ताज़ा खबर
 

कहानी- गुवाड़ी का पीपल

सूरज की किरणें फैलने लगती हैं तो उसकी गरमी से गरमाती है गुवाड़ी। फूलसिंह तो जैसे झील के शांत जल में कंकर मार कर चला जाता। फिर यहां के शांत पानी में कंपन होता रहता।

Author January 14, 2018 05:44 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

गुवाड़ी के दरवाजे के बाहर ही फूलसिंह ठेले पर सब्जियों की टोकरियां करीने सजा रहा है। यह उसका रोज का काम है। जब वह सुबह उठ कर सब्जी मंडी जाता है, तब तक तो सब सोए होते हैं। उसके उठने की खटर-पटर भी किसी को महसूस नहीं होती। उसके सब्जी मंडी चले जाने के बाद जैसे-जैसे समय बीतता है, गुवाड़ी में चहल-पहल शुरू होने लगती है। सूरज की किरणें फैलने लगती हैं तो उसकी गरमी से गरमाती है गुवाड़ी। फूलसिंह तो जैसे झील के शांत जल में कंकर मार कर चला जाता। फिर यहां के शांत पानी में कंपन होता रहता। वह सुबह की चाय भी मंडी में ही जाकर पीता है। इतनी जल्दी जाग जाता है कि उस समय न तो घर का ही कोई सदस्य जागता है और न ही बाहर कोई दुकान खुल पाती है; तो सीधा मंडी चला जाता है। वहीं पर चाय की दुकान मिलती है खुली। जिस पर रुक कर चाय पीता है और फिर अपने काम में लग जाता है।  यही उसकी रोज की दिनचर्या है। अब तो आदत पड़ गई है। रोजी-रोटी के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है। वह भी कर रहा है। गले से गृहस्थी जो बंधी है। उसको भी जैसे-तैसे चलाना है। आदमी की जिम्मेदारियां कभी खत्म नहीं होतीं। ये जिम्मेदारियां निभाते हुए ही आदमी कब बूढ़ा हो जाता है, उसे पता ही नहीं चलता। फूलसिंह भी हो रहा है।
फूलसिंह सांवले रंग का, मध्यम कद का आदमी है। चेहरे पर हल्के-हल्के चेचक के दाग, ऊपर को काढे हुए बाल, छोटी आंखें, पर गहरी। हल्के से घुंघराले बाल, गोल और लंबोतरे के बीच का चेहरा। चंचल आंखें, जिसमें हरदम सपने तैरते रहते हैं। इन सपनों को पूरा करने के लिए ही वह सुबह से रात तक भागता रहता है।

फूलसिंह इसी गुवाड़ी का रहवासी है। गुवाड़ी के दरवाजे के पास ही उसकी एक खोली है। उसी में वह पत्नी और बच्चों के साथ रहता है। पत्नी घर-गृहस्थी के कामों में दिन भर खटती रहती है और बच्चे तो बच्चे ही हैं। दिन भर ऊधम मचाते रहते हैं, जिनसे पत्नी जूझती रहती है। बड़ी बेटी आठ साल की हो गई है। बेटा उससे छोटा है, जो अभी छह साल का हो रहा है और सबसे छोटा तीन साल का हो गया है। कुल जमा पांच लोगों का परिवार एक छोटी-सी खोली में रहता है। पर एक तो उनको यह खोली छोटी पड़ने लगी और दूसरे पिछले साल की बारिश में इसकी छत लगभग ढह जाने के कारण उनको यह खोली छोड़नी पड़ी। अब इस खोली में सब्जी की टोकरियां रखी रहती हैं। और ठेले का सामान, ठेला गुवाड़ी के बाहर ओटले पर रहता है। फूलसिंह ने पास में दो कमरों का एक मकान ले लिया किराये पर। अब वह अपने परिवार के साथ उसी मकान में रहता है। इस गुवाड़ी का भी अजीब मोह है। जो एक बार यहां आता है, यहीं का होकर रह जाता है। न जाने कहां-कहां से लोग आते गए और इसका हिस्सा बनते गए। इस तरह यह गुवाड़ी दस-पंद्रह परिवारों की आश्रयदाता बन गई। वैसे भी यह गुवाड़ी फूलसिंह के मामा की ही तो है। यहां रहने के लिए सबसे पहले रेशमबाई आर्इं जो इस गुवाड़ी के मालिक भारतसिंह की सगी बुआ है। वही इस बड़े से मकान में अकेली रहती थी। ये लोग उज्जैन के पास बसे हुए गांव जयसिंगपुरा के रहने वाले हैं। वहीं पर इनके खेत हैं, पूरा परिवार खेती करता है। खेती के साथ ही गाय-भैसें भी पाल रखी है, जिसके दूध का ये लोग धंधा करने लगे। पहले रेशमबाई भी दूध का ही धंधा करती थी और उनके पति दुधारू पशुओं की खरीद फरोख्त का। जयसिंगपुरा से दूध आता था और यहां पर बिकता था। पर धीरे-धीरे दूध का धंधा बंद कर दिया और सब्जी का शुरू कर दिया।

रेशमबाई के भाई ने पंद्रह-बीस साल पहले जब यह मकान खरीदा था तो उनको यह काफी दूर लगता था। इसलिए तब इसमें कोई भी नहीं रहता था। इतना बड़ा मकान जो आज एक गुवाड़ी में तब्दील हो गया है, पूरा खाली पड़ा हुआ था। एक सड़क से दूसरी सड़क तक फैले हुए इस मकान के हर कमरे में ताले लगे थे। मुख्य सड़क पर लगभग सौ फीट चौड़े और चार हजार फीट लंबे इस भूखंड पर आगे और पीछे लगभग दस बारह कमरे बने हैं और इसके बीच में दस-बारह कमरों का दो मंजिला मकान बना हुआ है, वो अलग है।
गुवाड़ी के दो मंजिला मकान की ऊपरी मंजिल के एक हिस्से में रेशमबाई रहती हैं और उसके दूसरे हिस्से में बाबू के पिताजी रहते हैं। उनके घर जाने का रास्ता गुवाड़ी के बीचों-बीच खड़े पीपल के विशाल पेड़ के पास से जाता है। पीपल का पेड़ ही इस गुवाड़ी की पहचान है। दो मंजिले मकान से पीपल के पेड़ तक भी चार कमरे बने हुए हैं। इन कमरों की छत पर से ही ऊपर के मकान में जाने का रास्ता है। यह अलग बात है कि समय के साथ-साथ मकान और छत क्षतिग्रस्त होते चले गए। लेकिन फिर भी अभी तक यह मकान यहां पर रह रहे परिवारों का आश्रयस्थल बना हुआ है। हर व्यक्ति अपने-अपने हिसाब से मरम्मत करके काम चला रहा है।
यह पीपल एक सदी तो देख ही चुका होगा। आज भी यह छाते सा तना हुआ है यहां रहने वाले लोगों के सर पर। गुवाड़ी के मुख्य दरवाजे से भीतर घुसते ही उल्टे हाथ पर एक कुआं है जो गुवाड़ी के लोगों की सेवा में हमेशा तैयार रहता है। इसी कुएं पर यहां रहने वाले नहाते-धोते हैं। यहीं बैठ कर बर्तन मांजते-धोते हैं और अपनी जरूरतों के हिसाब से पानी ले जाते हैं। इस कुएं की आव इतनी तेज है जिससे इसमें खूब पानी आता है। यही सबसे बड़ी सुविधा है इस गुवाड़ी में। इस कुएं ने यहां रहने वाले लोगों को भरी गरमी में भी कभी पानी की कमी महसूस नहीं होने दी। जब पूरा शहर पानी की कमी से त्राहि-त्राहि कर रहा होता, उस समय भी यहां पर भरपूर पानी रहता। बस उन दिनों बाल्टी में रस्सी बांधनी पड़ती है और वह भी बड़ी नहीं, बस आठ-दस हाथ की रस्सी से ही काम चल जाता है।

अधेड़ उम्र का फूलसिंह जब मुस्कराता है, तो मूंछों में ही। कभी उसको किसी ने खुल कर हंसते हुए नहीं देखा। उसमें वे सारे गुण ठंूस-ठंूस कर भरे हैं, जो एक व्यापारी में होने चाहिए। इसी कारण वह व्यापारी बन गया। वैसे भी फूलसिंह का ठेला इस शहर में सब्जी का सबसे अच्छा ठेला माना जाता है। जितनी भी तरह की सब्जी मौसम में आती है, वह सब उसके ठेले पर सजी होती है। और अगर उसके ठेले पर सब्जी नहीं है, तो समझो इस समय वह आ ही नहीं रही है। इस तरह का विश्वास भी उसने लोगों में बनाया है। एक और बात के लिए भी उसका ठेला जाना जाता है। उसके ठेले पर सब्जी एकदम ताजा मिलेगी, पर महंगी भी बहुत ज्यादा होगी। पूरे शहर में सबसे महंगी सब्जी बेचता है फूलसिंह। फिर भी चल रहा है उसका काम। क्योंकि उसने कोई विकल्प छोड़ा नहीं है लोगों के पास। जो लोग घर से निकलना नहीं चाहते या फिर जिनके पास समय नहीं है, वे उसके रोज के ग्राहक हैं। वह अपने ग्राहक को पूरी तौर पर संतुष्ट करता है। जिस तरह सब्जियों की साफ-सफाई करता है, वे खुद चमकते हुए बोलने लगती हैं और फिर जिस तरह उनको ठेले में सजाता है, उसे कोई भी देखे तो देखता ही रह जाए। उस पर उसके बोलने की कला हर किसी को बांध लेती है। उसमें यह भी गुण है कि जो एक बार उसके ठेले पर आ जाता है, वह फिर कहीं नहीं जा पाता। वह सोच ही नहीं पाता कहीं और जाने के बारे में।

कहते हैं, जब आदमी के पास पैसा आने लगता है, तो वह जमीन से ऊपर उठने लगता है। इन दिनों फूलसिंह के पास भी लक्ष्मी बरसने लगी है। पर इस सबके बावजूद वह अपने लोगों और अपनी धरती से जुड़ा हआ है। इस गुवाड़ी के लोगों से जुड़ कर वह यहीं का हो गया। गुवाड़ी के लोगों में जो अपनापन है, वही उनकी पहचान है। यही उनको आपस में जोड़े हुए है।
आज जब वह गुवाड़ी के ओटले पर खड़े होकर सब्जी का ठेला सजा रहा है, तो उस समय ठेले पर रखा ट्रांजिस्टर वातावरण में मधुर आवाज बिखेर रहा है। वह राह चलते लोगों का ध्यान खींच रहा है। सड़क से गुजरते हुए लोग बरबस उसकी तरफ देखने लगते हैं। नई-नई फिल्मों के गानों की लय पर उसके हाथ चलने लगे हैं। वह ठेले पर सब्जी का एक-एक टोकरा इस तरह सजा रहा है कि मानो किसी अप्सरा का शृंगार कर रहा हो। इस सबमें उसको डेढ़ से दो घंटे लग जाते हैं।
ठेले को सजाने के बाद वह खुद तैयार होने लगा। हाथ-पैर धोए, बालों में पानी लगाया और उनको ठीक से काढ़ लिया। आंखों में काजल रोजाना लगाता है। वह ऐसे तैयार होता मानो किसी फिल्म की शूटिंग में जा रहा हो। फिर अपनी चाल में लचक पैदा करके चलता।
‘बेटा फूलसिंह! आज तो तुम खूब अच्छे से तैयार हो रिया है? आखिर बात क्या है भई?’ ब्राह्मणी माई मुस्कुराते हुए बोली।
‘कई नी हो। मैं तो रोज ऐसे ही हाथ-मूंह धोवू हूं… काम-धंधा वास्ते निकलू हूं तो थोड़ो ठीक ठाक होइके तो जऊं।’
‘पर आज तो तम सोला साल की छोरी से भी ज्यादा तैयार हो रिया हो?’
‘अच्छा…! ऐसो कई…।’
‘हां… भय्या… म्हारे तो ऐसो लगे है। मैं समझी कि कोई और ही बात है।’ बोलते हुए वो फिच्च से हंस दी।
‘और तो कई बात नहीं है हो! काम-धंधो भी तो पूजा ही है। तो इका वास्ते भी ऐसो ही उत्साह से तैयार होने चाहिए के नी…’- बोलते हुए देखने लगा।
‘अब एक बात तो बता भय्या फूलसिंह?’ ब्राह्मणी माई ने सहजता से पूछा।
‘कई…!’
‘इत्ती सारी सब्जी जो बासी हुई गई थी। तमने कचरा का ढेर पे क्यों फेक दी? इनके थोड़ा सस्ता भाव में ही बेच देता, तो गरीब गुरबा लोग इके लई के खई तो लेता। पर तमने तो ऐसे ही फेंक दी, ऐसो क्यों करियो बेटा?’
इस प्रश्न से वह थोड़ा भी विचलित नहीं हुआ। बल्कि पहले की ही तरह मंद-मंद मुस्कुराता रहा। बोला- ‘ऐसो है बाई! ग्राहक के जदी एक बार सस्तो खाने की आदत पड़ी जावे नी तो फिर ऊ सभी चीज सस्ती ही ढूंड़ेगो। ग्राहक के मैं या आदत डालनो नी चाऊ हूं। भले ही म्हारो नुकसान हुई जाए… मंजूर है। ऊ नुकसान सहन कर लूंगा, पर मैं ग्राहक की आदत नी बीगड़ने दंूगा।’
ब्राह्मणी माई फटी-फटी आंखों से फूलसिंह को देखती रह गई। और वह निरपेक्ष भाव से ठेले को ठेलते हुए गुवाड़ी के ओटले के नीचे उतर गया। उसने पलट कर भी ब्राह्मणी माई की तरफ नहीं देखा।
बस तभी उनके मुंह से निकला, ‘बाबा रे बाबा! इको दिमाग तो सातवां आसमान पे चड़ियो हुओ है रे बाबा। भगवान सबकी भली करे।’ बोलते हुए वो अपनी खोली की तरफ चल दी। गुवाड़ी में पीपल की छाया अब भी चारों तरफ पसरी हुई थी। ०

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App