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बाल कहानी- दोस्ती का फर्ज

हर में पतंगबाजी का कितना शौक था, यह बात आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें बता रही थीं।

Author January 14, 2018 06:32 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

गोविंद भारद्वाज

हर में पतंगबाजी का कितना शौक था, यह बात आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें बता रही थीं। नीला आसमान आज सुबह से पतंगों से सजा हुआ था। नीली, पीली, लाल गुलाबी, नारंगी, तिरंगी और न जाने कितने ही रंगों से सजी-धजी पतंगें एक-दूसरे को देख कर ठुमके लगा रही थीं। ऐसा लग रहा था कि मानो सितारों ने पतंग का रूप ले लिया हो। कोई अपनी छत से पतंग उड़ा रहा था, तो कोई मैदान में खड़े होकर। सबके हाथों में चरखी और पतंगें ही दिखाई दे रही थीं।  रोहित अपनी छत पर अकेले ही पतंग उड़ा रहा था। उसकी मम्मी ने पूछा, ‘अरे बेटा, रोहित, तू आज अकेले ही पतंग उड़ा रहा है! पिछले साल तो तेरे दस-पंद्रह दोस्त पतंग उड़ा रहे थे तेरे साथ। वे कहां गए आज?’

‘मम्मी सबके सब स्वार्थी और निकम्मे निकले। इस बार मैंने पतंगबाजी के लिए किसी को नहीं बुलाया।’ रोहित ने पतंग में ढील देते हुए कहा। ‘अरे बेटा तुझे भी मैं अच्छी तरह जानती हंू। तू लड़ लिया होगा दोस्तों से।’ मां ने कहा। रोहित की नजरें अब भी आसमान की ओर लगी हुई थीं। वह बड़ी सावधानी से पतंग उड़ा रहा था। उसे डर था कि पहले दो पतंगों की तरह यह भी न कट जाए। उसके पास यह आखिरी पतंग थी।
मां अपने काम-धंधे में व्यस्त हो गई। रोहित मस्त होकर पतंग उड़ाने में लगा हुआ था। वह कभी मंझा खींचता, तो कभी ढील छोड़ता। पतंग भी ऐसे उड़ रही थी, जैसे रोहित कह रहा हो कि ऐसे नहीं, ऐसे उड़। बिल्कुल कठपुतली की तरह नाच रही थी।
रोहित की पतंग के आसपास अन्य कई पतंगें उड़ रही थीं। दृश्य यह था कि जैसे महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु को कौरवों ने चक्रव्यूह में घेर लिया हो। रोहित अपनी पतंग को उस चक्रव्यूह से निकालने का प्रयास कर रहा था। उसका ध्यान केवल पतंग पर था। वह नहीं चाहता था कि उसकी पतंग कटे।
रोहित पतंग उड़ाता-उड़ाता छत की मुंड़ेर पर चढ़ चुका था। उसे जरा-सा भी यह महसूस नहीं हुआ कि वह छत पर नहीं, छत की मुंड़ेर पर पतंग उड़ा रहा था। अगले ही पल उसका पैर फिसल गया और वह धड़ाम से सड़क पर आ गिरा। उसकी मां भी काम छोड़ कर बाहर भागी। रोहित बेहोश पड़ा था, मगर उसके हाथ में अब भी चरखी थी और पतंग बिल्कुल शांत तरीके से उड़ रही थी।

सिर से काफी खून बह चुका था। एक पड़ोसी ने एंबुलेंस को तुरंत फोन किया। चार-पांच मिनट बाद निकट के थाने में खड़ी एंबुलेंस आ गई। उसे शहर के बड़े अस्पताल में ले जाया गया। उसकी मां का रो-रो कर बुरा हाल था। अस्पताल की आपातकालीन इकाई में उसे भर्ती कर लिया गया।
लगभग छह घंटे बाद रोहित को होश आया। धीर-धीरे उसने पलकें खोली। उसके आसपास मां-बाप के साथ-साथ बहुत से लोग खड़े थे। ‘मां मैं कहां हूं और मुझे क्या हुआ है?’ रोहित ने धीरे से कराहते हुए मां की ओर देख कर पूछा।
‘बेटा तुम अस्पताल में हो, तुम पतंग उड़ाते समय छत से गिर गए थे। याद है कुछ तुम्हें?’ मां ने उसे सहलाते हुए कहा।
फिर उसने चारों तरफ नजरें दौड़ाई। उसके सारे दोस्त उदास खड़े थे। रोहित ने पूछा, ‘तुम कब आए?’

मां ने बात काटते हुए कहा, ‘बेटा, ये उसी समय आ गए थे, जब तुम छत से गिर कर बेहोश हो गए थे। तुम्हारे सिर से इतना खून बहा कि शरीर में खून की कमी आ गई। और तेरे इन्हीं दोस्तों ने अपना खून दिया, जिनको तू स्वार्थी और निकम्मा कह रहा था।’ मां की बात सुन कर रोहित की आंखें शर्म से झुक गर्इं। उसकी आंख से आंसू बह रहे थे।
तपिश ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा, ‘रो मत मेरे यार। हमने तो अपनी दोस्ती का फर्ज निभाया है। खून का क्या है, यह तो और बन जाएगा, पर तेरे जैसा दोस्त कहां से आता, अगर तुझे कुछ हो जाता तो…।’
‘हां… हां… रोहित… तू चिंता मत कर। तू जल्दी ठीक हो जाएगा।’ सारे दोस्त एक स्वर में बोल पड़े। रोहित के चेहरे पर मुस्कान लौट आई।
रोहित के पिता ने कहा, ‘बेटा, पतंग से तूने कभी यह नहीं सीखा कि खतरों में खेल कर ही बहादुर बच्चे जवान होते हैं।’ यह सुन कर सारे दोस्त हंस पड़े। ०

 

 

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