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कहानी- कीमत

निरीह बकरे की तरह मिमिया-सा उठा सुधाकर लाल, ‘आप ही बताओ भाई नवल कि मैं क्या करूं? प्रबंधन ग्लोबल कंपनियों का उदाहरण देकर कहती है कि प्रति टन वेज बिल (वेतन खर्च) उनका बहुत कम है और हमारा बहुत ज्यादा है।
Author June 18, 2017 03:14 am
प्रतीकात्मक चित्र।

जयनंदन  

यह आठवीं या नौवीं बार था जब फर्राटा स्टील कंपनी में अर्ली सेपरेशन स्कीम (वॉलंटियर रिटायरमेंट स्कीम का लुभावना नाम) लाई गई थी। इसके जरिए से बड़ी संख्या में कंपनी से मजदूर हटाए जा चुके थे। पहले इस कंपनी में चालीस हजार मजदूर कार्यरत थे, वे छंटनी के शिकार होते-होते सिर्फ बारह हजार रह गए। अब इसे भी कम करने की एक नई कवायद शुरू कर दी गई। जहां पहले कंपनी चालीस हजार मजदूर लेकर तीन मिलियन टन स्टील बनाती थी, तब भी उसके खाते में करोड़ों का मुनाफा दर्ज हो रहा था। अब मजदूर घटा कर और क्षमता बढ़ा कर दस मिलियन टन बनाने लगी। समझा जा सकता है कि मुनाफे का अंतर कितना बड़ा हो चुका होगा।  ऐसा नहीं कि कंपनी में काम कम हो गया और ज्यादा कार्यबल की जरूरत नहीं रही! बल्कि काम काफी बढ़ गया था, जिसे वह स्थायी मजदूरों की जगह सस्ते में ठेकेदार के अस्थायी मजदूरों से कराने लगी। लगभग पचास हजार ठेकेदारकर्मी कारखाने में लगा दिए गए। उन्हें न आवास सुविधा, न चिकित्सा सुविधा, न बोनस, न इंक्रीमेंट, न पेंशन, न कोई और भत्ता देने की जरूरत। बस सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी और ठेकेदार का कमीशन मिला कर एक मजदूर पर ज्यादा से ज्यादा तीन सौ रुपए प्रतिदिन का खर्च। सामाजिक कार्यकर्ता नवल किशोर ने फर्राटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष सुधाकर लाल से मुलाकात की। वह जानता था कि कंपनी प्रबंधन यूनियन को राजी करके ही इस तरह की दमन चक्की चलाता है। उसने बड़े तल्ख होकर पूछा, ‘सुधाकर लालजी, क्या हो रहा है यह सब? चाटुकार बन कर मजदूरों की गैरत और जमीर का सौदा आप कब तक करते रहेंगे? यह कंपनी क्या नाजियों और हिटलरों के हुक्म से चलने लगी है और आप उसके फरमाबरदार बन गए हैं? ये बार-बार छंटनी का तुगलकी फरमान जारी हो रहा है और आप उसके मूकदर्शक बने बैठे हैं।’

निरीह बकरे की तरह मिमिया-सा उठा सुधाकर लाल, ‘आप ही बताओ भाई नवल कि मैं क्या करूं? प्रबंधन ग्लोबल कंपनियों का उदाहरण देकर कहती है कि प्रति टन वेज बिल (वेतन खर्च) उनका बहुत कम है और हमारा बहुत ज्यादा है। हमें उनके मुकाबले में रहने के लिए वेज बिल कम करना ही होगा। सरकार, प्रशासन और अदालत नाम की व्यवस्था बहाली के पहरुए भी मजदूरों की बदहाली के मूकदर्शक बन कर रह गए हैं। सरकार ने अपने कई उपक्रमों को घाटा होने का विधवा-विलाप करते हुए बंद कर उसे आउटसोर्स करने और मजदूरों की छंटनी करने की प्रथा शुरू कर दी, तो फिर यह एक आम रास्ता बन गया सभी गैर-सरकारी और अर्द्धसरकारी संस्थानों के लिए भी। स्थायी प्रकृति के काम में जॉब सिक्यूरिटी का जो एक वैधानिक कवच था, वह निष्प्रभावी हो गया। ऐसे में हम कौन-सा तुर्रम खां हैं कि कंपनी को ऐसा करने से रोक दें।’ नवल किशोर निरुत्तर-सा हो गया। सचमुच, सारा किया-कराया तो परोक्ष रूप से सरकार का ही है। उसकी नीतियां ऐसी हो गर्इं कि सारे कारपोरेट निरंकुश बन कर मनमानी करने के लिए आजाद हो गए। खुद सरकार ने अपने कई प्रतिष्ठानों को बेच दिया और उसके कर्मचारियों को सरप्लस कर दिया। कई राज्य सरकारों ने भी दोगली या सौतेली वेतन नीति लागू कर रखी है। पारा टीचर की अवधारणा इसी की एक घटिया मिसाल है। एक ही स्कूल में एक ही साथ पढ़ाने वाले, एक बराबर शैक्षणिक योग्यता रखने वाले पारा टीचर की पगार सूखा-सुक्खी पांच हजार से सात हजार के बीच, जबकि स्थायी टीचरों की पैंतालीस से लेकर पचास हजार के बीच। भूमंडलीकरण नामक हवाई उड़ान की इस समय क्या जरूरत थी इस देश को, जबकि अपने उत्पाद की खपत के लिए अपना घरेलू बाजार ही अत्यंत सक्षम था?

सुधाकर की तार्किकता लाजवाब थी, फिर भी कुछ कहने के लिए यों ही कह गया नवल किशोर, ‘वेज बिल कम करने के लिए वे अधिकारियों को क्यों नहीं हटाते। उनकी तनख्वाह कम क्यों नहीं करते। एक अधिकारी की तनख्वाह कम से कम पंद्रह मजदूरों के बराबर होती है। शीर्ष डायरेक्टरों की तनख्वाह तो पचास से सौ मजदूर के बराबर होती है। एमडी की तनख्वाह इंसेंटिव और प्रॉफिट शेयर आदि लेकर लगभग बारह लाख रुपए प्रति माह। मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि एक आदमी को इतनी मोटी-मोटी रकम देने का तुक क्या है? आखिर क्या करते होंगे वे इतने पैसे लेकर? क्या सरकार और संसद को इस पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए कि जिस देश में सरकार द्वारा निर्धारित एक मजदूर की न्यूनतम मजदूरी दो सौ रुपए हो, वहां किसी अधिकारी की एक दिन की चालीस हजार की कमाई! क्या इतनी बड़ी खाई को लेकर कोई समाज, कोई व्यवस्था, कोई देश शांत, संतुलित, निर्विघ्न और निश्चिंत रह सकता है?’‘आपकी बात से सहमत हूं नवल। मैं भी मानता हूं कि मजदूर और अफसर में थोड़ा अंतर जरूर हो, लेकिन इतनी चौड़ी खाई तो हर हाल में न्यायोचित नहीं है। बहरहाल, हमारी यूनियन इस समय एक नई चुनौती से जूझ रही है। प्रबंधन हम पर लगातार दबाव बना रहा है कि नए ग्रेड रीविजन (वेतन पुनरीक्षण) के लिए एनजेसीएस (नेशनल ज्वाइंट कमिटी फॉर स्टील) से हम अलग हो जाएं और प्रबंधन से सीधे बातचीत कर स्थानीय स्तर पर ही सभी मुद्दे को हल कर लें।’

‘यह प्रस्ताव आप किसी भी तरह स्वीकार न करें सुधाकरजी। प्रबंधन धूर्तता से समझौते को अपने क्लच में रखना चाहता है। एनजेसीएस सभी इस्पात कारखानों के लिए एक बड़ा मंच है। इसमें कई धाकड़ राष्ट्रीय वाम नेता हैं, जो सरकार और कारखानों के अधिकृत अधिकारियों को सौदेबाजी (बार्गेनिंग) और तर्क से पस्त कर देने में माहिर माने जाते हैं। इसका फायदा पब्लिक और प्राइवेट दोनों सेक्टरों के मजदूरों को मिलता है। आप अलग होकर समझौता करेंगे तो उन्हें मनमर्जी चलाने में सुविधा हो जाएगी।’‘अब तक तो हम असहमत होने के अपने स्टैंड पर कायम हैं, आगे देखिए क्या होता है?’यूनियन अपनी मांग पर डटी हुई थी। प्रबंधन के लिए एक आन की बात हो चली थी। वह एनजेसीएस स्तर से काफी कम देने का जो एक प्रस्ताव बना रखा था, उसमें एक दो बिंदुओं पर वह सरकने के लिए तैयार था, लेकिन न्यूनतम गारंटी लाभ और वेतन मान पर वह अडिग था। सुधाकर लाल ने विरोध के हलके उपाय आजमाने शुरू कर दिए थे- बातचीत के बुलावे का बहिष्कार, एमडी के बंगले का घेराव, मेन गेट पर धरना, एक घंटे की कामबंदी और जनरल आॅफिस लॉन में मजदूरों को जुटा कर नारेबाजी। इन सबका कोई असर न होता देख एक कदम उसने और आगे बढ़ा दिया। लिख कर नोटिस दे दिया कि अगले सप्ताह एक दिवसीय हड़ताल होगी। प्रबंधन को महसूस करने पर बाध्य होना पड़ा कि अब मामला सचमुच बिगड़ता जा रहा है। दुनिया भर में इस दावे का दंभ भरा जाता था कि एक सौ दस वर्षों के कार्यकाल में यूनियन और मजदूरों से उसके संबंध बहुत गाढ़े रहे और आज तक बड़े पैमाने पर औद्योगिक विवाद की कभी नौबत नहीं आई। अब उसकी यह छवि खंडित होने के कगार पर आ गई थी। प्रबंधन के कुछ अधिकारी चाहते थे कि इस उदार और श्रमिक मैत्री छवि को बचाया जाए। इससे कंपनी की साख को एक नई चमक मिलती है और व्यावसायिक लाभ पहुंचता है।

वहीं कुछ अधिकारियों की राय थी कि एक बार अगर यूनियन के सामने झुकना पड़ गया या उसकी जिद पूरी करनी पड़ गई तो फिर ऐसी नौबत बार-बार आती रहेगी। जो यूनियन अब तक जेब में रहती रही थी वह अब सिर पर चढ़ बैठेगी। प्रबंधन ने यह भी भांप लिया था कि इस मसले पर इस दफा यूनियन के साथ तमाम मजदूरों का जबर्दस्त समर्थन है, जबकि पूर्व में यूनियन के साथ मजदूर अक्सर विभाजित हो जाया करते थे और यूनियन कंपनी के एक विभाग की तरह काम करती थी और एक अनुचर की तरह हर कहा मानती थी।
एक दिवसीय हड़ताल की तारीख आने से पहले प्रबंधन की उच्च स्तरीय मीटिंग में तय हो गया और यूनियन को सूचना भेज दी गई कि इस बार एनजेसीएस के बराबर ग्रेड देना मान लिया जाता है, लेकिन अगली बार एनजेसीएस हमारा मानदंड बिल्कुल नहीं रहेगा और हम इसे बिना देखे, कम या ज्यादा खुद ही सब कुछ तय करेंगे।सुधाकर लाल ने अपनी कार्यकारिणी से परामर्श किया और वर्तमान को महत्त्व देते हुए भविष्य का फैसला भविष्य पर छोड़ दिया। सबने इस बात से संतुष्टि जताई कि प्रबंधन को अपना रुख नरम करना पड़ गया। यह एक ऐतिहासिक घटना के रूप में दर्ज होने लायक है, अन्यथा अब तक तो यही होता रहा था कि प्रबंधन ने जो कह दिया, वह पत्थर की लकीर हो गया।
महीनों की छाई अनिश्चितता और पसोपेश पर आज हर्ष और उत्साह का संचार हो गया। सब आश्वस्त हो गए कि कल समझौता हो जाएगा और मजदूरों में जीत की एक लहर दौड़ जाएगी।  पिछले दिनों पूरे शहर में इसे लेकर चर्चा का बाजार गरम था। यूनियन को शहर वाले इस तरह तनते हुए, डटते हुए पहली बार देखने वाले थे। उन्हें जब पता चलेगा तो यकीन करना मुश्किल होगा कि प्रबंधन पर कभी यूनियन भी भारी पड़ सकती है। आज तक तो सबने यही देखा था कि प्रबंधन ने किसी तानाशाह सरकार की तरह जो फैसला कर लिया वह लागू हो गया। मजाल नहीं कि किसी के हलक से आह भी निकल जाए।

सुधाकर लाल के नीचे के यूनियन पदाधिकारी ब्रह्मदेव ने अपनी जेब से पैसे देकर मिठाई मंगवा ली और सबको आमंत्रित करते हुए कहा, ‘आइए, जी भर कर खाइए। इस मिठाई में आपको एक विशेष तरह का स्वाद मिलेगा- जीत का स्वाद।’सब लोग आज की रात चैन की नींद सोने का मन बना कर अपने-अपने घर को वापस हो गए।  काश! चैन की निर्विघ्न नींद लेने की उनकी मुराद पूरी हो पाती। सुबह होने के पहले ही सबको जागना पड़ गया। सुधाकर लाल के घर में घुस कर कुछ अपराधियों ने गोलियों से उसे भून डाला। तड़पने का भी मौका नहीं मिला और वह ढेर हो गया। बगल के कमरे से उसके परिवार वाले तक मदद के लिए नहीं आ पाए। पूरे शहर में जंगल की आग की तरह यह खबर फैल गई। नवल किशोर सुन कर जैसे मुर्च्छा की स्थिति में आ गया। यह हत्या सिर्फ एक आदमी की हत्या नहीं थी। यह हजारों मजदूरों के हौसलों और स्वाभिमान की हत्या थी। एक सुधाकर लाल के बनने में कई बरस लग जाते हैं। इस हत्या से उन्हें कई बरस पीछे ढकेल दिया गया था। अपराधियों से चेतावनी उसे लगातार मिल रही थी, जिसकी वह गीदड़ भभकी समझ कर कतई परवाह नहीं कर रहा था। शायद उसे पता था कि पर्दे के पीछे से यह खेल कौन खेल रहा है। यह जानते हुए भी उसने तय कर लिया था कि अपने माथे पर लगे प्रबंधन के पिट्ठू होने का कलंक वह मिटा कर रहेगा, इसकी कीमत चाहे जितनी बड़ी चुकानी पड़े।मजदूर हितों के लिए उनके पक्ष में चट्टान की तरह उसका खड़ा होना एक इतिहास तो जरूर रच गया, लेकिन इसे आगे ले जाने के लिए बतौर उत्तराधिकारी क्या कोई सामने आने की हिम्मत करेगा?

 

 

 

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  1. J
    jameel shafakhana
    Jun 19, 2017 at 1:49 pm
    har din bistar par puri raat dhoom macha dega ye Nuskha : treatment me asantusht ladki ko daily santusht kar dega ye nuskha 60 din me ko lamba mota or seedha tight karne ki achook dawai kya tanav, josh ate hi nikal jata hai or dheela pad jata hai iska kamyab ilaj? : jameelshafakhana /
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