चाय का कप और बिस्किट उठाया और बिंदिया को भी इशारा किया, बिंदिया ने भी चाय का कप और एक बिस्किट उठा लिया।
‘तुम ऐसी ही थीं बचपन से? मतलब ये जो आज तुम हो ऐसी बचपन से ही थीं… या…’ उसने पूछा। बिंदिया ने कोई उत्तर नहीं दिया। चुपचाप साड़ी के पल्लू से खेलती रही।
‘अगर नहीं बताना तो मत बताओ, मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगेगा। मैंने बस यों ही पूछ लिया।’
‘हम अपने बारे में कुछ भी किसी को नहीं बताते हैं साहब, बहुत छिपा कर रखते हैं अपने आप को।’ कह कर बिंदिया चुप हो गई। उसने महसूस किया कि बिंदिया की भाषा बातचीत के क्रम में धीरे-धीरे परिष्कृत हो रही है, वह उन शब्दों का भी उपयोग कर रही है, जिनको किसी किन्नर के मुंह से सुनने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
‘लेकिन आप पूछ रहे हैं, तो मन कर रहा है कि आपको मना नहीं करूं, बता दूं सब। मैं बचपन से ऐसी नहीं थी। मैं लड़का थी। मैंने लड़के के रूप में ही जन्म लिया था। मेरे जन्म लेने पर भी उसी तरह खुशियां मनाई गई थीं, जैसे लड़के के जन्म लेने पर मनाई जाती हैं। तीन लड़कियों के बाद मेरा जन्म हुआ था, इसलिए मेरे घर में तो खुशियां और भी ज्यादा मनाई गई थीं। तब किसको पता था कि मैं भी…’ कहते हुए बिंदिया ने बात को बीच में ही छोड़ दिया और चाय पीने लगी।
‘रेलवे स्टेशन के पास ही हमारा पुश्तैनी घर था, अब भी है। छोटा-सा घर, जिसमें दादी को मिलाकर हम छह जन रहते थे। पिताजी एक प्राइवेट प्राइमरी स्कूल में मास्टर थे, साथ में घर में कुछ ट्यूशन वगैरह भी पढ़ाते थे। जैसे-तैसे करके हमारा घर उनकी कमाई से चलता था।’ कहते हुए बिंदिया की आंखों में नमी आ गई। आवाज में भी कुछ भर्राहट आ गई।
‘ब्रजेश नाम था मेरा। तीनों बहनें और मैं स्कूल जाते थे। बहुत प्यारी बहनें थीं मेरी, बहुत लाड़ से रखती थीं मुझको। खूब मस्ती करते थे हम चारों, और पिटते भी खूब थे, स्कूल में भी, घर में भी। हां लेकिन पढ़ाई में मैं बहुत अच्छी थी। आठवीं तक क्लास में सबसे ज्यादा नंबर लाकर मैं ही पास होती थी। बहुत अच्छे दिन थे वे। गरीबी थी, मगर दिन अच्छे थे। अब गरीबी नहीं है मगर…’ बिंदिया ने बात को बीच में ही छोड़ दिया।
‘अच्छा! फिर ये सब कैसे? मतलब तुम ये कैसे बनीं… जो आज हो?’
‘आठ साल की उमर तक आते-आते मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं लड़का तो हूं, लेकिन मेरे अंदर सब कुछ लड़कियों जैसा है। लड़कियों के साथ खाना-पीना, उनके साथ नहाना, उठना-बैठना मुझे पसंद आने लगा। लड़कियों की तरह कपड़े पहनना मुझे अच्छा लगता था, बहनें कभी-कभी हंसी-मजाक में मुझे अपने कपड़े पहना देतीं, तो मेरी उन कपड़ों को उतारने की इच्छा नहीं होती थी। तब समझ नहीं आता था कि यह सब क्या है, मुझे ऐसा क्यों लगता है?’ बिंदिया अब बहुत स्थिर होकर और अच्छी भाषा में बात कर रही थी।

‘ऐसे ही बढ़ती गई मैं। जब आठवीं क्लास में आई, तब उमर यही कोई तेरह-चौदह की रही होगी…। उस उमर में आने पर मुझे और अजीब लगने लगा, ऐसा मन करता था कि मैं किसी लड़के से प्यार करूं, उसके साथ घूमूं, शादी करूं उसके साथ। उसके बच्चों की मां बनूं। कई बार खूब रोती भी थी अकेले में कि यह सब मेरे साथ क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है।’ इतना कह कर बिंदिया कुछ देर को फिर से चुप हो गई।
‘फिर क्या सचमुच किसी लड़के से प्यार किया तुमने उस समय?’
‘किया… लेकिन उसे समझता कौन? वह तो बहुत गंदी बात थी। भला लड़कों-लड़कों के बीच भी प्यार होता है कहीं? बहुत से साथ पढ़ने वाले लड़के ऐसे थे, जो मुझे अच्छे लगते थे, दिल उनकी तरफ खिंचता था। उन्हीं दिनों कविताएं भी लिखनी शुरू की थी मैंने। प्यार की कविताएं। जो मेरे साथ हो रहा था, वह सब कुछ उन कविताओं में लिखती थी।’ बिंदिया का चेहरा उदासी से भरा हुआ था।
‘तुमने पढ़ाई कहां तक की?’ उसने बात को बदलते हुए पूछा।
‘मैंने बारहवीं क्लास तक रेगुलर पढ़ाई की, मगर बारहवीं की परीक्षा नहीं दी।’
‘क्यों?’
‘उस समय तक परेशानी बढ़ भी गई थी। दसवीं क्लास पास की तब मैं सोलह साल की थी। मेरे अंदर की औरत अब और ज्यादा परेशान करने लगी थी मुझे। मैं अंदर से पूरी तरह औरत हो गई थी। कुछ-कुछ बाहर से भी। प्यार के लिए मेरी छटपटाहट और बढ़ गई थी। उसके बाद के दो साल में दो-तीन लड़कों से प्यार किया मैंने। लेकिन प्यार तो मैंने ही किया, उनके लिए तो प्यार-व्यार जैसा कुछ था नहीं। मैं तो उनके लिए एक शरीर थी।…’ कुछ अटक-अटक कर, सकुचाते हुए बिंदिया ने बात पूरी की।
‘फिर पढ़ाई क्यों छोड़ी?’
‘उन्हीं दिनों एक किन्नर ममता से दोस्ती हो गई। उसने ही धीरे-धीरे अपनी दुनिया के बारे में मुझे सब कुछ बताया। मुझे भी ऐसा लगने लगा था कि शायद मेरी दुनिया भी यही है। उसके साथ…’ बिंदिया कोई बात कहते-कहते असहज हो गई।
‘उसने तुमको यह बना दिया? और तुम्हारी पढ़ाई छुड़वा दी?’
‘उसने नहीं, ये तो मेरा ही फैसला था। बारहवीं की परीक्षा के बस दो महीने पहले की ही बात है, मेरी ही क्लास के पांच-छह लड़कों ने मेरे साथ स्कूल में ही छत पर…’ बिंदिया की आवाज में दर्द उभर आया। ‘बदनामी के डर से…’ कह कर बिंदिया फिर चुप हो गई। बाई आकर चाय के खाली कप और प्लेटें उठाने लगी।
‘चाय और बना लाओ बाई, और हां देखो तुम्हारी मैडम उपमा बना कर रख गर्इं हैं, उसे भी गरम करके ले आओ। बच्चों को भी दे देना।’ उसने बाई से कहा।
‘फिर क्या हुआ?’ बाई के जाते ही उसने पूछा।

‘बस फिर मुझे लगा कि सबसे अच्छा यह है कि मैं ही इन लोगों के जीवन से चली जाऊं। ममता ने मुझे बताया था कि यहां इस शहर में किन्नरों का सम्मेलन हो रहा है, देश भर से किन्नर यहां आ रहे हैं और वह भी जा रही है। मैं भी घर से चुपचाप किसी को बताए बिना उसी ट्रेन में सवार हो गई। यहां आ गई। ममता ने मुझे आते ही यहां की गुरु से मिलवा दिया। बहुत भली थीं गुरु, भगवान उनको स्वर्ग में जगह दे। बुजुर्ग हो चुकी थीं। मुझे उन्होंने बहुत डांटा-फटकारा, घर वापस लौट जाने को कहा। मगर मैंने लौटने के लिए घर नहीं छोड़ा था। मैंने भी जवाब दिया कि घर तो वापस किसी हाल में नहीं जाऊंगी, यहीं ट्रेन से कट कर मर जाऊंगी। यह सुन कर गुरु भी चुप हो गर्इं। सम्मेलन के बाद ममता वापस लौट गई और मैं गुरु के ही पास रह गई। और आज आपके सामने हूं।’ बिंदिया ने कहा।
‘फिर कभी घर लौट कर नहीं गर्इं तुम?’ उसने पूछा।
‘पहले चार-पांच साल तक तो नहीं गई। ममता से ही खबर लेती रहती थी घर की। घर की हालत खराब है, बहनों की शादी नहीं हो रही है, पिताजी बीमार रहने लगे हैं, ये सब पता चलता रहता था मुझको। मदद करना चाहती थी मगर कैसे करती? मदद करने जाऊंगी तो उन लोगों को पता चल जाएगा कि मैं क्या हो गई हूं। तीनों बहनों के लिए बहुत दिल फटता था मेरा, उन लोगों की हालत सचमुच बहुत खराब थी। जब भी ममता की तरफ से कोई खबर आती तो, बुरी खबर ही आती और पूरा दिन मेरा रोने में बीतता था। गुरु मुझे हिम्मत देतीं, फिर कभी खुद भी मेरे साथ रोने लगतीं।’ बिंदिया ने उत्तर दिया।
बाई आकर चाय के कप और उपमा की प्लेटें रख गई। साथ में एक प्लेट में कुछ मिठाइयां भी रख गई।
‘लो… कुछ खा लो, सुबह की निकली हो भूख लग आई होगी। मुझे भी लग रही है।’ कहते हुए उसने एक प्लेट उठा ली। बिंदिया ने भी एक प्लेट उठा ली।
‘फिर क्या हुआ?’ उसने एक चम्मच उपमा मुंह में रखते हुए पूछा।
‘फिर एक दिन ममता से पता चला कि सबसे बड़ी बहन की शादी तय हो गई है। पिताजी के पास पैसा नहीं है, तो वे औने-पौने में घर बेचने का सोच रहे हैं। मेरी हालत यह सोच कर खराब हो गई कि बिना घर के ये लोग आगे की जिंदगी कैसे काटेंगे। गुरु को सब बताया, तो उन्होंने कहा कि अब तू अपनी सच्चाई उन लोगों को बता दे और जो पैसे मैं दे रही हूं, वो जाकर अपने पिताजी को दे आ। जैसा गुरु ने कहा था वैसा ही मैंने ममता को करने को कहा। ममता ने ही जाकर मेरे बारे में सब बताया। फिर मैंने ममता के हाथ ही गुरु के दिए पैसे भी भिजवा दिए।’
‘तुम खुद नहीं गर्इं पैसे देने?’ उसने आश्चर्य से पूछा।
‘नहीं… मैं जाती, तो हो सकता है बहन की शादी ही टूट जाती। ममता ही चुपचाप से जाकर पिताजी को पैसे दे आई थी। शादी खूब धूमधाम से हो गई। मैं जा तो नहीं पाई, मगर दिल को तसल्ली हो गई कि बहन की शादी ठीक से हो गई। मैं कुछ कर पाई उन लोगों के लिए।’ बिंदिया ने ठंडी सांस छोड़ी।
‘फिर?’ उसने पूछा।

‘फिर एक दिन गुरु भी यहां की सब जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ कर भगवान के पास चली गर्इं और मैं गुरु की जगह गुरु हो गई। यहां अच्छी कमाई होती थी। मैंने अपनी कमाई में से ममता के हाथ घर पर पैसा भेजना शुरू कर दिया। घर की मरम्मत करवाई, दोनों छोटी बहनों की शादी खूब धूमधाम से करवाई। बेटे ब्रजेश को जिस उम्मीद में पैदा किया था मां-पिताजी ने, उन उम्मीदों को ब्रजेश बन कर तो नहीं, हां बिंदिया बन कर पूरा कर दिया। ऐसा लगा कि कोई वजन उतर गया है सिर पर से।’
‘तुम कभी गर्इं नहीं, कभी फिर मिली नहीं उनसे?’
‘गई, कई बार गई। लेकिन घर नहीं गई, उस शहर भी नहीं गई। बुरका पहन कर जाती हूं और एक स्टेशन पहले उतर जाती हूं। मां और पिताजी वहीं आ जाते हैं मिलने, छिपते-छिपाते। थोड़ी देर मिल कर वापस हो जाती हूं। घर जाऊंगी तो बहनों की बसी-बसाई गृहस्थी उजड़ने का डर है, कौन पसंद करेगा कि उसकी बीवी का भाई एक किन्नर है! घर छोड़ने के बाद बहनों से कभी नहीं मिल पाई, इस जनम में पता नहीं उनसे फिर मिलना होगा भी कि नहीं।…’ कहते हुए बिंदिया सिसकने लगी।
‘अरे… अरे….! रोने की क्या बात है? तुमने तो अपने सारे फर्ज पूरे किए हैं। किसी भी मां-बाप को तुम्हारे जैसी संतान पाकर गर्व होगा। रोओ मत… रोने वाला कोई काम नहीं किया है तुमने। बहनों से कभी न कभी जरूर मुलाकात होगी तुम्हारी। चिंता मत करो। एक दिन वो ही तुमको ढूंढ़ती हुई तुम्हारे घर तक आएंगी।’ उसने कुछ समझाइश भरे अंदाज में कहा।
‘आपकी बात सच हो साहब।’ बिंदिया ने साड़ी के पल्लू से आंखें पोंछते हुए कहा।
‘और यह अचानक नगरपालिका पार्षद का चुनाव क्यों लड़ लिया था तुमने?’ उसने विषय बदलने के लिए कुछ हंसते हुए पूछा।
‘मैंने चुनाव लड़ा नहीं था साहब, लोगों ने मुझे लड़वा दिया था। जो दोनों पार्टियों से चुनाव लड़ रहे थे, उन दोनों को कोई पसंद नहीं करता था, तो बस उस चक्कर में मुझे निर्दलीय खड़ा कर दिया। मैंने भी सोचा था कि जब ये लोग कह रहे हैं, अपने पास से पैसे लगा रहे हैं तो लड़ लो चुनाव, उसमें क्या है। मगर लोगों ने तो जितवा कर पार्षद ही बना दिया।’ बिंदिया ने हंसते हुए उत्तर दिया।
‘फिर तुमने विधायक का भी चुनाव लड़ लिया?’ उसने प्रश्न किया।
‘मति मारी गई थी साहब, भूल गई थी कि चुनाव बिंदिया जान नहीं जीती थी, नोटा जान जीती थी।’ बिंदिया ने हंसते हुए उत्तर दिया।
‘नोटा जान? ये क्या बला है?’ उसने आश्चर्य से पूछा।

‘असल में उस समय यह जो आजकल नोटा है न, आया नहीं था। अगर किसी को वोट नहीं देना हो, तो क्या करे, इसीलिए उस समय जगह-जगह हम लोग चुनाव जीते थे साहब। कोई विधायक बना, कोई पार्षद, तो कोई मेयर बना। हम सब नोटा ही थे। लोगों को किसी को वोट नहीं देना था, तो हमें जिता दिया। दोनों पार्टियों से नाराज थे, दोनों को सबक सिखाना था, तो हमें जिता दिया। अब वो जीत कोई हमारी थोड़े ही थी। मगर हम सबको ये गलतफहमी हो गई थी कि हम ही जीते हैं, उसी चक्कर में आगे भी चुनाव लड़े और हार कर वापस अपनी दुनिया में लौट गए। उस समय अगर गुरु जिंदा होते तो मुझे चुनाव लड़ने ही नहीं देते।’ बिंदिया ने गंभीर होते हुए कहा।
‘तुम इतनी समझदार हो, पढ़ी-लिखी हो, तो निकल क्यों नहीं जातीं इस तरह की जिंदगी से?’ उसने कुछ समझाइश भरे स्वर में कहा।
‘अपनी ही जिंदगी से भाग कर जाऊंगी कहां साहब?’ ०

 

 

 

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