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कहानी- मेरा दोस्त

देवेंद्र कुमार  पापा, क्या सचमुच यह आपका दोस्त है!’ विमल ने रिक्शे वाले की पीठ की ओर इशारा करते हुए शायद पांचवीं बार पूछा था। और पिता रजत ने होठों पर अंगुली रख कर चुप रहने का संकेत करके धीरे से कहा था- ‘हां’। लेकिन विमल को तसल्ली न हुई, उसे जैसे पापा की बात […]
Author November 5, 2017 01:55 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

देवेंद्र कुमार 

पापा, क्या सचमुच यह आपका दोस्त है!’ विमल ने रिक्शे वाले की पीठ की ओर इशारा करते हुए शायद पांचवीं बार पूछा था। और पिता रजत ने होठों पर अंगुली रख कर चुप रहने का संकेत करके धीरे से कहा था- ‘हां’। लेकिन विमल को तसल्ली न हुई, उसे जैसे पापा की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था। हो भी कैसे सकता था। उसने पापा के सभी दोस्तों को देखा है, उनके परिवार के बच्चों के साथ खेला है। पापा के कई मित्र दफ्तर में साथ काम करते हैं। आज से पहले रजत ने किसी रिक्शे वाले को अपना दोस्त नहीं कहा था। तो फिर इसके साथ पापा की दोस्ती कब और कैसे हो गई थी, यही बात विमल को हैरान कर रही थी।
सोसाइटी के गेट पर रिक्शे से उतर कर रजत अंदर की ओर बढ़ चले। विमल ने रुक कर ध्यान से रिक्शे वाले की ओर देखा। कंधे पर अंगोछा, बदन पर मैली कमीज और पाजामा, चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी। क्या सच में यह पापा का नया दोस्त है! यही सोचता हुआ विमल घर में चला गया। एकाएक उसे ध्यान आया कि पापा ने रिक्शा वाले को किराया नहीं दिया था, पर उसने मांगा भी नहीं था। उसने सबसे पहले यह बात मां विभा को बताई तो वह भी चौंक गर्इं।
दोपहर में भोजन करते हुए विभा ने रजत से कहा- ‘सुना है आजकल आपने एक रिक्शा वाले से दोस्ती की है।’
‘हां खिलावन रिक्शा चलाता है।’ कह कर रजत चुप हो गए। पर वह जानते थे कि पूरी बात बताए बिना मामला शांत नहीं होने वाला। सुबह वह सैलून जाने लगे तो विमल भी साथ चल दिया। रविवार के कारण सैलून में भीड़ थी। विमल सैलून के बाहर बरामदे में चला गया। उसे देख कर सड़क पर खड़ा रिक्शा वाला मुस्करा उठा। विमल को याद आया कि वह पापा के साथ उसके रिक्शे में आया था। विमल को लगा शायद पापा रिक्शे वाले को किराए के पैसे देना भूल गए हैं, इसीलिए वह इंतजार कर रहा है। उसने सैलून में जाकर रजत को बताया, तो वह हंस पड़े। बोले- ‘मैंने ही उससे रुकने को कहा था। हमें उसी के रिक्शे से घर वापस जाना है। वह मेरा दोस्त है। मैं आजकल उसी के साथ बाजार आता-जाता हूं।’
विभा ने इस अजीब दोस्ती का कारण जानना चाहा तो रजत ने बताया- ‘एक दिन मैं इसी के रिक्शे में बाजार जा रहा था। अचानक रिक्शा केमिस्ट की दुकान के सामने रुक गया। मेरे पूछने पर खिलावन ने कहा कि उसका बेटा अस्पताल में है। उसके लिए दवाई लेनी है। वह केमिस्ट के पास गया और दवा लेकर लौट आया। वह रिक्शा चलाने को हुआ तो मैंने रुकने को कहा। मैंने केमिस्ट की आवाज सुन ली थी- ‘पूरे पैसे लेकर आया करो।’ मैं रिक्शे से उतर कर केमिस्ट के पास गया। वह मेरा परिचित है। उसने बताया कि इस रिक्शे वाले के पास पैसे पूरे नहीं थे, इसलिए मैंने देखा काउंटर पर कुछ दवाइयां रखी थीं। ये वही थीं, जिन्हें पैसे कम होने के कारण केमिस्ट ने रोक लिया था।
‘और फिर वे दवाएं तुमने रिक्शा वाले को थमा दीं और इस तरह वह तुम्हारा नया दोस्त बन गया!’ विभा ने हंस कर कहा।
‘ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। उसने लेने से इनकार कर दिया। उसने जो कुछ कहा उसका मतलब इतना ही था कि मैं उसे भीख दे रहा था, जिसे वह कभी नहीं लेगा। यानी मैंने उसके स्वाभिमान पर चोट की थी।’
‘शायद तुम्हारे व्यवहार से उसे ऐसा लगा हो!’ विभा बोली।
‘मेरा व्यवहार वैसा नहीं था जैसा तुम सोच रही हो। पर बीमार बच्चे को पूरी दवाइयां तो मिलनी ही चाहिए थीं, पर वह जिद पर अड़ा था।’
‘फिर आपने क्या किया?’ विमल ने पूछा।
‘मैंने उसे समझाया कि उसकी जिद के कारण उसके बेटे की बीमारी बढ़ सकती है। मुझे एक उपाय सूझ गया। मैंने कहा- ‘ये दवाएं मैं तुम्हें उधार दे रहा हूं। तुम मेरा उधार चुका सकते हो।’
‘वह कैसे?’ उसने पूछा।
‘मैं रोज शाम को बाजार जाता हूं। तुम मुझे अपने रिक्शे में ले जा सकते हो। मैं तुम्हें किराया नहीं दूंगा। उन पैसों को मैं तुम्हारे उधार में से काट लूंगा। इस तरह तुम्हारा उधार हर रोज उतरता जाएगा और बच्चे को पूरी दवाएं मिलती रहेंगी।’ खिलावन के चेहरे का तनाव कुछ कम होता दिखा। बस तब से यही हो रहा है।’ रजत ने विभा और विमल को एक कॉपी दिखाई, जिसमें खिलावन का हिसाब लिखा हुआ था।
विमल ने पूछा- ‘क्या आप यह हिसाब खिलावन को दिखाते हैं?’
‘वह अनपढ़ है।’
‘तब तो हिसाब में गड़बड़ी भी हो सकती है?’ विभा ने कहा।
‘हो सकती है,पर मैं…’
‘तो इसीलिए आपने आज रिक्शा वाले को किराया नहीं दिया था!’ विमल बोला।
‘तुम रिक्शे वाले की जगह उसे खिलावन दादा भी कह सकते हो।’ रजत ने गंभीर स्वर में कहा।
‘सॉरी पापा। क्या आप मुझे उनके घर ले चलेंगे? मैं उनके बेटे से मिलना चाहता हूं।’
‘कभी ले चलूंगा। अब उनका बेटा रमेश ठीक है। उस दिन मैं सड़क पर निकला तो खिलावन ने पुकार लिया- ‘बाबूजी, खुशखबरी है। रमेश को अस्पताल से छुट्टी मिल गई है।’ मैंने कहा- ‘वाह तब तो पार्टी होनी चाहिए, वह मुझे चाय पिलाने ले गया। एक चाय वाले की दुकान पर हम चाय पीते हुए देर तक बातें करते रहे। उसने बताया कि उसे गांव क्यों छोड़ना पड़ा। वही जात-पांत और रोजगार न मिलना। लेकिन गांव की याद बहुत आती है।’
‘तुम खिलावन को विमल की जन्मदिन की पार्टी में बुला सकते थे।’
‘उसे बुला कर मैं तुम्हें और खिलावन दोनों को संकट में नहीं डालना चाहता था। उनकी और हमारी दुनिया में अभी काफी दूरी है। बीच में पुल बनने में न जाने कितना समय लगने वाला है। पर उस दिन मैंने अपने दोस्त को पार्टी जरूर दी थी।’
‘कहां?’
‘उसी चाय की दुकान पर जहां रमेश के स्वस्थ होने की दावत हुई थी।’ कह कर रजत मुस्करा दिए। विभा और विमल भी हंस रहे थे। १

 

 

 

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