ताज़ा खबर
 

कहानी- नेतृत्व

अब क्या गढ़ई का पानी चुरुआ से पी जाऊं कि सोख लूं?... तुम्हीं बताओ बिन्नो के पापा!... रोज रमेसवा बो राड़ पीटती है तुम्हारे जाते।’
Author January 7, 2018 05:19 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सोनी पांडेय

अब क्या गढ़ई का पानी चुरुआ से पी जाऊं कि सोख लूं?… तुम्हीं बताओ बिन्नो के पापा!… रोज रमेसवा बो राड़ पीटती है तुम्हारे जाते।’ औरत कहते-कहते रो पड़ी। बर्दाश्त की सीमा टूट रही थी। मुन्ना चुल्हानी बैठे मुंह गिराए हथरोटिया जल्दी-जल्दी खाए जा रहे थे। जानते थे, देर होते काम नहीं मिलेगा। पेशे से राज मिस्त्री मुन्ना को बरसात के दिन में काम मिलने में खासी मुश्किल होती थी। लोग घर बनवाने का काम बरसात में न के बराबर करते थे। बेचारे रोटी की जुगत में बेचैन, औरत को नाली-पानी की पड़ी थी। झल्ला कर आधी रोटी छोड़ कर उठ गए।  औरत पछताने लगी। झट आंचल से आंसू पोंछ पीछे भागी- ‘हे सुनो, बिन्नी के पापा.. गोड़ धरते हैं खाकर जाओ।’ वह कहते हुए गिड़गिड़ा रही थी। मुन्ना दनदनाते साइकिल निकाल चल पड़े। आज साथ रोटी भी नहीं ले गए। औरत चौखट पर बैठ दम भर रोने के बाद उठी और घर के अन्य काम निबटाने लगी। चिंता थी कि चिता, सुलगती ही जा रही थी। रह-रह कर कान में महेसा बो की धमकी गूंजती- कह देती हूं रानी! कान खोल कर सुन लो! जो एक बून भी पानी मेरे दुवार पर चढ़ा, तो माथ गिरेगा। वह भयक्रांत थी कि कभी दुवार पर लउड़-लाठी चल सकती है नाली को लेकर। टोले के सारे मर्द काम पर निकल चुके थे। बादल उमड़ता चला आ रहा था। उसे नाली की चिंता, मर्दों को काम की।…

आजाद चौक के दाहिनी तरफ गांधीजी की विशाल मूर्ति के नीचे बने गोल चबूतरे पर चारों तरफ सिर और गाल पर हाथ धरे मजदूर, मिस्त्रियों का समूह चिंता मग्न बैठा था। सुबह के दस बज चुके थे और अभी तक एक को भी काम नहीं मिला था। ठेकेदार भी उदास था। बार-बार बीड़ी फंूकता और सबके चेहरे देख कर नजर घुमा लेता। लगभग सभी एक गांव के थे। बहुत देर से चुप बैठे महेस ने मुन्ना से कहा-‘काहे नहीं मानते हो मुन्ना! तुम्हारे घर का गू-मूत मेरे दुवार पर बह कर आता है, तो औरत रांड मचाती है रोज।
मुन्ना की बेचैनी और बढ़ गई- ‘तुम्हीं बताओ भाई की हम पानी कहां बहाएं?’
महेस तमक उठा-‘ई कौन बात हुआ… कुछ भी करो, हमारे दुवार पर तुम्हारा पानी नहीं आना चाहिए।’
दोनों में तड़का-तड़की बढ़ता देख ठेकेदार ने हस्तक्षेप किया-‘काहें बीच बजार लड़ते हो यार! शांति रखो और तनी हमको भी बताओ की बात क्या है।’
मुन्ना रोनी सूरत लिए बिफर पड़ा- ‘आ बात क्या है बाऊ!… हमारे टोले ने परधानी में परधान को ओट नहीं दिया और ऊ अब न चकरोट बनवाता है न नाली। कच्ची नाली की बात हुई थी, उसे भी ई महेसवा निकलने नहीं देता अपने दुवार से। कहता है कच्ची नाली गंदा पानी सोख कर बेमारी फैलाएगा। अब तुम्हीं बताओ कि ई बरखा-बुन्नी का पानी हम कहां ले जाएं ससुर।’
पसीना गमछे से पोंछते हुए मुन्ना रोआंसा हो गया। सबकी सहानुभूति मुन्ना की तरफ हुई। गांधी चबूतरे पर काम के अभाव में पंचायत बैठ गई। ठेकेदार मजदूर यूनियन का नेता भी था, इसलिए सभी उसकी बात सिर झुका कर मानते। सबसे वरिष्ठ रामखेलावन ने पंचायत का नेतृत्व संभाला। दोनों पक्षों की बात बारी-बारी से सुनी गई। मुन्ना सही होते लाचार था, महेस बार-बार कुतर्क करता।
रामखेलावन खैनी ठोक जीभ में दबा कर बोला- ‘ई बताओ महेसा कि बरसात का पानी कैसे रोकोगे किसी का। इसको तो कनून भी नहीं रोक सकता यार! फिर तुम कैसे रोक सकते हो?’
महेस की आवाज में कनून का नाम सुन नरमी आ गई-‘…हम का करें भइया, रोज खट-मर कर जाओ तो औरत छिप्पा भर ओरहन से पेट भर देती है। अब तुम्हीं बताओ कि इसकी नाली का पानी हम काहें सहें?’
मुन्ना चुप था। धीरे-धीरे फुसफुसाहट बढ़ी और बात निकल कर सामने आई कि लगभग कोइरियाने में यह हर घर की समस्या थी। ठेकेदार सब दम साधे सुन रहा था। मुस्कुराते हुए कहा-‘मेरी बात मानोगे?’

सबने हां में गर्दन हिलाई। ठेकेदार ने बीड़ी बुझा कर फेंकते हुए पूछा-‘तुम्हारी बस्ती सोसाइटी टोले से सटी है?’ सबने कहा- हां।
‘गांव से निकासी का चकरोट भी वहीं से निकलता है न?’ सबने कहा- हां।
ठेकेदार ने हंस कर कहा- ‘फिर करना का है… सब लोग आपस में लड़ना छोड़ अपनी-अपनी कच्ची नाली चकरोट और सोसाइटी भवन की ओर खोल कर छोड़ दो। आखिर है तो बरसात का पानी न? कहां बहाओगे? जब पूरा गांव डबहा भर पानी में डूब कर आए-जाएगा तो खुदे परधान का कपार खाएगा, फिर देखो कैसे नहीं बनती है पक्की नाली तुम्हारे टोले में। जब आते-जाते हाकिम का चाबुक चलेगा, कुल परधानी हरियर हो जाएगी।’
सबके चेहरे खिल गए। सबने एक-दूसरे को खैनी ठोक कर बांटी और अपने-अपने घर लौट गए। अगले दिन सबके सब भिनसहरे फरुआ लेकर घर से निकले। पानी रात से ही टिपिर-टिपिर बरस रहा था। अपने-अपने दुवार से नाली काट कर सोसाइटी भवन की ओर निकाल दी। देखते-देखते रास्ता गढ़ही में बदल गया। नमी पाकर खडंजा उखड़ने लगा, तो कुछ गांव के दबंग गरजते हुए कोइराने की ओर आए।
रामखेलावन आठवीं पास टोले का सबसे वरिष्ठ आदमी था। उन्हीं के टोन में उत्तर दिया- ‘का करें बाऊ, बरखा का पानी समुंदर बन सोखेंगे तो नहीं न। जाइए जहां मन करे रपट लिखा दीजिए… पानी तो वहीं बहेगा। अउर हां, एक बात अउर सुन लें महराज! हमारी जनानियां इस बार आपका रोपनी नहीं करेंगी… आन गांव के लोग अच्छा पैसा देते हैं।’ एक दांव और फेंका।

लड़ने आई पलटन को समझते देर न लगी कि अंदर कुछ खिचड़ी पक रही है। वे लौट कर प्रधान के दुवार पर आए। सारा मामला सुन कर प्रधान लाव-लश्कर ले पहले थाने फिर कोइरियाने पहुंचे। पैसा फेंक झूठ-सांच मुकदमा लिखाया। टोले के सारे मर्द काम पर शहर की ओर निकल चुके थे। दरोगा रामखेलवाने के दरवाजे पर जम कर मां-बहन एक कर लौट गया। प्रधान दरोगा के दम पर अपने आदमियों से मिट्टी पटवा कर नाली बंद करवा गरजता गांव में लौट गया। इधर रामखेलावन की पत्नी ने लड़के को भेज खबर पठाया कि घर पर पुलिस तुम्हें खोजते आई थी, वह ठेकेदार की शरण में भाग गया। ठेकेदार सुनते ही हंस पड़ा-‘तुम लोग की इहे कमी है कि तनी-सी बड़कवा हूंसा नहीं कि पोकने लगते हो। अरे यार, बताया था कि कानूनन बरखा का पानी कोई नहीं रोक सकता। डट कर लोहा लो। ई बड़कवा लोग इहे तो चाहते हैं कि हम लोग आपस में लड़ते रहें और ऊ मलाई काटें।’
ठेकेदार गुस्से में था। रामखेलावन पुलिस के डर से सहमा गिड़गिड़ाने लगा-‘अब आगे क्या करें?’
करना क्या है, वे डाल-डाल चलें तो तुम पात-पात चलो। बाकी लिख के देता हूं, वे बिगाड़ कुछ न पाएंगे। कनून का डंडा घुसते ही भाग खड़े होंगे। ठेकेदार ने विश्वास दिलाया, तो रामखेलावन की हिम्मत बढ़ी। शाम को साथियों संग गांव पहुंचते ही नाली का जायजा लिया और फरुआ से मिट्टी हटा कर फिर से नाली खोल दी। प्रधान और कोइरियाने में गुरिल्ला युद्ध छिड़ गया। वह रात को पटवाता, ये लोग दिन में नाली खोलते। हफ्ते भर की सह-मात से प्रधान चिढ़ गया। दरोगा को फिर से पैसा देकर रामखेलावन को जेल में डलवा नाली पटवा दी। मुन्ना और महेस शहर भागे। ठेकेदार पर बरस पड़े- ‘तुम तो कहते थे कि वह हमारा कुछ नहीं कर सकता, कनून है। अब बताओ! भइया जेल गए।’ दोनों डरे थे।
ठेकेदार ने बीड़ी सुलगाई। टहलता रहा और अचानक बोल पड़ा-‘चलो मेरे साथ।’

तीनों गांव लौटे। पंचायत बैठी। ठेकेदार ने निर्णय सुनाया- ‘हमारे बड़े नेता कहते हैं दमन को आंदोलन से तोड़ा जाता है, चलो मेरे साथ।’ लगभग पूरा कोइरियाना थाने की ओर बढ़ चला। वह आगे-आगे, जनता पीछे। इंकलाब जिंदाबाद से लेकर हर जोर जुर्म के टक्कर से… जैसे नारे हवा में गूंजने लगे। पलटन ने थाने का घेराव कर सामने की सड़क पर चक्का जाम कर दिया। औरतें-बच्चे सड़क पर बैठ गए। थाने में बमुश्किल चार सिपाही थे। तुरंत थानेदार को खबर की। उसके आते-आते लंबा जाम लग गया। कुछ पत्रकार भी फोटो खींचने लगे। अखबार के लिए अच्छा मसाला था। दरोगा भनभनाते हुए जीप से उतरा और लाठियां भांजने लगा। ठेकेदार डंडे खाने का आदी हो गया था। टस से मस नहीं हुआ, तो लोगों को बल मिला। देखते-देखते ठेकेदार के नेतृत्व में लोग पुलिस-दरोगा पर टूट पड़े। वे किसी तरह जान बचा कर भागे और वायरलेस से अधिक संख्या में जिले से गारद बुलाई गई। जाम गांव-कस्बों की सीमा लांघ जिले की ओर बढ़ता जा रहा था। जिले के आला अफसरों के मोबाइल घनघनाने लगे। शहर से टीवी चैनल वालों का जत्था भी खबर पा सरपट घटना स्थल की ओर भागा। हालत बेकाबू होते देख डीएम खुद वहां पहुंचे और घटना की जानकारी ली। जाम हटवा कर बीच का रास्ता निकालने की ठेकेदार से पेशकश की।

प्रधान भी पूरी तैयारी में था। मामला आन-बान-शान का बन चुका था। लखनऊ तक जुगत भिड़ा रहा था कि नाली न बने, वरना पार्टी कमजोर हो जाएगी। कुछ बड़े नेता मंत्री तक पहुंचे। अब मामला व्यक्ति से पार्टी का बन चुका था। डीएम पर दबाव पड़ रहा था कि रामखेलावन छूटना नहीं चाहिए। जाम बढ़ता जा रहा था और बीच के रास्ते की शर्त रामखेलावन की मुक्ति से होकर गुजरती थी। ठेकेदार ने यूनियन को खबर की। मजदूर यूनियन के नेता थाने पहुंचे। अब आसपास के गांवों से कुछ नाते-रिश्तेदारों संग जाति-भाई भी पहुंचने लगे। मामला जातीय राजनीति की ओर बढ़ने लगा। इलाका कोइरी बाहुल्य था। विपक्षी पार्टियां मौका भुनाने के लिए झंडी-पतंगी ले धरना में समर्थन देने उतर आर्इं। डीएम साहब ने मंत्री जी को खबर की और हाई कमान से तत्काल पत्र जारी हुआ कि प्रधान को पार्टी-विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाए जाने के कारण उसकी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता समाप्त की जाती है।
उजाले की चादर आकाश से उतर गई और बादल फिर से गरजने लगे। रामखेलावन थाने के एक कमरे में बंद बाहर के शोरगुल से अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहा था कि बाहरक्या चल रहा है। एक कांस्टेबल खैनी रगड़ते हुए लोहे के जालीदार फाटक के पास सट कर खड़ा हो गया। धीरे से बोला, सुर्ती।

रामखेलावन की डिबिया खाली हो चुकी थी और तलब से सिर फटा जा रहा था। लपक कर हथेली बढ़ा दी। चुटकी भर खैनी हथेली पर रख कांस्टेबल फुसफुसाया- ‘नेता जबर है भाई! साहब लोगों का हाथ-गोड़ फूला है।’रामखेलावन-‘बाहर का हो रहा है महराज! तनी बताइए।’ कांस्टेबल-‘हो का रहा है, इहां से लेकर जिला तक तुम्हारे लोग हाकिमों का बैंड बजा रहे हैं। बड़ी पब्लिक है भाई तुम्हारे पास। मुस्कराकर बोला- राजनीति करो। मंत्री-संत्री बन जाओगे।’ उसकी आंखें कहते हुए विश्वास से चमक रही थीं। सइधर बहुत अनुनय-विनय के बाद जाम तो खुल गया, पर बिरादरी वाले थाने पर धरना दिए बैठे रहे। अंत में भारी जन समर्थन देख रामखेलावन को छोड़ दिया गया। गांव की सवर्ण जातियां भी रामखेलावन के समर्थन में उतर चुकी थीं। दरअसल, सभी प्रधान की दबंगई-गुंडई से आजिज आ चुके थे, बस विरोध का साहस नहीं था किसी में। एक रामखेलावन के उठते धीरे-धीरे सब उठ खड़े हुए। ग्राम पंचायत के सदस्यों की आपात बैठक बुला कर प्रधान को कोइराने की नाली अविलंब बनवाने का नोटिस जारी हुआ और प्रधान प्रधानी जाने के डर से तत्काल नाली बनवाने लगा। पार्टी से बेदखल हो ही चुका था। जानता था जो नाली नहीं बनी, तो परधानी हवा हो जाएगी।

पंद्रह दिनों तक गांव में लगातार टोले-टोले नाली की मरम्मत चलती रही। सारे मजूर-मिस्त्री वहीं लगे रहे। लाचार प्रधान खून का घूंट पीकर काम करवा रहा था। प्रधानी जाते-जाते बची थी कुछ सदस्यों को मोटी रकम देकर। गांव में राजनीति की हवा उल्टी बह रही थी। अब शाम को उसका दुवार छोड़ लोग रामखेलावन के दुवार पर मजमा लगाने लगे थे। अंत में जीत कानून की होती है, जैसे वाक्यों पर लोगों का भरोसा पक्का हुआ और अपने-अपने काम पर लौटने लगे।
सोलहवें दिन सभी गांधी चबूतरे पर पहले की तरह इकट्ठा हुए। रामखेलावन ने ठेकेदार को देखते ही सलामी ठोकी- मान गए गुरु!
ठेकेदार मुस्कुराया- ‘का मान गए यार!’
रामखेलावन ने खींच कर अंकवार में भर लिया। आंखों में नमी उतर आई थी- ‘तुम न होते भइया तो ई जंग हम कभी न जीतते।’
ठेकेदार गांधीजी की मूर्ति की ओर देख कर बोला- ‘ई देख रहे हो गान्ही बाबा को… का था इनके पास!… खाली कलेजा था। भिड़ गए अंग्रेजों से। बस आदमी के अंदर कलेजा होना चाहिए। आज हम सब यही खोकर डरे-सहमे बैठे हुए हैं।’ समूह की ओर इशारा करके बोला- ‘अब समझ लो तुम इनको गान्ही बाबा।’
रामखेलावन की आंखें गांधीजी की मूर्ति को देख श्रद्धा से भर गर्इं। हाथ जोड़ कर प्रणाम किया। ठेकेदार से भरभराए गले से कहा- ‘समझ गया भइया, हमको बार-बार गान्हीं बाबा की जरूरत है।’ ०

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App