jansatta Story, Fortune Trust written by Devendra Singh Sisodia - Jansatta
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कहानी: भाग्य भरोसे

गोलू सुबह उठ कर स्वयं तैयार हो गया। और विद्यालय जाकर कक्षा में सबसे आगे की सीट पर अकड़ कर बैठ गया। बच्चों ने उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा- ‘लगता है आज सारी पढ़ाई गोलू ही कर डालेगा। सबसे आगे जो बैठा है।’ गोलू निश्चिंत भाव से बोला- ‘मैं भले ही पढ़ाई में कमजोर हूं, पर भाग्य में सबसे तेज हूं।

खाना खाने के बाद रात को गोलू अपनी मां के साथ छत पर टहल रहा था। अचानक उसने टूटता हुआ तारा देखा। वह शीघ्रता से बोला- देखो मां टूटता तारा। मां कुछ भी कह पाती तब तक उसने आंखें बंद कर विश भी मांग ली कि मैं इस बार अपनी कक्षा में प्रथम आऊं। मां ने पूछा कि तूने टूटते तारे से क्या मांगा? गोलू ने भोलेपन से उत्तर दिया- ‘मैं अभी कुछ नहीं बताऊंगा, बताने से कामना पूरी नहीं होती।’ मां ने उसके मन की सारी बात भांप ली और उसकी नादानी पर मुस्करा दी। गोलू उस दिन के बाद उत्साह से भर गया कि अब तो उसे कक्षा में प्रथम आने से कोई रोक ही नहीं सकता। क्योंकि उसने दादी से सुन रखा था कि टूटता तारा ऊपर वाले का दूत होता है। वह दूसरों के मन की इच्छाओं को पूरा करने ही आता है। पर वह सबको नहीं दिखता, जिसे दिख जाए वह भाग्यशाली होता है। आज वह अपने भाग्य को सराह रहा था। न जाने कब से बाट जोह रहा था, पर आज उसने वह टूटता तारा अपनी आंखों से देखा था। पढ़ाई में कमजोर होने के कारण उसकी कक्षा के बच्चे हमेशा उसका मजाक उड़ाते रहते थे और अध्यापक रोज ही दंड देते थे। उससे वह बहुत आहत रहता था। विद्यालय जाने में रोज आनाकानी करता था।

गोलू सुबह उठ कर स्वयं तैयार हो गया। और विद्यालय जाकर कक्षा में सबसे आगे की सीट पर अकड़ कर बैठ गया। बच्चों ने उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा- ‘लगता है आज सारी पढ़ाई गोलू ही कर डालेगा। सबसे आगे जो बैठा है।’ गोलू निश्चिंत भाव से बोला- ‘मैं भले ही पढ़ाई में कमजोर हूं, पर भाग्य में सबसे तेज हूं। देखना इस बार मैं ही प्रथम आऊंगा। तुम सब मेरे भाग्य का कमाल देखते रह जाओगे।’ पहली बार के उसके तीखे जवाब से बच्चे चिढ़ गए। बोले- ‘ऐसी कौन-सी चाबी तुम्हारे हाथ लग गई है, जिससे तुम्हारा बंद दिमाग खुल जाएगा। ज्यादा उड़ मत तू, हमेशा की तरह तृतीय श्रेणी ही पाएगा।’ पर किसी की भी बात की परवाह किए बिना गोलू मुस्कराता रहा। अब कक्षा में अध्यापक के छड़ी मारने पर वह उफ तक नहीं करता। उठक-बैठक तो बिना कहे ही लगाने लगता। घर पर भी मां का हर काम फुर्ती से कर देता। मां हमेशा उसे समझाती थी कि बेटा कर्म करने से ही भाग्य बनता है। कर्म और भाग्य दोनो एक-दूसरे के पूरक हैं। सो, भाग्य को भी मान, पर पढ़ाई भी किया कर। तो कह देता- मां तुम चिंता न करो मैं अच्छे अंकों से पास हो जाऊंगा।

वह दिन भर खूब खेलता और रात को मजे से सो जाता। उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से सभी अचंभित थे। परीक्षा का समय था। सभी बच्चे अपनी पढ़ाई में तल्लीन थे। पर गोलू निश्चिंत घूम रहा था। परीक्षा समाप्त हुई और परीक्षा परिणाम का दिन भी आ गया। सारे बच्चे चिंतित थे कि पता नहीं क्या होगा। पर गोलू एकदम मस्त चाल में आ रहा था। कक्षा अध्यापिका ने सभी का परीक्षाफल पढ़ कर सुनाया। सारे बच्चे पास थे, पर गोलू फेल हो गया था। वह दुखी था। कुछ समझ नहीं पा रहा था कि क्या टूटे तारे से विश मांगने से पूरी होने वाली बात झूठी थी या वह तारा? अब उसकी छोटी-सी बुद्धि को यह बात समझ में आ गई कि केवल भाग्य के सहारे बैठे रहने से बात नहीं बनेगी, कर्म करना भी आवश्यक है। उसने मां की बात गांठ बांध ली और तन्मयता से अगले साल की पढ़ाई में लग गया। अब वह भाग्य से अधिक कर्म पर विश्वास करने लगा था। कड़ी मेहनत और लगन से उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता मिली।

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