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कहानी- एक और कहानी

मुझे इन गृहिणियों से कोफ्त बस यह थी कि न इनके आ धमकने का कोई तय समय था, न ही तशरीफ ले जाने का।

Author February 5, 2017 5:01 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

राकेश भारतीय

जाड़े में बाहर बैठ कर लिखने-पढ़ने के लिए वह बड़ी माकूल जगह थी। करीब चार सौ वर्गफुट क्षेत्रफल की गोल-सी जगह, जिसमें फूलों के छोटे-छोटे पौधे थे और कुल जमा चार बेंचें पड़ी हुई थीं। धूप वहां करीब दस बजे उतरती थी और किसी न किसी कोने में तीन बजे तक कमोबेश उपस्थित रहती थी। छुट््टी के दिन उन चार बेंचों में से किसी एक पर समय से काबिज हो जाना लिखने-पढ़ने से मेरी संतुष्टि का ग्राफ तय करता था। आसपास के घरों की गृहिणियां शायद छुट््टी में ही केश धोती थीं और उसके बाद उन्हें फहराए हुए सीधे उस जगह का रुख करती थीं, जहां धूप में उनकी बची-खुची नमी उड़ती रहती थी। केशों की नमी उड़ने के साथ उनकी बातचीत के रोचक टुकड़े भी उड़ते रहते थे, जिन्हें अनायास ही पकड़ कर बेंचों की बाकी जगह पर बैठे लोग कभी-कभार उनकी दिशा में अपनी गर्दन घुमा लिया करते थे।
मुझे इन गृहिणियों से कोफ्त बस यह थी कि न इनके आ धमकने का कोई तय समय था, न ही तशरीफ ले जाने का। जाड़े में मेरे कई छुट््टी वाले दिन इनके आने-जाने का गलत आकलन कर लेने की वजह से बर्बाद हो गए थे। हां, इन गृहिणियों की उपस्थिति का एक आनंददायक पक्ष था आसपास उनके छोटे-छोटे बच्चों की उपस्थिति। बच्चे कभी उस गोल जगह की परिधि में गोल-गोल साइकिल चलाते रहते, कभी गेंद खेलने लगते, कभी आपस में झगड़ने लगते, तो कभी बड़ों की बातचीत में खलल डालने पहुंच जाते।
वह बच्चा भी गोल-गोल साइकिल चला रहे बच्चों में से एक था। उसे ध्यान से देखने की वजह बना उसका साइकिल चलाते-चलाते अचानक गिर जाना।
‘अरेरेरे’ मेरे मुंह से निकला और मैं अपना कागज बेंच पर ही छोड़ कर उसकी ओर लपका। पर मेरे पहुंचते-पहुंचते वह उठ कर खड़ा हो गया, फिर रास्ते में आ गए पत्थर के टुकड़े को लात मार कर दूर कर दिया।
अब मेरी समझ में आया कि वेग से आ रही साइकिल के पहिए के रास्ते में पड़ गए इस पत्थर की वजह से ही साइकिल समेत वह गिर पड़ा था।
‘चोट तो नहीं लगी?’

मेरे प्रश्न पर उसने आंख उठा कर मुझे देखा, फिर साइकिल को एक हल्की-सी लात जमाई, उसकी सीट थपथपाई और सवार होते-होते बोला- ‘नहीं।’
वह फिर गोल-गोल साइकिल चलाने लगा और मैं वापस अपनी बेंच पर आ गया।
प्रेम-संबंधों पर कहानी लिखना इतना आसान नहीं होता, जितना लोग समझते हैं। दरअसल, प्रेमी-प्रेमिका के बीच ठीक-ठाक क्या घटा है या घट रहा है, उसका अंदाजा लगा पाना किसी दूसरे के लिए बहुत मुश्किल होता है। हर कोई एक ही तरह से तो प्रेम करता नहीं और न ही उस प्रकरण पर एक ही तरह से तरंगित होता है। कथाकार अपनी कल्पना के घोड़ों को अपने अनुभव की जमीन पर दौड़ा-दौड़ा कर कहानी बढ़ाता जाता है, पर कहीं किसी अहम मोड़ पर अटक ही जाता है।

मैं अटक गया था आवेश में कहे गए नायक के एक वाक्य पर, नायिका के मनोभावों के चित्रण पर। कलम को कागज से एक इंच ऊपर लटकाए हुए सोच रहा था कि पीठ के पीछे किसी की उपस्थिति का अहसास हुआ।
मुड़ कर देखा तो वही बच्चा खड़ा था। मेरा ध्यान अपनी ओर पाकर वह बोला- ‘आपको भी होमवर्क करने में मुश्किल होती है?’
मेरी हंसी फूट पड़ी। पर मेरे कुछ बोलने से पहले वह फिर बोला- ‘होमवर्क गंदा काम होता है। पापा कहते हैं कि लगे रहो, लगे रहो… पर मुझसे पूरा होता नहीं और टीचर से डांट खानी पड़ती है।’
फिर फूट पड़ने को आतुर हंसी को बमुश्किल रोक कर मैंने उसे बताया- ‘यह होमवर्क नहीं है।’
‘अच्छा!’ आश्चर्य से एक नजर मेरा चेहरा नाप कर वह बोला- ‘तो क्या है?’
‘कहानी।’

‘कहानी!’ मेरे ही शब्द को दुहरा कर वह दो क्षण चुप रहा। फिर बोला- ‘मेरी दादी मुझे कहानी सुनाती थीं, ढेर सारी। पर वह लिखती नहीं थीं, सिर्फ सुनाती थीं।’
मुझे उसकी बातों से आनंद आने लगा। बड़ा भावप्रवण चेहरा था उसका, भावों का उतार-चढ़ाव अनायास ही ध्यान खींच लेता था। बात बढ़ाते हुए मैंने उससे पूछा- ‘अच्छा, बताओ। अभी कल-परसों सुनी कोई कहानी।’
उसने मेरी ओर तरस से देखा, जैसे बेवकूफी भरी कोई बात कह दी गई हो। फिर बोला- ‘वे सुनाती थीं, अब नहीं सुनातीं। वे भगवानजी के पास चली गर्इं।’
उसने इतना कहा नहीं कि अवसाद की एक लहर उसके चेहरे पर झलक गई।
शायद अपनी दादी से बड़ा हिला-मिला था, मैंने सोचा। पर आगे उससे कुछ पूछूं, इसके पहले वह अपनी साइकिल की ओर लपका और बोला- ‘और चलाता हूं साइकिल।’

मैं फिर अपनी कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिश करने लगा। जानी-पहचानी सारी स्त्रियों-कन्याओं के चेहरे बार-बार अपने दिमाग में लाता और नायक के आवेश भरे वाक्य पर उन पर छा जाने वाले भाव को कल्पना की आंखों से पहचानने की कोशिश करता। पर या तो उन स्त्रियों-कन्याओं ने छठी इंद्रिय से मेरे लेखकीय इरादे भांप कर मेरी कहानी का भट्ठा बिठाने की ठान ली थी या मेरी कल्पना ही इस समय भोथरी हो गई थी। कहानी आगे बढ़ ही नहीं पा रही थी और यह कथा-मोड़ कहानी के केंद्र में होने की वजह से इससे पार पाए बिना कहानी का कोई मतलब नहीं बनता।
झख मार कर मैंने वापस बच्चों की ओर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया। अब बच्चों की संख्या कम हो गई थी, बेंचों पर बैठे लोगों में से भी कई उठ कर जा चुके थे। पर वह बच्चा साइकिल चलाए जा रहा था, पहले की अपेक्षा धीमी रफ्तार से। उसे देखते-देखते नजर पड़ गई उसकी पैंट के आधे उधड़ रखे पांयचों पर।
या तो इसकी मां नौ से पांच काम करने वाली कामकाजी महिला है या बेशऊर गृहिणी है, मैंने सोचा।
यहां आते हुए सोचा था कि कहानी को एक मुकम्मल शक्ल देने के बाद ही वापस लौट कर खाना खाऊंगा। अंतड़ियां कुलबुलाने लगी थीं, पर मैंने सोचा कि एक आखिरी कोशिश करूं, कम से कम एक और वाक्य तो लिखूं।
पर झोंक में एक वाक्य लिखने के बाद उसे तुरंत काटना पड़ा। मेरी कहानी एक ही जगह पर अड़ियल टटटू की तरह अड़ गई थी, तो अड़ ही गई थी।
हार मान कर अब बेंच से उठने का इरादा कर ही रहा था कि वह बच्चा फिर मेरे पास पहुंच गया।
‘लिख ली कहानी?’

उसके प्रश्न के उत्तर में बेचारगी से मुस्करा देने के अलावा मेरे पास कोई और चारा न था।
‘लिख ली तो सुनाइए।’ बच्चे ने आग्रह किया।
‘नहीं लिख पाया आगे। थोड़ी-सी ही लिखी रखी है। पूरी हो जाने पर सुना दूंगा।’
उसका मन रखने के लिए मैंने इतना कह दिया, वरना कहानी में बच्चे की रुचि लायक कोई तत्त्व ही न था।
उसके चेहरे पर थोड़ी निराशा झलकी, तो मैंने बात दूसरी ओर मोड़ते हुए कहा- ‘मुझे तो भूख लग रही है। अब मैं खाना खाने घर जा रहा हूं। तुम भी घर चले जाओ। तुम्हारी मां खाना बना कर तुम्हारा इंतजार कर रही होंगी।’
उसके चेहरे का भाव तुरंत बदल गया। आक्रोश उसकी आंखों में तैर गया और होंठ हल्के से भींचते हुए बोल पड़ा- ‘खाना पापा बनाते हैं। उन्होंने कहा था कि तुम बाहर खेलते रहो तब तक मैं खाना बना लेता हूं।’
कोई विचित्र ही इंतजाम है क्या इसके घर में, मैंने इतना सोचा ही था कि वह थोड़े तेज स्वर में आगे बोला- ‘वह नहीं आएगी अब हमारे पास। नाना के घर चली गई। मैंने उससे कट््टी कर ली। कट््टी, कट््टी, कट््टी…’
मुझे वाकई अफसोस हुआ कि बात कहां से कहां चली गई और अनजाने में ही बच्चे की दुखती किसी रग पर हाथ पड़ गया। पर बात है क्या, यह समझ में बिलकुल नहीं आया। वह अपनी बात कह कर चुपचाप खड़ा था, अपनी उम्र के लिए अटपटी लगती गंभीरता को चेहरे पर चिपकाए हुए। उसे इस भंगिमा में देखना मुझे असहज कर ही रहा था कि बार्इं तरफ से किसी ने पुकारा- ‘अभिषेक।’
‘हां, पापा।’ कहते हुए वह बच्चा आवाज की दिशा में मुड़ा।

वह आदमी करीब पैंतीस वर्ष की उम्र का होगा, बाल उसके बेतरतीब थे और कमीज की आस्तीनें आधी मुड़ी हुई थीं। बच्चे के पास पहुंच कर उसने उसका हाथ पकड़ा तो मुझे उसकी कमीज पर पड़े तेल के धब्बे भी साफ दिखे।
उस आदमी ने एक हाथ से साइकिल थाम रखी थी और दूसरे से बच्चे का हाथ। उन्हें दूर जाते हुए मैं चुपचाप देखता रहा, बच्चे की बात इस दौरान कानों के पर्दे थपथपाती रही।
अपनी अधलिखी कहानी के पन्ने समेट कर अंतत: मैं बेंच से उठा।
एक और ही कहानी मेरी कलम पर बैठने के लिए आकार लेने लगी थी। ०

 

 

 

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