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कहानी : अगली बार अगली बार

कुएं के पास पीपल का पेड़ था। पेड़ की डाली फैल कर कुएं के ऊपर तक जा पहुंची थी। सुरक्षित जगह देख कर कुएं की ऊपर की डालों पर बया पक्षी ने अपना घोंसला बना लिया। उसका घोंसला देख गौरैया, मैना, तीतर, बटेर, मैना आदि कई पक्षियों ने भी पेड़ की शाखाओं पर अपने घोंसले बना लिए। घोंसले तैयार हो चुके तो पक्षियों ने अंडे दिए। कुछ समय बाद अंडों से नन्हे पक्षी निकल आए और चहचहाने लगे।

Author March 11, 2018 3:18 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

कुएं के पास पीपल का पेड़ था। पेड़ की डाली फैल कर कुएं के ऊपर तक जा पहुंची थी। सुरक्षित जगह देख कर कुएं की ऊपर की डालों पर बया पक्षी ने अपना घोंसला बना लिया। उसका घोंसला देख गौरैया, मैना, तीतर, बटेर, मैना आदि कई पक्षियों ने भी पेड़ की शाखाओं पर अपने घोंसले बना लिए। घोंसले तैयार हो चुके तो पक्षियों ने अंडे दिए। कुछ समय बाद अंडों से नन्हे पक्षी निकल आए और चहचहाने लगे। पीपल का पेड़ आबाद हो गया। सुबह शाम दोनों समय पक्षियों का कलरव गूंजता। यह कलरव सभी को लुभाता। आने-जाने वाले भी उन्हें देखने-सुनने के लिए रुक जाते और ऊपर पेड़ पर बैठे परिंदों को देखते। सभी पक्षी हिल-मिल कर रह रहे थे। एक दोपहर तेज हवा चली। आसमान में बादल छा गए। मौसम खराब देख कर सभी पक्षी अपने घोंसलों में लौट आए। तभी एक बंदरिया भी अपने बच्चे को छाती से चिपकाए पेड़ के नीचे आ बैठी। थोड़ी देर में बूंदाबांदी होने लगी। सभी पक्षी चिंतित हो उठे। बंदरिया भी ठिठुरती हुई पेड़ पर चढ़ने लगी। उसके चढ़ने से पेड़ की शाखाएं हिलने लगीं। डर के मारे पक्षी चिल्लाने लगे- बंदरिया बहन, बंदरिया बहन, पेड़ पर हमारे घोंसले बने हुए हैं, इस तरह पेड़ की शाखाओं को हिलाओगी तो वे टूट जाएंगे।
– घोंसले में बच्चे अभी छोटे हैं। जिनके पंख अभी छोटे हैं।
– मेरे बच्चों ने तो अभी उड़ना ही नहीं सीखा।
– मेरे तो अभी अंडे रखे हुए हैं, जो गिरेंगे तो फूट जाएंगे।
चारों ओर से बया, तीतर, गौरैया, मैना- सभी पक्षियों ने बंदरिया को पेड़ पर चढ़ने से मना कर दिया। अब बारिश जोर से होने लगी थी। यह देख बंदरिया ने कहा, ‘तुम सबको अपने-अपने बच्चों की फिक्र है, मैं अपने बच्चे को लेकर कहां जाऊं? यह भी तो भीग रहा है। कोई मेरे बच्चे के बारे में भी तो सोचो।’
उसकी बात सुन मैना बोली- ‘बात तो तुम्हारी ठीक है बहन! बारिश में तुम अपने बच्चे को लेकर कहां जाओगी, पर तुम्हारे रहने के लिए हमारे पास कोई घोंसला नहीं है।’
मैना की बात सुन कर गौरया बोली, ‘इस पेड़ के तने पर कोई खोखल है क्या, बंदरिया उसमें जाकर रह सकती है।’ तभी तीतर ने कहा कि यह पेड़ नया है। इसलिए इसमें कोई खोखल नहीं।
‘पुराने पेड़ में होती है खोखल।’
बटेर ने कहा- ‘तुम कोई दूसरा पेड़ देख लो, जिसके तने में खोखल हो।’
बंदरिया ने कहा- ‘अब बारिश में मैं कहां ढूंढ़ने जाऊं दूसरा पेड़।’
‘यहां भी तो भीग रही हो’, तीतर ने कहा। ‘घोंसला नहीं है तो क्या हुआ, कोई ऐसा पेड़ क्यों नहीं तलाश लेती, जिसकी खोखल में तुम और बच्चा दोनों सुरक्षित रह सकें।’
बंदरिया को बात जंच गई। हां, यही ठीक रहेगा। समय रहते मैं कोई दूसरा पेड़ देख लेती हूं।
उसे विचार करते देख मैना ने कहा, ‘बहन, उधर उत्तर दिशा में जहां तक मुझे याद है, एक बरगद का पेड़ है।’
गौरैया बोली, ‘हां… हां मैंने भी देखा है। उसके तने में एक खोखल मैंने देखा है। तुम वहां चले जाओ बहन।’
बंदरिया छलांग भरती हुआ उत्तर दिशा की ओर चल पड़ी। बारिश में भीगते हुए उसने बरगद का पेड़ तलाश लिया। पेट से चिपके बच्चे ने पेड़ के खोखल को देखा और खुश हो गया। जैसे ही बंदरिया ने पेड़ के खोखले तने में झांक कर देखा, एक बड़ा अजगर अंदर बैठा नजर आया।

– ओहो, तुम यहां दुबके पड़े हो… निकलो बाहर… मुझे अंदर आना है। बारिश में सर्दी के मारे बुरा हाल है हम मां-बेटे का। देखो, मेरा बच्चा सर्दी से कांप रहा है। जल्दी करो।
– मैं क्यों बाहर निकलूं? यह तो मेरा घर है। मेरा पूरा परिवार अंदर है। तुम यहां कैसे चली आई हो? बिल में सांप और चूहे रहते हैं। अभी तो उन पर भी संकट आया हुआ है। देखो जमीन पर पानी भर गया है, तो उनके बिल में भी पानी भरा ही होगा।’
– वह सब तो ठीक है, अब मैं अपने छोटे बच्चे को लेकर कहां जाऊं? सभी को अपनी पड़ी है। मेरे और बच्चे के बारे में तो कोई सोच भी नहीं रहा है।’
बंदरिया की बात सुन कर अजगर को दया आ गई। उसने कहा- ‘अपने बच्चे को लेकर ऐसा करो, तुम किसी गुफा में चले जाओ।’ मजबूरी के चलते बंदरिया को अजगर की बात माननी पड़ी।
– कहां है गुफा?
– उधर पूरब की पहाड़ी पर एक गुफा है, जिसे मैं जानता हूं। बाकी का मुझे पता नहीं, पर ध्यान से जाना। उसमें हो सकता है अभी भेड़िए छिपे हों।
– ओ हो! जाकर देखती हूं। बंदरिया के पास इसके अलावा कोई दूसरा उपाय भी नहीं था। वह बारिश में भीगती हुई चल पड़ी। उसका छोटा बच्चा मां के पेट से फिर चिपक गया। गुफा के पास पहुंच कर सतर्कता के साथ बंदरिया ने आवाज निकाली- खों खों, खों खों। बदले में कोई आवाज उसे सुनाई नहीं दी। तो वह गुफा के मुहाने पर जाकर अंदर देखने लगी। अंदर अंधेरा था, पर कई जोड़ी लाल-लाल आंखें चमकती नजर आर्इं।

एक अजीब-सी दुर्गंध भी आ रही थी। बंदरिया ने जोर से सांस खींची। वह समझ गई कि भीतर भेड़िए छिपे हुए हैं। अब वह कहां जाए! ये इतने खतरनाक हैं कि अभी अगर कुछ हलचल हुई तो जान पर बन आएगी। इनसे तो बात भी नहीं की जा सकती। गुमसुम बंदरिया इधर-उधर गर्दन घुमा कर देखने लगी।
एक जगह ऊपर से पहाड़ी के झुके होने की वजह से कोटर जैसा बना हुआ था। अपने बच्चे को लेकर वह वहां जाकर बैठ गई। अब वे भीग नहीं रहे थे, पर सर्दी लग रही थी। वे दोनों गीले हो चुके थे। बंदरिया ने अपने बच्चे को सहलाया- ‘आज तुम मुझसे चिपक कर सो जाओ और गर्मी पा लो। कल से मैं भी अपना घर बना लूंगी।’ आश्वस्त होकर बच्चा मां से लिपट कर सो गया। सुबह होते ही बंदरिया वहां से चल पड़ी। बारिश भी आधी रात के बाद रुक गई थी। वह वापस उलटे रास्ते चल पड़ी, जहां से आई थी।
– मां अपना घर बनाओगी? बंदरिया के बच्चे ने पूछा।
– अब तो बारिश रुक गई है बच्चा, बंदरिया बोली। अब घर बना कर कोई क्या करेगा? अब अगली बार बारिश आने से पहले घर बना लेंगे। अभी तो भूख लगी है, चलो कुछ खाते हैं। और बंदरिया एक नए पेड़ पर चढ़ गई।

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