ताज़ा खबर
 

नन्ही दुनिया- घर से निकला भी करो

पलक का वश चले तो वह घर के अंदर कभी न रहे। लेकिन माता-पिता सर्दी से डरते हैं।

Author January 21, 2018 6:23 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया जा रहा है।

पलक का वश चले तो वह घर के अंदर कभी न रहे। लेकिन माता-पिता सर्दी से डरते हैं। कड़ाके की सर्दी में कहीं नहीं जाते। शायद सर्दी से ही नहीं, वे लोग गर्मी से भी डरते हैं। बारिश से भी। वह सोचती, इसीलिए हर छोटी-छोटी बात में नसीहत देते हैं। बाहर ठंड है, बाहर गर्मी है, बाहर बारिश हो रही है। अंधेरा होने वाला है।  छुट्टियों में तो वे लोग अक्सर घर के अंदर ही रहते। उन्हीं कामों के लिए घर से निकलते, जिन्हें करना मजबूरी थी। जैसे दफ्तर जाना, सब्जी और दूध लाना वगैरह। स्कूल तो वह भी जाती थी, लेकिन उसके बाद वे लोग उससे घर के अंदर रहने और पढ़ने को कहते। यह बात पलक की समझ से बाहर थी कि उसे बाहर क्यों नहीं निकलने दिया जाता। वह एक मिनट भी घर से बाहर कदम निकाले तो मम्मी और पापा में से कोई टोक देता, ‘हर वक्त बाहर क्या रखा है, थोड़ा घर में भी रहा करो।’ वह तेरह साल की हो रही थी। उसे याद है, दो-तीन बार गरमी की छुट्टियों में किसी रिश्तेदार के घर गए थे। पर हफ्ते भर में लौट आए। वहां भी मम्मी रसोई में हाथ बंटातीं और पापा घर के मर्दों के साथ गपशप करते।  सर्दियां तो, जब से पलक ने होश संभाला, घर में ही बीती थीं। हर सर्दी में ब्लोअर चला देते और कमरा बंद कर लिया जाता। या फिर रजाई या कंबल के अंदर दुबके रहो।

पर इस बार कुछ अनहोनी हो गई। पता नहीं क्या सोच कर मम्मी-पापा ने पहाड़ों पर जाने का कार्यक्रम बना लिया। जैसे सूरज पश्चिम से निकल आया था। असल में, पापा के किसी दोस्त ने उनसे कहा कि ‘जिसने पहाड़ों पर बर्फ गिरते नहीं देखी, उसने सर्दी के मौसम को नहीं जाना।’ बस, यह बात पापा ने यों ही मम्मी से कह दी और मम्मी ने सर्दी के मौसम को जानने का मन बना लिया। पलक बहुत उत्साहित थी। पहाड़ कैसे होते हैं, बर्फ कैसे गिरती होगी, यह सोच-सोच कर उसे बड़ी उत्सुकता हो रही थी। क्रिसमस से एक दिन पहले की बात है। नैनीताल पहुंचे तो बहुत तेज हवाएं चल रही थीं। सड़क पर पत्तों का ढेर लगा था। सूखे पत्ते खड़खड़ा कर यहां-वहां उड़ रहे थे। लोगों ने बताया कि नैनीताल में शरदोत्सव समाप्त हो गया है। शरद ऋतु में यह पूरा शहर उत्सव के रंग में रंगा होता है। रास्ते में मम्मी ऋतुओं के बारे में बताने लगीं, ‘शरद ऋतु नवंबर तक होती है। दिसंबर का महीना, मतलब हेमंत ऋतु। उसके बाद शिशिर।’
पलक सुनती रही। फिर अचानक बुदबुदाई, ‘आप लोगों को घर में रह कर ऋतुओं का पता चल जाता है?’

पिता उसकी बात नहीं समझे और बताने लगे कि मोटा-मोटी बात यह है कि एक ऋतु दो महीने की। छह ऋतुएं और बारह महीने। उसमें समझना क्या है?
वे लोग जिस होटल में ठहरे वहां से नैनीताल की झील साफ दिखाई देती थी। बाहर कड़ाके की सर्दी थी और मम्मी को तो झील की ओर देख कर ही झुरझुरी हो रही थी। लगता था कुल्फी जम जाएगी। कुछ दूर, ऊंचाई पर एक गिरजाघर क्रिसमस के स्वागत में सज गया था। वे तीनों पूरा दिन होटल की बालकनी के अलावा कहीं नहीं निकले।अगले दिन बहुत अच्छी धूप निकली थी। धूप देख कर यह भरोसा हो गया कि हाल-फिलहाल बर्फ नहीं गिरने वाली। वे लोग सुबह-सुबह होटल से निकले और सारा दिन यहां-वहां घूमते रहे। दूसरा दिन भी शहर के अंदर और खासतौर पर मॉल रोड में ही निकाल दिया। तीसरे दिन वे लोग टैक्सी लेकर आसपास के इलाके में घूमने निकल पड़े। पलक बहुत खुश थी। वहां उसने चीड़, देवदार जैसे कई पेड़ पहली बार देखे। कई तरह की गदबदी पहाड़ी चिड़ियां देखीं। पहली बार झरना देखा। मम्मी-पापा जब भी अपने मोबाइल फोन में व्यस्त होते तो वह उनका हाथ झटक कर बाहर देखने के लिए कहती। उसने इतने दिनों में उन दोनों को फोन से काफी दूर कर दिया था। मम्मी-पापा को अच्छा लग रहा था। हालांकि आदतन कई बार उनका हाथ मोबाइल फोन पर चला जाता।

पांचवें दिन वे लोग लौटने की सोच रहे थे कि अचानक मौसम में तब्दीली आ गई। पहले बारिश हुई, फिर मौसम गुम-सा हो गया। हवा बंद हो गई। बाहर उजाला-सा छा गया। ऐसा लग रहा था, मौसम खुल जाएगा। लेकिन मौसम खुलने की जगह अचानक बर्फ गिरने लगी। वे लोग होटल में थे। पलक बालकनी से बाहर देख रही थी कि एकाएक चिल्लाई, ‘बर्फ गिरने लगी।’ मम्मी-पापा भाग कर बालकनी में आए तो देखा, सचमुच बर्फ गिर रही थी। कुछ ही देर में हिमपात की रफ्तार बढ़ने लगी। बहुत तेजी से रुई के फाहे जैसे आसमान से गिरने लगे। पलक किलकारियां मारने लगी। कुछ लोग छाता लेकर सड़क पर चल रहे थे। देखते ही देखते पूरे इलाके ने सफेदी की चादर ओढ़ ली।

कई घंटों के हिमपात के बाद जब बर्फ गिरना बंद हुआ तो होटल के सामने के कुछ घरों से बच्चे बाहर निकल आए और बर्फ के ढेरों पर खेलने लगे। बर्फ के गोले बना कर एक-दूसरे पर फेंक रहे थे। पलक का मन मचलने लगा। वह भी बर्फ से खेलने की जिद करने लगी। मम्मी तैयार नहीं थीं, पर पापा मान गए। माने ही नहीं, बल्कि मम्मी को भी मना लिया। उन लोगों ने खूब कपड़े डाटे, मोजे पहने, दस्ताने पहने, झबरैली ऊनी टोपियां पहनीं और बाहर निकल आए। पलक दस्ताने उतार कर बर्फ के गोले बनाने लगी और दनादन मम्मी-पापा पर बरसाना शुरू कर दिया। कुछ देर तो मम्मी-पापा मना करते रहे, पर थोड़ी देर बाद वे भी इस खेल में शामिल हो गए। काफी देर एक-दूसरे पर बर्फ के गोले दागने के बाद जब वे थक गए तो होटल लौट आए। खेलते हुए उन्हें अहसास ही नहीं हुआ कि तापमान शून्य से नीचे है। कमरे में आकर उन्होंने गरम-गरम सूप पिया। फिर अचानक मम्मी बोलीं, ‘सचमुच आज ही पता चला कि हेमंत और शिशिर ऋतु क्या होती हैं। सर्दियां कितनी मजेदार होती हैं न?’ मम्मी-पापा बात कर ही रहे थे कि पलक धीरे-से बोली, ‘ऋतुएं घर के अंदर नहीं आतीं। थोड़ा घर से निकला भी करो।’ ०

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App